जतिन सरना का सवाल: क्या रीटेक और एडिटिंग की आदत ने छीन ली अभिनेताओं की असली तैयारी?
सारांश
मुख्य बातें
अभिनेता जतिन सरना ने मुंबई में एक बातचीत के दौरान बॉलीवुड की बदलती शूटिंग संस्कृति पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि डिजिटल तकनीक और रीटेक की सुलभता ने कलाकारों में रिहर्सल और गहरी तैयारी के प्रति जुनून को कमज़ोर किया है। 'सेक्रेड गेम्स' और 'दरबार' जैसी चर्चित परियोजनाओं से पहचाने जाने वाले सरना का मानना है कि सिर्फ तकनीक के सहारे कोई भी बेहतरीन कलाकार नहीं बन सकता।
तकनीक की सुविधा, तैयारी की कमी
जतिन सरना ने कहा, 'आज सब कुछ डिजिटल रिकॉर्ड होता है, इसलिए लोगों को लगता है कि अगर एक टेक सही नहीं हुआ तो दूसरा ले लेंगे, लेकिन सिर्फ रीटेक और एडिटिंग के भरोसे कोई भी अच्छा कलाकार नहीं बन सकता।' उनके अनुसार डिजिटल कैमरों और एडिटिंग सॉफ्टवेयर ने शूटिंग प्रक्रिया को निस्संदेह सरल बनाया है, परंतु इस सुविधा का एक अनदेखा दुष्प्रभाव भी है — कलाकारों की पूर्व-तैयारी और रिहर्सल का धीरे-धीरे कम होते जाना।
किरदार को जीना पड़ता है, सिर्फ बोलना नहीं
सरना ने अभिनय की बुनियाद को स्पष्ट करते हुए कहा, 'अभिनय सिर्फ कैमरे के सामने खड़े होकर डायलॉग बोलने का नाम नहीं है। किसी किरदार को अच्छे से निभाने के लिए उसकी सोच, भावनाओं और व्यवहार को समझना पड़ता है, और यह सब बिना तैयारी के संभव नहीं है।' उनका यह कथन थिएटर की उस परंपरा की याद दिलाता है जिसमें कलाकार हफ्तों तक किरदार के मनोविज्ञान में उतरते थे।
पुराने दौर का अनुशासन और आज की जल्दबाज़ी
पुराने सिनेमा को याद करते हुए जतिन ने कहा, 'पहले फिल्मों के पास इतने संसाधन नहीं होते थे। कैमरे सीमित होते थे और रीटेक लेना आसान नहीं होता था। लोग घंटों रिहर्सल करते थे ताकि कैमरे के सामने एक-एक सीन सही तरीके से निकल सके। उसी मेहनत और अनुशासन की वजह से पुराने समय की कई फिल्में आज भी लोगों के दिलों में ज़िंदा हैं।' इसके विपरीत, उन्होंने आज के माहौल पर टिप्पणी करते हुए कहा, 'अब हर कोई जल्दबाज़ी में दिखाई देता है। मैंने ऐसे कलाकार भी देखे हैं जो शूटिंग शुरू होने से पहले ही पैकअप का समय पूछने लगते हैं।'
काम के प्रति जुनून ही असली पहचान
सरना ने अपनी कार्यशैली के बारे में कहा, 'मेरे लिए सिनेमा सिर्फ एक प्रोफेशन नहीं बल्कि प्यार है। मैं सिनेमा को जीता हूँ।' उन्होंने यह भी जोड़ा कि एक अच्छे कलाकार की पहचान यही है कि वह हर किरदार को पूरी मेहनत और सच्चाई के साथ निभाए। यह सोच कहीं न कहीं उस पीढ़ी की विरासत से जुड़ती है जिसने थिएटर और वर्कशॉप को अभिनय की पाठशाला माना। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या नई पीढ़ी के कलाकार फिर से रिहर्सल-केंद्रित दृष्टिकोण की ओर लौटते हैं।