संजय दत्त का 65वाँ जन्मदिन: नौकर के आँसुओं ने बचाई थी 'मुन्ना भाई' की जान, नशे से वापसी की असली कहानी
सारांश
मुख्य बातें
संजय दत्त — जिन्होंने 'मुन्ना भाई एमबीबीएस' के सीधे-सादे गुंडे से लेकर 'अग्निपथ' के क्रूर कांचा चीना तक अनगिनत किरदारों में जान फूँकी — का 29 जुलाई 1959 को मुंबई में जन्म हुआ था। उनकी असल ज़िंदगी भी उनके पर्दे के किरदारों जितनी ही उथल-पुथल से भरी रही — एक ऐसे दौर में जब नशे की लत ने उन्हें मौत के दरवाज़े तक पहुँचा दिया था, तब घर के एक नौकर की आँखों में छलके आँसुओं ने उन्हें ज़िंदगी की कीमत का एहसास कराया।
फ़िल्मी परिवार, बचपन और पहली झलक
संजय दत्त हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता सुनील दत्त और महान अभिनेत्री नरगिस दत्त के पुत्र हैं। बचपन से ही फ़िल्मों और कला के वातावरण में पले-बढ़े संजय ने 1971 में फ़िल्म 'रेशमा और शेरा' में बाल कलाकार के रूप में पहली बार कैमरे का सामना किया। उस छोटी-सी भूमिका ने ही यह तय कर दिया था कि उनका भविष्य पर्दे से जुड़ा होगा।
बॉलीवुड में आगाज़ और माँ का जाना
1981 में फ़िल्म 'रॉकी' से संजय दत्त ने बतौर मुख्य अभिनेता बॉलीवुड में क़दम रखा। यह फ़िल्म उनके पिता सुनील दत्त ने निर्देशित की थी और इसने उन्हें रातोंरात चर्चा में ला दिया। लेकिन इसी कामयाबी के दौर में उनकी माँ नरगिस दत्त का निधन हो गया — एक ऐसा ज़ख्म जिसने उन्हें भीतर से तोड़ दिया। गौरतलब है कि यह वही समय था जब कॉलेज के दिनों में शुरू हुई नशे की लत धीरे-धीरे उनके जीवन को निगलने लगी थी।
वह रात जब नौकर के आँसुओं ने बदल दी ज़िंदगी
संजय दत्त ने खुद कई साक्षात्कारों में स्वीकार किया है कि नशे की गिरफ्त में वह इस हद तक चले गए थे कि उन्हें अपनी जान की भी परवाह नहीं रही। एक बार वह इतने अधिक नशे में थे कि लगातार करीब दो दिन तक सोते रहे। होश आने पर जब उन्होंने घर के नौकर से खाना माँगा, तो नौकर उन्हें देखकर रो पड़ा। कारण पूछने पर उसने बताया कि इतने लंबे समय तक सोते देख घर के सभी लोग डर गए थे और उन्हें किसी अनहोनी की आशंका सताने लगी थी।
संजय दत्त के अनुसार उस पल उन्हें पहली बार यह एहसास हुआ कि उनकी जान वाकई ख़तरे में है। एक नौकर की आँखों में उनके लिए बहते आँसुओं ने वह काम किया जो शायद कोई बड़ी नसीहत नहीं कर पाती। यही वह मोड़ था जिसने उन्हें झकझोरा।
परिवार का साथ और नशे से मुक्ति
इस घटना के बाद संजय दत्त ने अपने पिता सुनील दत्त के सामने मदद माँगी और साफ़ कहा कि वह इस जीवन से बाहर निकलना चाहते हैं। परिवार ने पूरा साथ दिया और इलाज के ज़रिए उन्होंने धीरे-धीरे नशे की आदत से छुटकारा पाया। यह संघर्ष आसान नहीं था, लेकिन परिवार की मज़बूत नींव ने उन्हें थामे रखा।
करियर की शानदार वापसी और विवाद
नशे से उबरने के बाद संजय दत्त ने 'नाम', 'साजन', 'सड़क', 'खलनायक', 'मिशन कश्मीर' और 'वास्तव: द रियलिटी' जैसी फ़िल्मों से अपनी अभिनय क्षमता साबित की। 1999 में 'वास्तव' में रघु के किरदार के लिए उन्हें फ़िल्मफेयर अवॉर्ड से नवाज़ा गया। इसके बाद 'मुन्ना भाई एमबीबीएस' और 'लगे रहो मुन्ना भाई' ने उन्हें घर-घर का चेहरा बना दिया। उन्होंने 'कांटे', 'अग्निपथ', 'पीके' और 'केजीएफ: चैप्टर 2' जैसी फ़िल्मों में भी अलग-अलग रंग दिखाए।
हालाँकि उनकी ज़िंदगी विवादों से भी अछूती नहीं रही। 1993 मुंबई बम धमाकों से जुड़े हथियार रखने के मामले में उन्हें लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी और जेल की सज़ा भी हुई। 2016 में सज़ा पूरी करने के बाद उन्होंने एक बार फिर फ़िल्मी दुनिया में वापसी की — यह उनके जीवट का प्रमाण था।
आज 29 जुलाई 2024 को 65 वर्ष के हो रहे संजय दत्त की यह यात्रा बताती है कि टूटना और फिर खड़े होना — यही उनकी असली पहचान है।