₹200 करोड़ ठगी-मकोका केस: लीना मारिया पॉलोस की जमानत पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला तीन माह के लिए टला
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 6 अगस्त 2026 को ₹200 करोड़ की कथित ठगी और वसूली से जुड़े मकोका (MCOCA) मामले में आरोपी सुकेश चंद्रशेखर की पत्नी लीना मारिया पॉलोस की जमानत याचिका पर अंतिम निर्णय देने से फिलहाल इनकार कर दिया। अदालत ने निचली अदालत को निर्देश दिया है कि मामले से जुड़े प्रमुख गवाहों की गवाही तीन महीने के भीतर पूरी की जाए, और उसके बाद ही जमानत याचिका पर आगे की सुनवाई होगी।
मुख्य घटनाक्रम
सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि गवाहों की गवाही पूर्ण हुए बिना जमानत पर विचार करना उचित नहीं होगा। इस प्रकार इस मामले की अगली सुनवाई करीब तीन माह बाद निर्धारित है। लीना मारिया पॉलोस की ओर से लगातार जमानत की माँग की जा रही है, जबकि जाँच एजेंसियाँ मामले की गंभीरता का हवाला देते हुए इसका विरोध करती आई हैं।
इससे पहले दिल्ली उच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (MCOCA) के तहत दर्ज मामले में लीना को जमानत देने से इनकार कर दिया था। हालाँकि, उच्च न्यायालय ने उनसे जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में जमानत अवश्य दे दी थी।
मामले की पृष्ठभूमि
लीना मारिया पॉलोस को सितंबर 2021 में दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) ने गिरफ्तार किया था। जाँच एजेंसियों के अनुसार, यह मामला रैनबैक्सी के पूर्व प्रमोटर शिविंदर सिंह और मालविंदर सिंह से जुड़ा है। कथित तौर पर सुकेश चंद्रशेखर ने स्वयं को सरकारी अधिकारी बताकर शिविंदर सिंह की पत्नी अदिति सिंह से संपर्क किया और दावा किया कि वह उनके पति को कानूनी मामलों में राहत दिला सकते हैं। इसी के एवज में कथित तौर पर करीब ₹200 करोड़ की रकम वसूली गई।
जाँच एजेंसियों का आरोप है कि सुकेश ने जेल में रहते हुए भी एक बड़ा वसूली नेटवर्क संचालित किया, और लीना मारिया पॉलोस ने कथित तौर पर इसमें सहयोग किया। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने मनी लॉन्ड्रिंग के कोण से अलग जाँच की, जिसमें आरोप है कि ठगी की रकम को छिपाने के लिए फर्जी कंपनियों और अन्य माध्यमों का उपयोग किया गया। जाँच के दौरान सुकेश से जुड़े कई ठिकानों पर छापेमारी की गई और महँगी गाड़ियों व कीमती सामान की बरामदगी का दावा किया गया।
आरोपों पर लीना का पक्ष
लीना मारिया पॉलोस की ओर से इन सभी आरोपों से इनकार किया जाता रहा है। उनके वकीलों ने अदालत में कई दलीलें पेश की हैं और जमानत के लिए विभिन्न आधार सामने रखे हैं। मकोका की धाराएँ लगाए जाने को लेकर भी बचाव पक्ष ने सवाल उठाए हैं, जबकि जाँच एजेंसियाँ इसे संगठित अपराध नेटवर्क का हिस्सा बताती हैं।
आगे क्या होगा
सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के बाद अब निचली अदालत को तीन महीने के भीतर गवाहों की गवाही पूरी करनी होगी। इस समयसीमा के बाद ही जमानत याचिका पर सुनवाई आगे बढ़ेगी। यह मामला न केवल आर्थिक धोखाधड़ी के दृष्टिकोण से, बल्कि मकोका के तहत संगठित अपराध की परिभाषा और उसके प्रयोग की सीमाओं के लिहाज से भी कानूनी रूप से महत्त्वपूर्ण है।