चिरंजीवी की पहली क्रश थीं बायोलॉजी टीचर, कॉलेज में दिल की बात कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाए
सारांश
मुख्य बातें
साउथ सिनेमा के महानायक चिरंजीवी — जिनका असली नाम कोनिडेला शिवशंकर वरप्रसाद है — पर्दे पर भले ही बेखौफ एक्शन हीरो रहे हों, लेकिन कॉलेज के दिनों में वह एक बार अपने दिल की बात कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाए थे। एक पॉडकास्ट में उन्होंने खुद यह दिलचस्प किस्सा साझा किया — कि उनकी पहली क्रश कोई हमउम्र लड़की नहीं, बल्कि उनकी बायोलॉजी टीचर थीं।
कॉलेज का वह यादगार किस्सा
चिरंजीवी ने बताया कि कॉलेज के दौरान उन्हें बायोलॉजी विषय में गहरी रुचि थी। इसी दौरान उनकी बायोलॉजी टीचर उन्हें पसंद आने लगी थीं, जो उनकी पढ़ाई की तारीफ भी करती थीं। हालाँकि, उन्होंने कभी टीचर को अपनी भावनाएँ नहीं बताईं और न ही कोई लव लेटर लिखा। उन दिनों उनका ध्यान पढ़ाई, नाटक और अभिनय में लगा रहता था।
कौन हैं चिरंजीवी — पहचान और परिवार
22 अगस्त 1955 को आंध्र प्रदेश में जन्मे चिरंजीवी के पिता कोनिडेला वेंकट राव पुलिस विभाग में कार्यरत थे। उन्होंने कॉमर्स की पढ़ाई की और बाद में अभिनय का सपना उन्हें चेन्नई के मद्रास फिल्म इंस्टीट्यूट तक ले गया। उनके 'चिरंजीवी' नाम के पीछे भी एक भावुक कहानी है — परिवार भगवान हनुमान (अंजनेय) का भक्त था और उनकी माँ ने सुझाया कि वह इसी नाम से फिल्मों में आएँ। 'चिरंजीवी' का अर्थ है — अमर — और यह नाम भारतीय सिनेमा में उनकी सबसे बड़ी पहचान बन गया।
करियर की शुरुआत और बड़ी पहचान
चिरंजीवी ने 1978 में 'प्रणाम खरीदू' से फिल्मी करियर की विधिवत शुरुआत की, हालाँकि 'पुनाधिरल्लू' में वह पहले काम कर चुके थे — वह फिल्म बाद में रिलीज हुई। शुरुआती दौर में उन्होंने हीरो के साथ-साथ एंटी-हीरो और नकारात्मक किरदार भी निभाए। 1983 में आई 'कैदी' ने उनके करियर को नई दिशा दी और वह तेलुगु सिनेमा के शीर्ष सितारों में शामिल हो गए।
पुरस्कार और उपलब्धियाँ
'रुद्रवीणा', 'स्वयं कृषी', 'गैंग लीडर', 'घराना मोगुडु', 'इंद्रा', 'टैगोर' और 'शंकर दादा एमबीबीएस' जैसी फिल्मों ने उन्हें अलग-अलग पीढ़ियों के दर्शकों का चहेता बनाया। 'स्वयं कृषी' और 'इंद्रा' के लिए उन्हें नंदी पुरस्कार से नवाज़ा गया, जबकि वह फिल्मफेयर अवॉर्ड्स साउथ के भी कई बार विजेता रहे हैं।
वापसी और हालिया सफर
करीब एक दशक के फिल्मी विराम के बाद चिरंजीवी ने 2017 में 'कैदी नंबर 150' से शानदार वापसी की। इसके बाद 'सई रा नरसिम्हा रेड्डी', 'आचार्य', 'गॉडफादर' और 'वॉल्टेयर वीरय्या' में उनकी अदाकारी को सराहा गया। 2024 में भारत सरकार ने उन्हें देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया — यह उनके छह दशक लंबे सिनेमाई योगदान की आधिकारिक स्वीकृति थी।