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संजय मिश्रा ने छोड़ी थी एक्टिंग, ऋषिकेश के ढाबे पर बनाते थे ऑमलेट; रोहित शेट्टी ने दिलाई वापसी

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संजय मिश्रा ने छोड़ी थी एक्टिंग, ऋषिकेश के ढाबे पर बनाते थे ऑमलेट; रोहित शेट्टी ने दिलाई वापसी

सारांश

बॉलीवुड के सबसे भरोसेमंद चेहरों में से एक संजय मिश्रा ने पिता के जाने के बाद सब कुछ छोड़ दिया था — यहाँ तक कि अपनी पहचान भी। ऋषिकेश के एक ढाबे पर ऑमलेट बनाते इस कलाकार को रोहित शेट्टी ने वापस लाया और फिर 'आंखों देखी' ने उन्हें सितारों की कतार में खड़ा कर दिया।

मुख्य बातें

संजय मिश्रा का जन्म 6 अक्टूबर 1963 को वाराणसी में हुआ; उन्होंने 1989 में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से स्नातक किया।
पिता के निधन के बाद उन्होंने फिल्में छोड़ दीं और ऋषिकेश के एक ढाबे पर ऑमलेट बनाने का काम किया।
ढाबे पर ग्राहक उन्हें पहचान लेते थे, लेकिन वे खुद को अभिनेता का हमशक्ल बताकर टाल देते थे।
निर्देशक रोहित शेट्टी के आग्रह पर वे 'ऑल द बेस्ट' से वापस लौटे और करियर ने नई रफ्तार पकड़ी।
'आंखों देखी' में गंभीर अभिनय के लिए उन्हें फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार मिला।

बॉलीवुड अभिनेता संजय मिश्रा का नाम सुनते ही दर्शकों के चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान आ जाती है — वह मुस्कान जो किसी परिचित और भरोसेमंद कलाकार के लिए होती है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस मंजे हुए अभिनेता ने एक वक्त फिल्मी दुनिया से पूरी तरह नाता तोड़ लिया था और ऋषिकेश के एक ढाबे पर ऑमलेट बनाकर गुज़ारा कर रहे थे। यह कहानी है एक कलाकार के टूटने, फिर उठने और दोबारा चमकने की।

शुरुआती जीवन और रंगमंच की नींव

6 अक्टूबर 1963 को जन्मे संजय मिश्रा का बचपन वाराणसी में बीता, जहाँ संस्कृति और कला की जड़ें गहरी हैं। अभिनय का सपना लेकर वे नई दिल्ली पहुँचे और देश के सबसे प्रतिष्ठित नाट्य संस्थान नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) में दाखिला लिया। 1989 में वहाँ से स्नातक करने के बाद उन्होंने थिएटर और टेलीविजन के माध्यम से अपनी अदाकारी को धार देना शुरू किया।

फिल्मों में उनका सफर 'ओह डार्लिंग! ये है इंडिया!' से आरंभ हुआ। इसके बाद 'सत्या', 'दिल से..', 'वजूद', 'राजकुमार' और 'फिर भी दिल है हिंदुस्तानी' जैसी फिल्मों में उनकी उपस्थिति दर्ज हुई। धीरे-धीरे एक ऐसे बहुआयामी कलाकार के रूप में उनकी छवि बनती गई, जो हर तरह के किरदार को अपने रंग में रंग सकता है।

पिता के निधन का गहरा आघात और ढाबे पर नई ज़िंदगी

निजी जीवन में आए एक बड़े तूफान ने सब कुछ बदल दिया। पिता के निधन के बाद संजय मिश्रा अंदर से टूट गए। मुंबई की चकाचौंध उन्हें असहनीय लगने लगी और उन्होंने सब कुछ पीछे छोड़कर ऋषिकेश का रुख किया। वहाँ एक साधारण ढाबे पर काम करते हुए वे लोगों के लिए ऑमलेट बनाने लगे — एक बॉलीवुड अभिनेता के लिए यह कदम जितना असाधारण था, उतना ही मानवीय भी।

गौरतलब है कि ढाबे पर आने वाले कुछ ग्राहक उन्हें पहचान भी लेते थे। जब लोग पूछते कि क्या वे 'गोलमाल' वाले संजय मिश्रा हैं, तो वे मज़ाक में कह देते थे कि वे बस उस अभिनेता के हमशक्ल हैं। यह वाकया उनके उस मनोभाव को दर्शाता है जिसमें वे अपनी पुरानी पहचान से दूर एक नई, शांत ज़िंदगी जीना चाहते थे।

रोहित शेट्टी ने बढ़ाया हाथ, हुई शानदार वापसी

किस्मत ने हार नहीं मानी। फिल्म निर्देशक रोहित शेट्टी ने उन्हें दोबारा कैमरे के सामने आने के लिए मनाया। इसके बाद 'ऑल द बेस्ट' में उन्हें भूमिका मिली और यहीं से उनके करियर ने एक नई उड़ान भरी। यह ऐसे समय में आया जब फिल्म उद्योग में किसी की वापसी को अक्सर संदेह की नज़र से देखा जाता है।

'गोलमाल: फन अनलिमिटेड' और 'धमाल' में उनकी कॉमेडी ने दर्शकों को लोटपोट कर दिया। वहीं 'आंखों देखी' में उन्होंने अपने गंभीर अभिनय से सबको चौंका दिया। इस फिल्म में उनकी अदाकारी को व्यापक सराहना मिली और समीक्षकों ने उन्हें फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार से नवाज़ा।

बहुमुखी प्रतिभा का सफरनामा

'वध' और 'भूल भुलैया' जैसी फिल्मों में भी उन्होंने विविध भूमिकाएँ निभाईं। संजय मिश्रा की खासियत यही है कि वे छोटे से छोटे किरदार में भी ऐसी जान फूँक देते हैं कि दर्शक उसे याद रखते हैं। NSD से मिली प्रशिक्षण की नींव और जीवन के कठिन अनुभव मिलकर उन्हें एक असाधारण कलाकार बनाते हैं।

संजय मिश्रा की यह यात्रा बताती है कि असफलता और एकांत कभी-कभी किसी कलाकार को उसकी सबसे बड़ी भूमिकाओं के लिए तैयार करते हैं — और ऋषिकेश के उस ढाबे से 'आंखों देखी' के मंच तक का सफर इसका जीता-जागता प्रमाण है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि पहचान की राजनीति से मुक्ति की कोशिश थी। यह उद्योग के उस ढाँचे पर भी सवाल उठाता है जो कलाकारों को भावनात्मक संकट में अकेला छोड़ देता है। उनकी वापसी और 'आंखों देखी' की सफलता यह भी बताती है कि असली प्रतिभा को दरकिनार करना मुश्किल है — बशर्ते कोई एक व्यक्ति हाथ बढ़ाए।
RashtraPress
5 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

संजय मिश्रा ने एक्टिंग क्यों छोड़ी थी?
संजय मिश्रा ने अपने पिता के निधन के बाद एक्टिंग से दूरी बनाने का फैसला किया था। इस व्यक्तिगत आघात के बाद वे मुंबई छोड़कर ऋषिकेश चले गए और वहाँ एक ढाबे पर काम करने लगे।
ऋषिकेश के ढाबे पर संजय मिश्रा क्या करते थे?
ऋषिकेश के ढाबे पर संजय मिश्रा लोगों के लिए ऑमलेट बनाते थे। कुछ ग्राहक उन्हें पहचान लेते थे, लेकिन वे खुद को उस अभिनेता का हमशक्ल बताकर बात टाल देते थे।
संजय मिश्रा की फिल्मों में वापसी कैसे हुई?
निर्देशक रोहित शेट्टी ने संजय मिश्रा को दोबारा फिल्मों में आने के लिए मनाया। इसके बाद उन्हें फिल्म 'ऑल द बेस्ट' में काम मिला और वहीं से उनके करियर ने फिर रफ्तार पकड़ी।
संजय मिश्रा को फिल्मफेयर पुरस्कार किस फिल्म के लिए मिला?
संजय मिश्रा को फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार फिल्म 'आंखों देखी' में उनके गंभीर और सशक्त अभिनय के लिए मिला। इस भूमिका ने उन्हें कॉमेडी से परे एक गंभीर अदाकार के रूप में स्थापित किया।
संजय मिश्रा ने NSD से कब स्नातक किया?
संजय मिश्रा ने नई दिल्ली के नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) से 1989 में स्नातक किया। इससे पहले उनका बचपन वाराणसी में बीता था।
राष्ट्र प्रेस
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