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'तितली उड़ी' गायिका शारदा राजन अयंगर: तेहरान की पार्टियों से राज कपूर ने बॉलीवुड पहुँचाया

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'तितली उड़ी' गायिका शारदा राजन अयंगर: तेहरान की पार्टियों से राज कपूर ने बॉलीवुड पहुँचाया

सारांश

तेहरान की एक पार्टी में गाया गया एक गाना — और राज कपूर की एक दावत — ने शारदा राजन अयंगर को बॉलीवुड की सबसे चमकदार आवाज़ों में से एक बना दिया। 'तितली उड़ी' की अभूतपूर्व सफलता ने फिल्मफेयर को महिला-पुरुष पार्श्वगायन की अलग श्रेणियाँ बनाने पर मजबूर किया — यह विरासत उनकी आवाज़ जितनी ही अमर है।

मुख्य बातें

शारदा राजन अयंगर का जन्म 25 अक्टूबर 1933 को तमिलनाडु के कुंभकोणम में हुआ था।
उनके करियर की शुरुआत तेहरान की भारतीय पार्टियों से हुई, जहाँ राज कपूर ने उनकी आवाज सुनकर मुंबई आने का न्योता दिया।
1966 में फिल्म 'सूरज' के गाने 'तितली उड़ी' ने उन्हें रातोंरात सुपरस्टार बना दिया।
'तितली उड़ी' और 'बहारों फूल बरसाओ' को बराबर वोट मिलने के बाद फिल्मफेयर ने पुरुष और महिला पार्श्वगायन के लिए अलग श्रेणियाँ बनाईं।
1971 में उन्होंने 'सिजलर्स' रिकॉर्ड किया — किसी भारतीय महिला गायिका का पहला पॉप एल्बम।
14 जून 2023 को कैंसर के चलते मुंबई में उनका निधन हो गया।

पार्श्व गायिका शारदा राजन अयंगर — जिन्हें संगीत-प्रेमी आज भी सिर्फ 'शारदा' के नाम से जानते हैं — का सफर किसी फिल्मी स्टूडियो की सीढ़ियों से नहीं, बल्कि ईरान की राजधानी तेहरान में होने वाली भारतीय समुदाय की पार्टियों से शुरू हुआ था। 1960 और 70 के दशक में अपनी मीठी और जादुई आवाज से उन्होंने हिंदी सिनेमा में एक अलग पहचान बनाई, जो दशकों बाद भी फीकी नहीं पड़ी।

प्रारंभिक जीवन और तेहरान में संगीत की शुरुआत

शारदा राजन अयंगर का जन्म 25 अक्टूबर 1933 को तमिलनाडु के कुंभकोणम में हुआ था। बचपन से ही संगीत उनके स्वभाव में रचा-बसा था — वह हिंदी गानों को तमिल में लिखकर गुनगुनाया करती थीं। बाद में उनका परिवार तेहरान चला गया, जहाँ वह वहाँ बसे भारतीय समुदाय की महफिलों में गाने प्रस्तुत करती थीं।

यह शौक ही उनके भाग्य का द्वार बन गया। एक बड़े फिल्म वितरक श्रीचंद आहुजा ने तेहरान में फिल्मकार राज कपूर के सम्मान में एक पार्टी आयोजित की, जिसमें शारदा ने अपनी आवाज का जादू बिखेरा। उनकी गायकी से प्रभावित होकर राज कपूर ने उन्हें मुंबई आने का न्योता दिया।

राज कपूर से मिली बॉलीवुड में एंट्री

मुंबई पहुँचने पर राज कपूर ने शारदा को प्रसिद्ध संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन के शंकर से मिलवाया। शारदा ने उस्ताद जगन्नाथ प्रसाद और गायक मुकेश से संगीत की विधिवत शिक्षा भी ली। यह गुरु-शिष्य परंपरा उनकी आवाज को एक शास्त्रीय गहराई देने में कारगर साबित हुई।

1966 में फिल्म 'सूरज' से उन्होंने बॉलीवुड में अपना पहला कदम रखा। इस फिल्म का गाना 'तितली उड़ी, उड़ जो चली' सुपरहिट रहा और उन्हें रातोंरात एक जाना-पहचाना नाम बना दिया। इसके बाद 'गुमनाम', 'शतरंज' और 'अराउंड द वर्ल्ड' जैसी फिल्मों में उनके गाने याद किए जाते रहे।

फिल्मफेयर इतिहास से जुड़ी खास कड़ी

शारदा के करियर से जुड़ा एक दिलचस्प प्रसंग फिल्मफेयर पुरस्कारों के इतिहास से जुड़ा है। कहा जाता है कि उस दौर में सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायन के लिए एक ही श्रेणी थी — पुरुष और महिला गायकों के बीच कोई अलगाव नहीं था। मोहम्मद रफी के गाने 'बहारों फूल बरसाओ' और शारदा के 'तितली उड़ी' को समान वोट मिले। पुरस्कार रफी को मिला, किंतु इस अभूतपूर्व टाई को देखते हुए शारदा को एक विशेष पुरस्कार प्रदान किया गया।

इस घटना के बाद फिल्मफेयर ने अगले वर्ष से महिला और पुरुष पार्श्वगायकों के लिए अलग-अलग श्रेणियाँ बना दीं। इसके बाद शारदा 1969 से 1972 तक लगातार नामांकित होती रहीं — और यह तब था जब लता मंगेशकर और आशा भोसले जैसी दिग्गज गायिकाओं का दबदबा था।

विविध सहयोगी और संगीत का फैलाव

शारदा ने अपने करियर में मोहम्मद रफी, किशोर कुमार, मुकेश, आशा भोसले और के.जे. येसुदास जैसे दिग्गजों के साथ युगल गाने गाए। उन्होंने वैजयंतीमाला, साधना, हेमा मालिनी, रेखा, शर्मिला टैगोर और मुमताज जैसी अभिनेत्रियों को अपनी आवाज दी। हिंदी के अलावा उन्होंने तेलुगू, मराठी, अंग्रेजी और गुजराती भाषाओं में भी गाने गाए।

1971 में उन्होंने 'सिजलर्स' नाम से एक पॉप एल्बम रिकॉर्ड किया, जिसे किसी भारतीय महिला गायिका का पहला पॉप एल्बम माना जाता है। 2007 में उन्होंने मिर्जा गालिब की गज़लों पर आधारित एल्बम 'अंदाज-ए-बयां' भी रिलीज किया।

अंतिम गीत और विदाई

1986 में फिल्म 'काँच की दीवार' में उन्होंने अपना आखिरी फिल्मी गाना रिकॉर्ड किया। करीब 20 वर्षों के करियर में उन्होंने हिंदी सिनेमा को कुछ ऐसे नगीने दिए, जिनकी चमक आज भी बरकरार है। 14 जून 2023 को मुंबई में कैंसर की बीमारी के चलते उनका निधन हो गया। उनकी आवाज का यह सफर तेहरान की एक पार्टी से शुरू होकर भारतीय संगीत के स्वर्णिम अध्याय का हिस्सा बन गया।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि तेहरान की एक महफिल में हुई। यह तथ्य कि उनके एक गाने ने फिल्मफेयर को अपनी पुरस्कार संरचना बदलने पर मजबूर किया, बताता है कि उनका योगदान कितना संस्थागत रहा — फिर भी मुख्यधारा की चर्चाओं में वह लता-आशा की छाया में अक्सर अनदेखी रह जाती हैं। उनकी विरासत को उचित स्थान दिलाने की ज़िम्मेदारी अभी भी बाकी है।
RashtraPress
24 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शारदा राजन अयंगर कौन थीं?
शारदा राजन अयंगर 1960-70 के दशक की प्रमुख हिंदी पार्श्व गायिका थीं, जिन्हें 'तितली उड़ी' गाने से अपार प्रसिद्धि मिली। उनका जन्म 25 अक्टूबर 1933 को तमिलनाडु के कुंभकोणम में हुआ था और 14 जून 2023 को मुंबई में उनका निधन हुआ।
राज कपूर ने शारदा को बॉलीवुड में कैसे लाया?
तेहरान में फिल्म वितरक श्रीचंद आहुजा द्वारा आयोजित एक पार्टी में शारदा के गाने सुनकर राज कपूर इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उन्हें मुंबई आने का न्योता दिया। मुंबई आने पर राज कपूर ने उन्हें संगीतकार शंकर से मिलवाया, जिससे उनकी बॉलीवुड यात्रा शुरू हुई।
'तितली उड़ी' गाने ने फिल्मफेयर अवॉर्ड को कैसे बदल दिया?
1966 में 'तितली उड़ी' और मोहम्मद रफी के 'बहारों फूल बरसाओ' को फिल्मफेयर में बराबर वोट मिले, जिससे पुरस्कार टाई हो गया। पुरस्कार रफी को मिला, लेकिन शारदा को विशेष पुरस्कार दिया गया; और अगले वर्ष से फिल्मफेयर ने महिला व पुरुष पार्श्वगायकों के लिए अलग-अलग श्रेणियाँ शुरू कर दीं।
शारदा का पहला पॉप एल्बम कौन सा था?
1971 में शारदा ने 'सिजलर्स' नाम से पॉप एल्बम रिकॉर्ड किया, जिसे किसी भारतीय महिला गायिका का पहला पॉप एल्बम माना जाता है। इससे उनकी बहुमुखी संगीत प्रतिभा का परिचय मिला।
शारदा ने बॉलीवुड में आखिरी बार कब गाया?
शारदा ने 1986 में फिल्म 'काँच की दीवार' के लिए अपना आखिरी फिल्मी गाना रिकॉर्ड किया। इसके बाद भी वह सक्रिय रहीं और 2007 में गालिब की गज़लों पर आधारित एल्बम 'अंदाज-ए-बयां' रिलीज किया।
राष्ट्र प्रेस
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