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राष्ट्रीय पोषण सप्ताह 2026: संतुलित थाली से बनेगी सेहत, जानें आपके भोजन में क्या हो ज़रूरी

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राष्ट्रीय पोषण सप्ताह 2026: संतुलित थाली से बनेगी सेहत, जानें आपके भोजन में क्या हो ज़रूरी

सारांश

हर साल 1 से 7 सितंबर तक मनाए जाने वाले राष्ट्रीय पोषण सप्ताह का संदेश साफ़ है — सेहत थाली से बनती है। 1982 से चली आ रही इस पहल में इस बार जोर है सुलभ और संतुलित भोजन पर, जहाँ महँगी सामग्री नहीं, सही अनुपात मायने रखता है।

मुख्य बातें

राष्ट्रीय पोषण सप्ताह हर वर्ष 1 से 7 सितंबर तक मनाया जाता है; इसकी शुरुआत 1982 में हुई थी।
संतुलित थाली में अनाज, प्रोटीन, हरी सब्जियाँ, मौसमी फल और दूध/दही का समावेश ज़रूरी है।
बाजरा, ज्वार और रागी जैसे मोटे अनाज पोषण के किफ़ायती और प्रभावी स्रोत हैं।
घर का खाना हमेशा स्वतः संतुलित नहीं होता — प्रोटीन और सब्जियों की कम मात्रा पोषण की कमी पैदा कर सकती है।
चिप्स, इंस्टेंट नूडल्स और मीठे पेय को रोज़मर्रा के भोजन का विकल्प बनाना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है।
पौष्टिक भोजन के लिए महँगी सामग्री नहीं, सही संतुलन ज़रूरी है — जो घरेलू खाद्य पदार्थों से संभव है।

राष्ट्रीय पोषण सप्ताह हर वर्ष 1 से 7 सितंबर तक मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य लोगों को संतुलित आहार और स्वस्थ खानपान की आदतों के प्रति जागरूक करना है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, शरीर की ऊर्जा, रोग प्रतिरोधक क्षमता और दीर्घकालिक स्वास्थ्य का सीधा संबंध हमारी रोज़ की थाली में मौजूद पोषक तत्वों के संतुलन से है। नई दिल्ली समेत पूरे भारत में इस सप्ताह पोषण जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं।

राष्ट्रीय पोषण सप्ताह का इतिहास और महत्व

भारत में राष्ट्रीय पोषण सप्ताह की शुरुआत 1982 में हुई थी। इसके पीछे यह संदेश था कि भोजन केवल पेट भरने का माध्यम नहीं है — शरीर को स्वस्थ रखने के लिए प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, विटामिन, खनिज, फाइबर और पर्याप्त जल का सही अनुपात आवश्यक है। गौरतलब है कि भारत में कुपोषण और असंतुलित आहार दोनों एक साथ चुनौती बने हुए हैं — एक ओर कैलोरी की कमी है, तो दूसरी ओर जंक फूड से उपजी 'छिपी भूख' (micronutrient deficiency) भी।

संतुलित थाली में क्या-क्या होना चाहिए

स्वास्थ्य विशेषज्ञ यह स्पष्ट करते हैं कि घर का बना खाना हमेशा स्वतः संतुलित नहीं होता। यदि थाली में रोटी या चावल की मात्रा अधिक है और दाल, सब्जी या प्रोटीन स्रोत कम हैं, तो पेट भले भर जाए, लेकिन शरीर की पोषण संबंधी ज़रूरतें अधूरी रह सकती हैं।

अनाज: रोटी, चावल, दलिया, पोहा, उपमा, ओट्स तथा बाजरा, ज्वार और रागी जैसे मोटे अनाज भोजन का आधार बन सकते हैं।

प्रोटीन: दाल, राजमा, चना, छोले, सोयाबीन, पनीर, दूध, दही, अंडा और मछली जैसे स्रोत शरीर के लिए ज़रूरी हैं। विशेष रूप से बच्चों, किशोरों और बुजुर्गों के लिए पर्याप्त प्रोटीन का सेवन महत्वपूर्ण माना जाता है।

सब्जियाँ: हरी पत्तेदार और रंग-बिरंगी सब्जियाँ अलग-अलग विटामिन, खनिज और एंटीऑक्सीडेंट प्रदान करती हैं। विविध रंग की सब्जियाँ विविध पोषक तत्वों का संकेत देती हैं।

फल: मौसमी फलों को दैनिक आहार में शामिल करना उचित है। मीठे पेय या अधिक चीनी वाले जूस की तुलना में साबुत फल खाना बेहतर विकल्प बताया जाता है।

दूध और दुग्ध उत्पाद: दूध, दही और अन्य डेयरी उत्पाद कैल्शियम और प्रोटीन के महत्वपूर्ण स्रोत हो सकते हैं।

अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों से सावधानी

आज की व्यस्त जीवनशैली में चिप्स, बिस्किट, इंस्टेंट नूडल्स, मिठाइयाँ, मीठे पेय और पैकेज्ड स्नैक्स आसानी से दैनिक आहार का हिस्सा बन जाते हैं। कभी-कभार इनका सेवन स्वीकार्य है, लेकिन इन्हें नियमित भोजन का विकल्प बना लेना स्वास्थ्य के लिए उचित नहीं माना जाता।

विशेष रूप से बच्चों और युवाओं में स्क्रीन टाइम के साथ बिना ध्यान दिए स्नैकिंग की प्रवृत्ति बढ़ रही है, जो कुल कैलोरी सेवन को अनजाने में बढ़ा देती है। खाने के समय भोजन पर ध्यान केंद्रित करना और उचित मात्रा में परोसकर खाना एक स्वस्थ आदत मानी जाती है।

आम जनता पर असर

यह ऐसे समय में आया है जब भारत में एक साथ कुपोषण और मोटापे की दोहरी चुनौती सामने है। ग्रामीण क्षेत्रों में जहाँ सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी एक बड़ी समस्या है, वहीं शहरी युवाओं में प्रोसेस्ड फूड की बढ़ती खपत चिंता का विषय बनती जा रही है। संतुलित और सुलभ आहार — जो महँगा न हो — इस दोहरी समस्या का व्यावहारिक समाधान हो सकता है।

राष्ट्रीय पोषण सप्ताह का संदेश यही है: पौष्टिक थाली के लिए महँगी सामग्री नहीं, बल्कि सही संतुलन चाहिए — और यह संतुलन हमारे घरों में उपलब्ध सामान्य खाद्य पदार्थों से भी हासिल किया जा सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो यह बताती है कि जागरूकता अभियान पर्याप्त नहीं हैं — नीतिगत हस्तक्षेप, स्कूली पाठ्यक्रम में पोषण शिक्षा और सार्वजनिक वितरण प्रणाली में विविधता भी उतनी ही ज़रूरी है। मोटे अनाजों को बढ़ावा देने की सरकारी कोशिशें सही दिशा में हैं, लेकिन शहरी मध्यवर्ग में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड की बढ़ती खपत इन प्रयासों को चुनौती दे रही है।
RashtraPress
31 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

राष्ट्रीय पोषण सप्ताह कब और क्यों मनाया जाता है?
राष्ट्रीय पोषण सप्ताह हर साल 1 से 7 सितंबर तक मनाया जाता है। इसकी शुरुआत 1982 में हुई थी, जिसका उद्देश्य लोगों को संतुलित आहार और स्वस्थ खानपान की आदतों के प्रति जागरूक करना है।
संतुलित थाली में क्या-क्या शामिल होना चाहिए?
एक संतुलित थाली में अनाज (रोटी, चावल, मोटे अनाज), प्रोटीन (दाल, चना, दूध, दही, अंडा), हरी और रंग-बिरंगी सब्जियाँ, मौसमी फल और डेयरी उत्पाद शामिल होने चाहिए। इन सभी का सही अनुपात शरीर की पोषण संबंधी सभी ज़रूरतें पूरी करता है।
क्या घर का बना खाना हमेशा पौष्टिक होता है?
ज़रूरी नहीं। यदि थाली में रोटी या चावल की मात्रा अधिक है और प्रोटीन व सब्जियाँ कम हैं, तो पेट भर सकता है लेकिन पोषण की कमी रह सकती है। संतुलित अनुपात सुनिश्चित करना ज़रूरी है।
बच्चों और युवाओं के लिए कौन-सी आदतें ज़रूरी हैं?
बच्चों और युवाओं को स्क्रीन टाइम के दौरान बिना ध्यान दिए स्नैकिंग से बचना चाहिए। चिप्स, इंस्टेंट नूडल्स और मीठे पेय की जगह मौसमी फल और घर का संतुलित भोजन प्राथमिकता होनी चाहिए।
क्या पौष्टिक भोजन के लिए महँगी सामग्री ज़रूरी है?
नहीं। दाल, चना, मोटे अनाज, मौसमी सब्जियाँ और दही जैसे सुलभ और किफ़ायती खाद्य पदार्थों से भी पूरी तरह पौष्टिक थाली तैयार की जा सकती है। सही संतुलन महँगी सामग्री से ज़्यादा महत्वपूर्ण है।
राष्ट्र प्रेस
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