मधुर भंडारकर बोले: 'किसी लॉबी, गैंग या गुट का नहीं हूँ हिस्सा', दर्शकों को बताया असली दौलत
सारांश
मुख्य बातें
फिल्ममेकर मधुर भंडारकर ने 21 अगस्त को मुंबई में अपने सिनेमाई सफर पर बात करते हुए स्पष्ट किया कि स्वतंत्र फिल्मकार के रूप में वे बॉलीवुड की किसी लॉबी, गैंग या गुट का हिस्सा नहीं हैं। उनके अनुसार, एक फिल्म की असली सफलता बॉक्स-ऑफिस के आँकड़ों में नहीं, बल्कि दर्शकों के दिलों में बनने वाली उस स्थायी जगह में है जो फिल्म दशकों बाद भी कायम रहती है।
इंडस्ट्री के दायरे से बाहर का सफर
भंडारकर ने कहा कि फिल्म उद्योग के स्थापित तंत्र से बाहर रहकर फिल्में बनाना आसान नहीं है। उन्होंने कहा, 'इंडिपेंडेंट फिल्ममेकर के तौर पर हम किसी लॉबी, गैंग या गुट का हिस्सा नहीं हैं।' उनका मानना है कि यही स्वतंत्रता उन्हें समाज की उन परतों को पर्दे पर उतारने की ताकत देती है जिन्हें मुख्यधारा का सिनेमा अक्सर नज़रअंदाज़ कर देता है।
बॉक्स-ऑफिस से परे सफलता का पैमाना
भंडारकर ने अपनी चर्चित फिल्मों 'चांदनी बार', 'पेज 3', 'फैशन' और 'हीरोइन' का ज़िक्र करते हुए कहा कि इन फिल्मों ने समाज के अलग-अलग पहलुओं को बेबाकी से सामने रखा। उन्होंने कहा, 'कोई नहीं जानता कि बॉक्स-ऑफिस पर क्या चलेगा। और कब चलेगा। और दर्शकों को क्या पसंद आएगा।' यह बयान उनके उस दर्शन को दर्शाता है जिसमें व्यावसायिक जोखिम के बावजूद ईमानदार कहानियाँ कहने की प्राथमिकता है।
रिसर्च और तैयारी पर जोर
भंडारकर ने बताया कि वे हर फिल्म के बीच दो से तीन साल का अंतराल लेते हैं ताकि उस दुनिया को गहराई से समझ सकें जिसे वे पर्दे पर उतारना चाहते हैं। यह गहन शोध-प्रक्रिया ही उनकी फिल्मों को एक दस्तावेज़ी सच्चाई देती है। उनकी यह कार्यशैली उन्हें उन निर्देशकों से अलग करती है जो एक के बाद एक त्वरित प्रोजेक्ट करते हैं।
ओटीटी और यूट्यूब ने दी नई जिंदगी
भंडारकर ने ओटीटी और यूट्यूब को श्रेय दिया कि इन प्लेटफॉर्म्स ने उनकी पुरानी फिल्मों को नई पीढ़ी तक पहुँचाया। थिएटर में रिलीज़ के कई वर्षों बाद भी युवा दर्शक इन फिल्मों से जुड़ रहे हैं, जो साबित करता है कि सामाजिक विषयों पर बनी ईमानदार फिल्में समय की सीमा नहीं मानतीं।
दर्शक हैं असली दौलत
'चांदनी बार' के स्थायी प्रभाव पर बात करते हुए भंडारकर ने कहा, 'हमारी असली दौलत दर्शक हैं। दर्शकों की वजह से ही हम यहाँ हैं। वे हमें प्यार करते हैं। लोग हमें याद रखते हैं।' उन्होंने जोड़ा कि 20 से 25 साल बाद भी किसी फिल्म की तारीफ होना बॉक्स-ऑफिस की किसी भी सफलता से कहीं अधिक मूल्यवान है। यह भावना उनके समूचे सिनेमाई दृष्टिकोण का सार है — दर्शकों के साथ एक ऐसा रिश्ता जो रिलीज़ की तारीख के बाद भी जीवित रहे।