'तितली उड़ी' गायिका शारदा राजन अयंगर: तेहरान की पार्टियों से राज कपूर ने बॉलीवुड पहुँचाया
सारांश
मुख्य बातें
पार्श्व गायिका शारदा राजन अयंगर — जिन्हें संगीत-प्रेमी आज भी सिर्फ 'शारदा' के नाम से जानते हैं — का सफर किसी फिल्मी स्टूडियो की सीढ़ियों से नहीं, बल्कि ईरान की राजधानी तेहरान में होने वाली भारतीय समुदाय की पार्टियों से शुरू हुआ था। 1960 और 70 के दशक में अपनी मीठी और जादुई आवाज से उन्होंने हिंदी सिनेमा में एक अलग पहचान बनाई, जो दशकों बाद भी फीकी नहीं पड़ी।
प्रारंभिक जीवन और तेहरान में संगीत की शुरुआत
शारदा राजन अयंगर का जन्म 25 अक्टूबर 1933 को तमिलनाडु के कुंभकोणम में हुआ था। बचपन से ही संगीत उनके स्वभाव में रचा-बसा था — वह हिंदी गानों को तमिल में लिखकर गुनगुनाया करती थीं। बाद में उनका परिवार तेहरान चला गया, जहाँ वह वहाँ बसे भारतीय समुदाय की महफिलों में गाने प्रस्तुत करती थीं।
यह शौक ही उनके भाग्य का द्वार बन गया। एक बड़े फिल्म वितरक श्रीचंद आहुजा ने तेहरान में फिल्मकार राज कपूर के सम्मान में एक पार्टी आयोजित की, जिसमें शारदा ने अपनी आवाज का जादू बिखेरा। उनकी गायकी से प्रभावित होकर राज कपूर ने उन्हें मुंबई आने का न्योता दिया।
राज कपूर से मिली बॉलीवुड में एंट्री
मुंबई पहुँचने पर राज कपूर ने शारदा को प्रसिद्ध संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन के शंकर से मिलवाया। शारदा ने उस्ताद जगन्नाथ प्रसाद और गायक मुकेश से संगीत की विधिवत शिक्षा भी ली। यह गुरु-शिष्य परंपरा उनकी आवाज को एक शास्त्रीय गहराई देने में कारगर साबित हुई।
1966 में फिल्म 'सूरज' से उन्होंने बॉलीवुड में अपना पहला कदम रखा। इस फिल्म का गाना 'तितली उड़ी, उड़ जो चली' सुपरहिट रहा और उन्हें रातोंरात एक जाना-पहचाना नाम बना दिया। इसके बाद 'गुमनाम', 'शतरंज' और 'अराउंड द वर्ल्ड' जैसी फिल्मों में उनके गाने याद किए जाते रहे।
फिल्मफेयर इतिहास से जुड़ी खास कड़ी
शारदा के करियर से जुड़ा एक दिलचस्प प्रसंग फिल्मफेयर पुरस्कारों के इतिहास से जुड़ा है। कहा जाता है कि उस दौर में सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायन के लिए एक ही श्रेणी थी — पुरुष और महिला गायकों के बीच कोई अलगाव नहीं था। मोहम्मद रफी के गाने 'बहारों फूल बरसाओ' और शारदा के 'तितली उड़ी' को समान वोट मिले। पुरस्कार रफी को मिला, किंतु इस अभूतपूर्व टाई को देखते हुए शारदा को एक विशेष पुरस्कार प्रदान किया गया।
इस घटना के बाद फिल्मफेयर ने अगले वर्ष से महिला और पुरुष पार्श्वगायकों के लिए अलग-अलग श्रेणियाँ बना दीं। इसके बाद शारदा 1969 से 1972 तक लगातार नामांकित होती रहीं — और यह तब था जब लता मंगेशकर और आशा भोसले जैसी दिग्गज गायिकाओं का दबदबा था।
विविध सहयोगी और संगीत का फैलाव
शारदा ने अपने करियर में मोहम्मद रफी, किशोर कुमार, मुकेश, आशा भोसले और के.जे. येसुदास जैसे दिग्गजों के साथ युगल गाने गाए। उन्होंने वैजयंतीमाला, साधना, हेमा मालिनी, रेखा, शर्मिला टैगोर और मुमताज जैसी अभिनेत्रियों को अपनी आवाज दी। हिंदी के अलावा उन्होंने तेलुगू, मराठी, अंग्रेजी और गुजराती भाषाओं में भी गाने गाए।
1971 में उन्होंने 'सिजलर्स' नाम से एक पॉप एल्बम रिकॉर्ड किया, जिसे किसी भारतीय महिला गायिका का पहला पॉप एल्बम माना जाता है। 2007 में उन्होंने मिर्जा गालिब की गज़लों पर आधारित एल्बम 'अंदाज-ए-बयां' भी रिलीज किया।
अंतिम गीत और विदाई
1986 में फिल्म 'काँच की दीवार' में उन्होंने अपना आखिरी फिल्मी गाना रिकॉर्ड किया। करीब 20 वर्षों के करियर में उन्होंने हिंदी सिनेमा को कुछ ऐसे नगीने दिए, जिनकी चमक आज भी बरकरार है। 14 जून 2023 को मुंबई में कैंसर की बीमारी के चलते उनका निधन हो गया। उनकी आवाज का यह सफर तेहरान की एक पार्टी से शुरू होकर भारतीय संगीत के स्वर्णिम अध्याय का हिस्सा बन गया।