आदिल हुसैन का जज़्बा: 'असफलता भी गरिमा की बात है, कोशिश कभी मत छोड़ो'
सारांश
मुख्य बातें
अभिनेता आदिल हुसैन ने अपनी आगामी फिल्म 'मैक्स, मिन और म्याऊजाकी' के प्रचार अभियान के दौरान अपनी जिंदगी के उस अनछुए पहलू को साझा किया, जो उन्हें थिएटर की छोटी मंचीय दुनिया से बॉलीवुड के बड़े पर्दे तक ले आया। 28 जुलाई को मुंबई में हुई बातचीत में उन्होंने खुलकर कहा कि असफलताओं ने उन्हें तोड़ा नहीं, बल्कि एक बेहतर इंसान और अधिक परिपक्व कलाकार बनाया।
असफलता को ताकत में बदलने का सफर
आदिल हुसैन ने कहा, 'असफलता किसी इंसान की कमज़ोरी नहीं होती, बल्कि यह इस बात का सबूत होती है कि उसने कुछ करने की कोशिश की है। जिंदगी में सबसे ज़रूरी यह है कि व्यक्ति वही काम करे जिसे उसका दिल सच में करना चाहता है। अगर इंसान किसी सपने को पूरा करने के लिए ईमानदारी से मेहनत करता है, तो रास्ते में आने वाली परेशानियाँ भी उसे मज़बूत बनाती हैं।'
उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि शुरुआती दौर में आलोचनाओं और अस्वीकृतियों ने उन्हें भीतर से हिलाया ज़रूर, लेकिन डिगाया नहीं।
14 साल की उम्र से पला अभिनय का जुनून
अभिनेता ने बताया, 'बचपन से ही मेरा सपना अभिनेता बनने का था। जब मैं महज़ 14 साल का था, तभी से अभिनय को लेकर मेरे अंदर जुनून था। उस समय कई लोगों ने मेरी आलोचना की, मुझे समझाया और कुछ ने तो मुझे प्रोजेक्ट्स से बाहर कर दिया — लेकिन कभी भी मैंने अभिनय छोड़ने के बारे में नहीं सोचा।' उन्होंने यह भी जोड़ा कि उस कठिन दौर में कुछ लोगों ने उनका साथ दिया, उनके काम को समझा और आगे बढ़ने का हौसला दिया।
उनका मानना है कि अगर उन्होंने शुरुआती आलोचनाओं को दिल पर ले लिया होता, तो शायद वे आज इस मुकाम पर नहीं होते।
जापान की 'नोबिलिटी ऑफ फेल्योर' की सोच से प्रेरणा
बातचीत के दौरान आदिल हुसैन ने जापान के एक विशेष दार्शनिक विचार का ज़िक्र किया, जिसे 'नोबिलिटी ऑफ फेल्योर' यानी 'असफलता की गरिमा' कहा जाता है। उन्होंने समझाया, 'इस विचार के अनुसार असफल होना भी सम्मान की बात है, क्योंकि इसका मतलब है कि इंसान ने कुछ नया करने की हिम्मत दिखाई और पूरी कोशिश की। सफलता को केवल इस बात से नहीं मापा जाना चाहिए कि दुनिया किसी व्यक्ति को कितना सफल मानती है या दर्शक उसके काम को कितना पसंद करते हैं।'
यह ऐसे समय में एक विचारोत्तेजक दृष्टिकोण है जब बॉलीवुड में बॉक्स ऑफिस के आँकड़े ही अक्सर किसी कलाकार की काबिलियत का पैमाना बन जाते हैं।
खुद से ईमानदारी ही असली उपलब्धि
आदिल हुसैन ने सफलता की अपनी परिभाषा स्पष्ट करते हुए कहा, 'मेरे लिए सफलता का मतलब यह है कि मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की, अपनी कमियों को स्वीकार किया और यह समझा कि मैं हर चीज़ में सबसे बेहतर नहीं हो सकता। अपनी कमियों को बिना शर्म के स्वीकार करना और खुद के साथ ईमानदार रहना भी एक बड़ी उपलब्धि है। अगर कोई व्यक्ति रात को शांति से सो सकता है और उसे खुद से कोई शिकायत नहीं है, तो यही उसके लिए सफलता है।'
अपने करियर में विविध और चुनौतीपूर्ण किरदारों के लिए जाने जाने वाले आदिल हुसैन की यह सोच नए कलाकारों के लिए एक प्रेरक मार्गदर्शन बन सकती है।