'चौहान' टीजर विवाद: क्षत्रिय परिषद का आरोप, बॉलीवुड फिल्मों से सांप्रदायिक एजेंडा चलाया जा रहा है
सारांश
मुख्य बातें
अजय देवगन अभिनीत आगामी एक्शन फिल्म 'चौहान' का टीजर रिलीज होते ही विवादों की चपेट में आ गया है। लखनऊ में 1 जुलाई 2026 को क्षत्रिय परिषद के को-फाउंडर अभिषेक आनंद ने इस विवाद पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए आरोप लगाया कि बॉलीवुड फिल्मों के माध्यम से एक सुनियोजित एजेंडा आगे बढ़ाया जा रहा है, जिसमें इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश किया जाता है।
टीजर पर क्या है विवाद
अभिषेक आनंद के अनुसार, 'चौहान' फिल्म कथित तौर पर एक पत्थरबाजी की घटना पर आधारित है, लेकिन इसके टीजर में इस्तेमाल किए गए डायलॉग दो समुदायों को आपस में भिड़ाने का काम करते हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि फिल्म में पठानों को निशाना बनाया गया है, जबकि तथ्य यह है कि कश्मीर में पठान नहीं रहते — पठान समुदाय मुख्यतः अफगानिस्तान में निवास करता है।
उनका कहना था कि यदि फिल्म में ऐतिहासिक संदर्भ देना ही था, तो राजा मानसिंह के किरदार का उपयोग उचित होता, जिन्होंने अफगानिस्तान के पठानों की पाँचों जनजातियों को पराजित करने के बाद अपने पंचरंगा ध्वज में उनका प्रतीक जोड़ा था — जो पहले केवल कचनार का हुआ करता था। अभिषेक आनंद ने स्पष्ट किया कि 'चौहान' फिल्म के डायलॉग का न तो ऐतिहासिक आधार है और न ही तार्किक संगति।
बॉलीवुड पर दोहरे एजेंडे का आरोप
क्षत्रिय परिषद के को-फाउंडर ने आरोप लगाया कि बॉलीवुड दो तरीकों से एजेंडा सेट करता है — पहला, 'तान्हाजी' जैसी फिल्मों के ज़रिए जहाँ ऐतिहासिक खलनायकों के किरदारों को विकृत रूप में दिखाया जाता है, और दूसरा, 'जोधा-अकबर' जैसी फिल्मों के माध्यम से जहाँ एक विशेष दृष्टिकोण को इतिहास के रूप में परोसा जाता है।
उन्होंने कहा कि अजय देवगन की फिल्म 'तान्हाजी' में भी उदयभान के किरदार को तथ्यों से परे जाकर दर्शाया गया था। उनका यह भी कहना था कि बॉलीवुड जब चाहे क्षत्रिय और राजपूत पहचान का व्यावसायिक उपयोग करता है, लेकिन जब इतिहास को प्रामाणिक रूप से पर्दे पर उतारने की बात आती है, तो गलत जानकारी परोसी जाती है।
धर्मन बाई और बाबू कुंवर सिंह का उदाहरण
अभिषेक आनंद ने बॉलीवुड की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाते हुए पूछा कि फिल्म निर्माता बाबू कुंवर सिंह और धर्मन बाई जैसे वास्तविक नायकों पर फिल्म क्यों नहीं बनाते। उन्होंने बताया कि धर्मन बाई — जिन्हें धरमन देवी या धरमन बीवी के नाम से भी जाना जाता है — मुस्लिम समुदाय से आती थीं और आरा की एक गायिका थीं, जिन्होंने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में बाबू कुंवर सिंह के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध लड़ा और उन्हीं की गोद में वीरगति को प्राप्त हुईं।
उनका कहना था कि इस प्रकार की सांप्रदायिक सौहार्द की कहानियाँ बॉलीवुड को रास नहीं आतीं, क्योंकि ये उनके तय एजेंडे में फिट नहीं बैठतीं। उन्होंने माँग की कि बॉलीवुड को भारत के इतिहास को उसकी वास्तविक जटिलता और समग्रता के साथ पर्दे पर प्रस्तुत करना चाहिए।
इतिहासकारों और बुद्धिजीवियों की चुप्पी पर सवाल
अभिषेक आनंद ने यह भी रेखांकित किया कि जब इस तरह की ऐतिहासिक रूप से संदिग्ध फिल्में बनती हैं, तब न तो इतिहासकार और न ही बुद्धिजीवी इन पर कोई सवाल उठाते हैं। उनके अनुसार, भारत के इतिहास को 'ब्लैक एंड व्हाइट' बनाया जा रहा है — जो न केवल ऐतिहासिक तथ्यों के साथ अन्याय है, बल्कि सामाजिक सौहार्द के लिए भी खतरनाक है। यह विवाद आने वाले समय में फिल्म की रिलीज़ से पहले और गहरा हो सकता है।