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नाना पाटेकर की विरासत: 'प्रहार' के लिए 3 साल की सैन्य ट्रेनिंग, कारगिल फ्रंट पर 2 महीने जवानों संग रहे

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नाना पाटेकर की विरासत: 'प्रहार' के लिए 3 साल की सैन्य ट्रेनिंग, कारगिल फ्रंट पर 2 महीने जवानों संग रहे

सारांश

नाना पाटेकर सिर्फ परदे के फौजी नहीं थे — उन्होंने 'प्रहार' के लिए 3 साल मराठा लाइट इन्फैंट्री संग ट्रेनिंग ली, टेरिटोरियल आर्मी में सेवा दी और 1999 में कारगिल फ्रंट पर 2 महीने जवानों के साथ रहे। 76 से 56 किलो — वह अनुभव उन्हें भीतर तक बदल गया।

मुख्य बातें

नाना पाटेकर ने 1991 की फिल्म 'प्रहार: द फाइनल अटैक' के लिए मराठा लाइट इन्फैंट्री के साथ करीब 3 वर्षों तक सैन्य प्रशिक्षण लिया।
'प्रहार' में उन्होंने मेजर प्रताप चौहान का किरदार निभाया और फिल्म के निर्देशक भी थे।
नाना ने आगे चलकर टेरिटोरियल आर्मी में भी सेवा दी।
1999 कारगिल युद्ध के दौरान तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस से अनुमति लेकर करीब 2 महीने तक क्विक रिएक्शन टीम के साथ एलओसी के पास तैनात रहे।
कारगिल से पहले वज़न 76 किलोग्राम , लौटने पर 56 किलोग्राम — उनके अपने शब्दों में यह 'जिंदगी बदल देने वाला अनुभव' था।
पूर्व सेना प्रमुख एवं मिजोरम गवर्नर जनरल वी.के.
सिंह ने एक्स पर श्रद्धांजलि देते हुए उनके समर्पण और कड़ी मेहनत को याद किया।

बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का निधन भारतीय सिनेमा के लिए एक अपूरणीय क्षति है। पर्दे पर सैनिक की भूमिका निभाने वाले अनेक कलाकारों के बीच नाना की कहानी इसलिए अलग है क्योंकि उन्होंने फौजी किरदार के लिए केवल कॉस्ट्यूम नहीं पहना — उन्होंने वर्षों तक असली सैन्य अनुशासन को जिया। 1991 में आई फिल्म 'प्रहार: द फाइनल अटैक' से लेकर 1999 के कारगिल युद्ध तक, उनका सेना से जुड़ाव महज़ अभिनय से कहीं आगे था।

मेजर चौहान के लिए मराठा लाइट इन्फैंट्री के साथ ट्रेनिंग

फिल्म 'प्रहार' में मेजर प्रताप चौहान की भूमिका के लिए नाना ने मराठा लाइट इन्फैंट्री के साथ करीब तीन वर्षों तक सैन्य प्रशिक्षण लिया। रिपोर्टों के मुताबिक, यह ट्रेनिंग महज़ शारीरिक कसरत तक सीमित नहीं थी — इसमें कमांडो तकनीक, अनुशासन और देशभक्ति की वह भावना भी शामिल थी जो एक वास्तविक सैनिक में होती है।

यह फिल्म नाना के लिए दोहरी ज़िम्मेदारी थी — वे इसके निर्देशक भी थे और मुख्य अभिनेता भी। परिणामस्वरूप 'प्रहार' को उस दौर में सैन्य यथार्थवाद के लिए व्यापक सराहना मिली।

टेरिटोरियल आर्मी में सेवा और सेना से गहरा जुड़ाव

फिल्म के बाद भी नाना का सेना से रिश्ता नहीं टूटा। रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने आगे चलकर टेरिटोरियल आर्मी में भी सेवा दी। यह असाधारण था — एक बॉलीवुड अभिनेता का किसी सक्रिय सैन्य संरचना से इस स्तर पर जुड़ना भारतीय सिनेमा के इतिहास में विरले ही देखा गया है।

कारगिल युद्ध: जब नाना युद्धक्षेत्र में उतरे

1999 में जब कारगिल युद्ध भड़का, तब नाना ने दूर बैठकर सैनिकों की हौसलाअफज़ाई करने की बजाय सीधे युद्धक्षेत्र में जाने की इच्छा जताई। इसके लिए उन्होंने तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस से विशेष अनुमति माँगी।

नाना ने बाद में बताया था — 'शुरुआत में उन्हें मना किया गया, लेकिन जब उन्होंने अपनी सैन्य ट्रेनिंग और अनुभव के बारे में बताया तो उन्हें सैनिकों के साथ जाने की अनुमति मिली।' रिपोर्टों के अनुसार वे करीब दो महीने तक सेना के जवानों के साथ रहे, क्विक रिएक्शन टीम का हिस्सा बने और एलओसी के आसपास के क्षेत्रों में तैनात रहे।

कारगिल ने बदल दी ज़िंदगी — 76 से 56 किलो तक

नाना ने एक इंटरव्यू में बताया था कि श्रीनगर पहुँचते समय उनका वज़न करीब 76 किलोग्राम था, जो लौटते वक्त घटकर लगभग 56 किलोग्राम रह गया था। जवानों के साथ बिताया वह समय उनके लिए जीवन की सबसे परिवर्तनकारी अनुभव था।

गौरतलब है कि यह अनुभव केवल शारीरिक नहीं था — नाना ने कई मंचों पर स्वीकार किया कि कारगिल ने उन्हें भीतर से बदल दिया और उनकी देशभक्ति की भावना को एक नई गहराई दी।

जनरल वी.के. सिंह की श्रद्धांजलि

नाना पाटेकर के निधन पर भारत के पूर्व सेना प्रमुख एवं मिजोरम के गवर्नर जनरल वी.के. सिंह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा — 'मैंने 'प्रहार' फिल्म की शूटिंग के दौरान उन्हें करीब से देखा है। वे न केवल एक बेहतरीन अभिनेता थे, बल्कि एक प्रभावशाली व्यक्तित्व भी थे। उन्हें जो भूमिका दी जाती थी, उसमें ढलने के लिए वे कड़ी मेहनत करते थे। उनका समर्पण, कड़ी मेहनत और काम के प्रति गंभीर रवैया उनकी भूमिका में असलियत लाता था। भारतीय सिनेमा में उनका योगदान और उनकी यादें हमेशा बनी रहेंगी। उनके परिवार, दोस्तों और अनगिनत प्रशंसकों के प्रति मेरी गहरी संवेदनाएं। उनकी आत्मा को सद्गति मिले। ओम शांति।'

नाना पाटेकर का यह सफ़र — फिल्मी पर्दे से लेकर वास्तविक युद्धक्षेत्र तक — उन्हें भारतीय सिनेमा में एक ऐसी शख्सियत बनाता है जिनकी विरासत अभिनय की सीमाओं से परे है। उनके किरदार, उनकी आवाज़ और उनका जज़्बा आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

नाना ने कारगिल की ठंडी पहाड़ियों पर जाकर उसे जिया। यह उनकी विरासत का वह पहलू है जो अक्सर उनके फिल्मी करियर की चमक में दब जाता है। जनरल वी.के. सिंह जैसे सैन्य अधिकारी का उनके काम की सराहना करना इस बात की गवाही है कि नाना की प्रतिबद्धता ग्लैमर का आवरण नहीं, बल्कि ठोस यथार्थ था।
RashtraPress
8 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

नाना पाटेकर ने 'प्रहार' के लिए कौन-सी सैन्य ट्रेनिंग ली थी?
नाना पाटेकर ने 1991 की फिल्म 'प्रहार: द फाइनल अटैक' में मेजर प्रताप चौहान की भूमिका के लिए मराठा लाइट इन्फैंट्री के साथ करीब तीन वर्षों तक सैन्य प्रशिक्षण लिया था। इस ट्रेनिंग में कमांडो तकनीक, शारीरिक अनुशासन और सैन्य जीवनशैली शामिल थी।
नाना पाटेकर कारगिल युद्ध में कैसे शामिल हुए?
1999 के कारगिल युद्ध के दौरान नाना पाटेकर ने तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस से विशेष अनुमति माँगकर युद्धक्षेत्र में जाने की इजाज़त ली। रिपोर्टों के अनुसार वे करीब दो महीने तक सेना की क्विक रिएक्शन टीम के साथ एलओसी के पास तैनात रहे।
कारगिल के अनुभव ने नाना पाटेकर को कैसे बदला?
नाना ने स्वयं बताया था कि श्रीनगर पहुँचने पर उनका वज़न करीब 76 किलोग्राम था जो लौटते समय लगभग 56 किलोग्राम रह गया। उन्होंने इस अनुभव को 'जिंदगी बदल देने वाला' करार दिया था।
जनरल वी.के. सिंह ने नाना पाटेकर के बारे में क्या कहा?
पूर्व सेना प्रमुख एवं मिजोरम के गवर्नर जनरल वी.के. सिंह ने एक्स पर श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि उन्होंने 'प्रहार' की शूटिंग के दौरान नाना को करीब से देखा है। उन्होंने नाना के समर्पण, कड़ी मेहनत और भूमिका में असलियत लाने की क्षमता को याद किया।
'प्रहार' फिल्म में नाना पाटेकर की क्या भूमिका थी?
1991 में आई 'प्रहार: द फाइनल अटैक' में नाना पाटेकर ने मेजर प्रताप चौहान का किरदार निभाया था। वे इस फिल्म के निर्देशक भी थे और अभिनेता भी — फिल्म में कमांडो ट्रेनिंग, अनुशासन और देशभक्ति को यथार्थवादी ढंग से दर्शाया गया था।
राष्ट्र प्रेस
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