गिरीश कर्नाड: 'ययाति' से 'तुगलक' तक, पुराणों में खोजे आधुनिक सवाल — पुण्यतिथि पर विशेष
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय रंगमंच और साहित्य के शिखर पुरुष गिरीश कर्नाड उन विरले रचनाकारों में गिने जाते हैं, जिन्होंने महाभारत, इतिहास और लोककथाओं की जड़ों से आधुनिक समाज के ज्वलंत प्रश्न उठाए। 10 जून 2019 को 81 वर्ष की आयु में उनके निधन के बाद भी उनकी रचनाएँ भारतीय रंगमंच की आत्मा में जीवित हैं। आज उनकी पुण्यतिथि पर राष्ट्र प्रेस उनके असाधारण जीवन और रचना-संसार को याद कर रहा है।
प्रारंभिक जीवन और सांस्कृतिक जड़ें
19 मई 1938 को महाराष्ट्र के माथेरान में जन्मे गिरीश कर्नाड का परिवार मूलतः कर्नाटक से था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा मराठी भाषा में हुई, किंतु बचपन से ही कर्नाटक की लोक संस्कृति और रंगमंच से उनका गहरा नाता बन गया। सिरसी और बाद में धारवाड़ में रहते हुए उन्होंने लोकनाट्य यक्षगान को निकट से देखा, जिसने उनके रचनात्मक व्यक्तित्व की नींव रखी।
धारवाड़ से स्नातक के बाद कर्नाड उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड गए, जहाँ ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र, राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल की। विदेश में रहते हुए भी भारतीय साहित्य और संस्कृति के प्रति उनका अनुराग अटूट रहा। स्वदेश लौटकर उन्होंने चेन्नई में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस में कार्य किया, लेकिन उनका मन सदा साहित्य और नाट्य-सृजन की ओर खिंचता रहा।
'ययाति' की रचना : महाभारत से मिली अनूठी प्रेरणा
1961 में गिरीश कर्नाड ने अपना पहला नाटक 'ययाति' लिखा, जो महाभारत के पात्र ययाति पर आधारित था। इस नाटक की प्रेरणा उन्हें सी. राजगोपालाचारी द्वारा लिखित महाभारत के संस्करण को पढ़ने के बाद मिली। उन्होंने एक साक्षात्कार में बताया था कि महाभारत के पात्र उनके भीतर इस तरह जीवंत हो उठे, मानो वे सीधे उनसे संवाद कर रहे हों — वे स्वयं को केवल उस आवाज़ का माध्यम मानते थे।
यह नाटक अत्यंत लोकप्रिय हुआ और बाद में इसका कई भाषाओं में अनुवाद किया गया। गौरतलब है कि 'ययाति' ने साहित्य जगत को यह संदेश दिया कि प्राचीन आख्यानों में समकालीन मानवीय संकटों के उत्तर छिपे हैं।
मील के पत्थर : 'तुगलक' से 'नागमंडल' तक
1964 में लिखा गया नाटक 'तुगलक' भारतीय रंगमंच का एक कालजयी अध्याय बन गया। इस नाटक में उन्होंने मध्यकालीन इतिहास को समकालीन राजनीतिक विमर्श से जोड़ा — यही उनकी सबसे बड़ी रचनात्मक विशेषता थी। इसके बाद 'हयवदन', 'नागमंडल', 'तालेदंड' और 'अग्नि मट्टु माले' जैसे नाटकों ने उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय रंगमंच पर स्थायी स्थान दिलाया।
उनके नाटकों का विभिन्न भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ और दुनिया भर के मंचों पर इनका सफलतापूर्वक प्रदर्शन किया गया। यह ऐसे समय में आया जब भारतीय रंगमंच को एक ऐसी आवाज़ की तलाश थी, जो परंपरा और आधुनिकता के बीच सेतु बना सके।
सिनेमा और दूरदर्शन में योगदान
रंगमंच के समानांतर गिरीश कर्नाड ने कन्नड़ और हिंदी सिनेमा में अभिनेता, निर्देशक और पटकथा लेखक के रूप में उल्लेखनीय योगदान दिया। 'निशांत', 'मंथन', 'स्वामी', 'मेरी जंग', 'सुर संगम', 'इकबाल', 'एक था टाइगर' और 'टाइगर जिंदा है' जैसी फिल्मों में उनके अभिनय को दर्शकों ने सराहा।
दूरदर्शन के लोकप्रिय धारावाहिक 'मालगुडी डेज़' में उन्होंने स्वामी के पिता की यादगार भूमिका निभाई। विज्ञान-आधारित कार्यक्रम 'टर्निंग पॉइंट' के प्रस्तोता के रूप में भी वे घर-घर में पहचाने गए।
पुरस्कार और विरासत
गिरीश कर्नाड को उनकी बहुआयामी प्रतिभा के लिए पद्मश्री, पद्मभूषण, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार और देश के सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाज़ा गया। इसके अतिरिक्त उन्हें कई राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी प्राप्त हुए।
10 जून 2019 को उनके निधन के साथ भारतीय साहित्य और रंगमंच ने अपना एक अप्रतिम स्तंभ खो दिया। किंतु उनकी रचनाएँ आज भी यह सिद्ध करती हैं कि अतीत की कहानियाँ वर्तमान के सबसे कठिन सवालों का जवाब दे सकती हैं।