1 नवंबर 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

सोहराब मोदी की आवाज़ का जादू: नेत्रहीन दर्शक भी खिंचा चला आया थिएटर

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
सोहराब मोदी की आवाज़ का जादू: नेत्रहीन दर्शक भी खिंचा चला आया थिएटर

सारांश

सोहराब मोदी की आवाज़ सिर्फ सिनेमाई संवाद नहीं थी — वह एक अनुभव थी। जब 'शीश महल' की स्क्रीनिंग में एक नेत्रहीन दर्शक केवल उनकी आवाज़ सुनने थिएटर पहुँचा, तो यह पल किसी भी कलाकार के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि बन गया। 2 नवंबर को उनकी जयंती पर यह किस्सा उनकी अमर विरासत को याद दिलाता है।

मुख्य बातें

सोहराब मोदी का जन्म 2 नवंबर 1897 को मुंबई के एक पारसी परिवार में हुआ था।
उनकी फ़िल्म 'शीश महल' (1950) की स्क्रीनिंग में एक नेत्रहीन दर्शक केवल उनकी आवाज़ और संवाद सुनने के लिए थिएटर पहुँचा था।
1952 में उन्होंने भारत की पहली टेक्नीकलर फ़िल्म 'झाँसी की रानी' बनाकर इतिहास रचा।
उनकी प्रमुख फ़िल्मों में 'पुकार' , 'सिकंदर' , 'मिर्ज़ा गालिब' (1954) और 'रज़िया सुल्तान' (1983) शामिल हैं।
1980 में उन्हें भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

भारतीय सिनेमा के इतिहास में सोहराब मोदी एक ऐसे अनूठे कलाकार रहे, जिनकी भारी, बुलंद और गूँजती आवाज़ ने दर्शकों पर ऐसा जादू किया कि लोग केवल उनके संवाद सुनने के लिए सिनेमाघरों तक चले आते थे। इस असर की सबसे यादगार मिसाल वह किस्सा है, जब उनकी फ़िल्म 'शीश महल' (1950) की स्क्रीनिंग के दौरान एक नेत्रहीन व्यक्ति खास तौर पर उनकी आवाज़ और दमदार संवाद सुनने के लिए थिएटर पहुँचा था।

जन्म और प्रारंभिक जीवन

सोहराब मोदी का जन्म 2 नवंबर 1897 को बॉम्बे (अब मुंबई) के एक पारसी परिवार में हुआ था। बचपन में ही उन्होंने अपनी माँ को खो दिया। उनका प्रारंभिक जीवन रामपुर में बीता, जहाँ उन्होंने हिंदी और उर्दू भाषाओं पर गहरी पकड़ बनाई।

उर्दू के प्रति उनका गहरा लगाव आगे चलकर उनकी अभिनय शैली में भी स्पष्ट रूप से झलका। बताया जाता है कि बचपन में जब उन्होंने अपने स्कूल के प्रिंसिपल से अपने भविष्य के बारे में पूछा, तो उनकी गूँजती आवाज़ सुनकर प्रिंसिपल ने उन्हें अभिनेता या राजनेता बनने की सलाह दी थी — शायद यही वह क्षण था जिसने उनके भीतर कलाकार बनने का बीज बोया।

रंगमंच और फ़िल्मी दुनिया में प्रवेश

सोहराब मोदी का परिचय फ़िल्मों की दुनिया से महज 16 वर्ष की आयु में हो गया था, जब उनके भाई की एक ट्रैवलिंग सिनेमा कंपनी थी। उन्होंने अपने भाई के साथ स्टेज फ़िल्म कंपनी की स्थापना की और रंगमंच से उनका गहरा जुड़ाव रहा।

उन्होंने उर्दू में शेक्सपियर के नाटकों का भी सफल मंचन किया। 1937 में उन्होंने 'आत्मतरंग' से बतौर फ़िल्म निर्माता अपनी पारी शुरू की। यह फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर भले ही अपेक्षित सफलता न पा सकी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। इसके बाद 'जेलर', 'मीठा जहर' और 'भरोसा' जैसी फ़िल्मों के ज़रिये उन्होंने सामाजिक मुद्दों को बड़े पर्दे पर प्रभावशाली ढंग से उठाया।

ऐतिहासिक फ़िल्मों का स्वर्णिम अध्याय

सोहराब मोदी सिर्फ एक कुशल अभिनेता नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी फ़िल्म निर्माता और निर्देशक भी थे। 'पुकार', 'सिकंदर' और 'पृथ्वी वल्लभ' जैसी ऐतिहासिक फ़िल्मों ने उन्हें एक अलग पहचान दिलाई।

1952 में उन्होंने भारत की पहली टेक्नीकलर फ़िल्म 'झाँसी की रानी' बनाकर सिनेमाई इतिहास में अपना नाम दर्ज करा लिया। 'मिर्ज़ा गालिब' (1954) भी उनकी उत्कृष्ट कृतियों में गिनी जाती है, जिसमें उर्दू शायरी और संगीत का अद्भुत संगम देखने को मिला था।

वह नेत्रहीन दर्शक — आवाज़ की सबसे बड़ी श्रद्धांजलि

सोहराब मोदी की आवाज़ के जादू का सबसे मार्मिक किस्सा उनकी फ़िल्म 'शीश महल' (1950) की एक स्क्रीनिंग से जुड़ा है। बताया जाता है कि उस शाम सोहराब मोदी खुद भी थिएटर में उपस्थित थे। उनकी नज़र एक ऐसे दर्शक पर पड़ी जो आँखें बंद करके बैठा था।

पहले तो उन्हें लगा कि शायद वह दर्शक फ़िल्म में रुचि नहीं ले रहा, लेकिन जब पता चला कि वह व्यक्ति नेत्रहीन था और केवल उनकी आवाज़ और संवाद सुनने के लिए थिएटर तक आया था, तो यह पल किसी भी कलाकार के लिए सर्वोच्च सम्मान से कम नहीं था। गौरतलब है कि यह किस्सा इस बात का प्रमाण है कि उनकी कला पर्दे की सीमाओं से कहीं आगे जाती थी।

सम्मान और विरासत

सोहराब मोदी के बहुआयामी योगदान को देखते हुए 1980 में उन्हें भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से नवाज़ा गया। 1983 में आई फ़िल्म 'रज़िया सुल्तान' में वह आखिरी बार रुपहले पर्दे पर नज़र आए।

उनकी विरासत आज भी भारतीय सिनेमा प्रेमियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है — एक ऐसे कलाकार की, जिसकी आवाज़ ने न सिर्फ आँखों वाले दर्शकों को बल्कि नेत्रहीनों को भी अपना दीवाना बना दिया।

संपादकीय दृष्टिकोण

दृष्टिहीनता के पार भी पहुँचती है। आज जब भारतीय सिनेमा तकनीकी चमक-दमक में डूबा है, तो यह प्रश्न उठता है कि क्या हमारे वर्तमान कलाकारों की आवाज़ में वह गहराई है जो केवल सुनकर ही दर्शक को बाँध ले? उनकी जयंती (2 नवंबर) पर यह किस्सा मुख्यधारा की कवरेज में अक्सर महज 'नॉस्टेल्जिया' बनकर रह जाता है, जबकि असली बात यह है कि उन्होंने उर्दू, शेक्सपियर और ऐतिहासिक कथाओं को एक साथ भारतीय जनमानस तक पहुँचाया — यह सांस्कृतिक सेतु निर्माण की विरासत है, जिसे दोहराया जाना चाहिए।
RashtraPress
1 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सोहराब मोदी कौन थे और वे क्यों प्रसिद्ध हैं?
सोहराब मोदी भारतीय सिनेमा के एक महान अभिनेता, निर्माता और निर्देशक थे, जो अपनी भारी और गूँजती आवाज़ के लिए विशेष रूप से जाने जाते थे। उन्होंने 'झाँसी की रानी' (भारत की पहली टेक्नीकलर फ़िल्म), 'सिकंदर', 'पुकार' और 'मिर्ज़ा गालिब' जैसी यादगार फ़िल्में बनाईं और 1980 में दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित हुए।
नेत्रहीन दर्शक वाला किस्सा किस फ़िल्म से जुड़ा है?
यह किस्सा सोहराब मोदी की फ़िल्म 'शीश महल' (1950) की एक स्क्रीनिंग से जुड़ा है। बताया जाता है कि उस स्क्रीनिंग के दौरान एक नेत्रहीन व्यक्ति केवल सोहराब मोदी की आवाज़ और दमदार संवाद सुनने के लिए थिएटर आया था, जबकि सोहराब मोदी खुद भी उस समय थिएटर में उपस्थित थे।
सोहराब मोदी का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
सोहराब मोदी का जन्म 2 नवंबर 1897 को बॉम्बे (अब मुंबई) के एक पारसी परिवार में हुआ था। उनका प्रारंभिक जीवन रामपुर में बीता, जहाँ उन्होंने हिंदी और उर्दू पर गहरी पकड़ हासिल की।
सोहराब मोदी को दादासाहेब फाल्के पुरस्कार कब मिला?
सोहराब मोदी को भारतीय सिनेमा में उनके बहुआयामी योगदान के लिए 1980 में दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 1983 में आई फ़िल्म 'रज़िया सुल्तान' उनकी अंतिम फ़िल्म थी।
भारत की पहली टेक्नीकलर फ़िल्म कौन-सी थी और किसने बनाई?
भारत की पहली टेक्नीकलर फ़िल्म 'झाँसी की रानी' थी, जिसे सोहराब मोदी ने 1952 में बनाया था। यह फ़िल्म भारतीय सिनेमा के तकनीकी इतिहास में एक मील का पत्थर मानी जाती है।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 1 महीना पहले
  2. 2 महीने पहले
  3. 3 महीने पहले
  4. 5 महीने पहले
  5. 5 महीने पहले
  6. 10 महीने पहले
  7. 12 महीने पहले
  8. 1 साल पहले