जतिन सरना का बड़ा बयान: 'रीटेक और एडिटिंग के भरोसे नहीं बनते असली कलाकार, रिहर्सल जरूरी'
सारांश
मुख्य बातें
अभिनेता जतिन सरना ने 24 मई को मुंबई में एक बातचीत के दौरान बॉलीवुड की बदलती शूटिंग संस्कृति पर कड़ी राय रखी। उन्होंने कहा कि डिजिटल तकनीक और रीटेक की सुविधा ने कलाकारों की तैयारी और रिहर्सल को कमज़ोर किया है, और यह सिनेमा की गुणवत्ता के लिए चिंताजनक है।
तकनीक बनाम तैयारी: असली मुद्दा
डिजिटल कैमरों और एडिटिंग सॉफ्टवेयर ने शूटिंग को पहले से कहीं अधिक लचीला बना दिया है। एक सीन को अनगिनत बार शूट किया जा सकता है और पोस्ट-प्रोडक्शन में संवारा जा सकता है। लेकिन जतिन सरना का मानना है कि इस सुविधा ने कलाकारों को मेहनत से दूर किया है। उन्होंने कहा, 'बिल्कुल ऐसा हो रहा है। आज सब कुछ डिजिटल रिकॉर्ड होता है, इसलिए लोगों को लगता है कि अगर एक टेक सही नहीं हुआ तो दूसरा ले लेंगे, लेकिन सिर्फ रीटेक और एडिटिंग के भरोसे कोई भी अच्छा कलाकार नहीं बन सकता।'
'सेक्रेड गेम्स' और 'दरबार' जैसी चर्चित परियोजनाओं में अपनी अदाकारी से पहचान बनाने वाले जतिन ने जोर देकर कहा, 'आज के समय में कलाकारों को फिर से रिहर्सल और तैयारी की तरफ लौटने की जरूरत है। तकनीक ने सुविधाएं जरूर बढ़ाई हैं, लेकिन इससे कलाकारों की मेहनत कम नहीं होनी चाहिए।'
अभिनय की गहराई: किरदार को जीना होता है
जतिन ने अभिनय की बुनियादी जरूरतों पर प्रकाश डालते हुए कहा, 'तकनीक की सुविधा होना अच्छी बात है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कलाकार मेहनत करना छोड़ दें। अभिनय सिर्फ कैमरे के सामने खड़े होकर डायलॉग बोलने का नाम नहीं है। किसी किरदार को अच्छे से निभाने के लिए उसकी सोच, भावनाओं और व्यवहार को समझना पड़ता है, और यह सब बिना तैयारी के संभव नहीं है।'
यह ऐसे समय में आया है जब ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर कंटेंट की माँग तेज़ी से बढ़ रही है और शूटिंग शेड्यूल पहले से अधिक सघन हो गए हैं। आलोचकों का कहना है कि इस दबाव में कलाकारों को किरदार की गहरी समझ विकसित करने का समय नहीं मिलता।
पुराने दौर का अनुशासन
जतिन ने पुराने सिनेमा की कार्यशैली को याद करते हुए कहा, 'पहले फिल्मों के पास इतने संसाधन नहीं होते थे। कैमरे सीमित होते थे और रीटेक लेना आसान नहीं होता था। कलाकार और पूरी टीम बहुत समर्पण के साथ काम करती थी। लोग घंटों रिहर्सल करते थे ताकि कैमरे के सामने एक-एक सीन सही तरीके से निकल सके। उसी मेहनत और अनुशासन की वजह से पुराने समय की कई फिल्में आज भी लोगों के दिलों में जिंदा हैं।'
गौरतलब है कि थिएटर और वर्कशॉप की परंपरा ने दशकों तक भारतीय सिनेमा को मजबूत नींव दी। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा जैसे संस्थानों से निकले कलाकारों ने रिहर्सल-आधारित अभिनय को एक कला का दर्जा दिया।
जल्दबाज़ी की संस्कृति पर चिंता
आज के माहौल पर जतिन ने बेबाकी से कहा, 'अब हर कोई जल्दबाजी में दिखाई देता है। मैंने ऐसे कलाकार भी देखे हैं जो शूटिंग शुरू होने से पहले ही पैकअप का समय पूछने लगते हैं। यह सोच कहीं न कहीं काम के प्रति जुनून को कमजोर करती है। अगर कलाकार सिर्फ समय पूरा करने के लिए काम करेगा तो उसके अभिनय में वह गहराई नहीं आ पाएगी जो दर्शकों को प्रभावित करती है।'
सिनेमा के प्रति जतिन का नजरिया
अपनी व्यक्तिगत कार्यशैली के बारे में जतिन ने कहा, 'मेरे लिए सिनेमा सिर्फ एक प्रोफेशन नहीं बल्कि प्यार है। मैं सिनेमा को जीता हूं। मेरी कोशिश रहती है कि हर प्रोजेक्ट अपना सबसे अच्छा रूप लेकर सामने आए। यह तभी संभव है जब पूरी टीम ईमानदारी और पूरी तैयारी के साथ काम करे। एक अच्छा कलाकार वही होता है जो हर किरदार को पूरी मेहनत और सच्चाई के साथ निभाए।' जतिन के इस बयान ने उद्योग में रिहर्सल संस्कृति की वापसी पर बहस को नई दिशा दी है।