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नींद की कमी से बढ़ता है हृदय रोग और डायबिटीज का खतरा, विशेषज्ञों की चेतावनी

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नींद की कमी से बढ़ता है हृदय रोग और डायबिटीज का खतरा, विशेषज्ञों की चेतावनी

सारांश

नींद सिर्फ आराम नहीं — यह शरीर की मरम्मत और दिमाग के पुनर्निर्माण की प्रक्रिया है। NHM के अनुसार, रोज़ 7-8 घंटे से कम सोने पर हृदय रोग, डायबिटीज, अवसाद और याददाश्त कमज़ोर होने का जोखिम बढ़ता है। तेज़ रफ्तार जीवनशैली में नींद की अनदेखी एक खामोश स्वास्थ्य संकट बन रही है।

मुख्य बातें

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, प्रतिदिन 7 से 8 घंटे की नींद शरीर और मन दोनों के लिए अनिवार्य है।
NHM के अनुसार, लगातार नींद की कमी से हृदय रोग, ब्लड प्रेशर और टाइप-2 डायबिटीज का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
नींद पूरी न होने से भूख नियंत्रित करने वाले हार्मोन प्रभावित होते हैं, जिससे वज़न अनियंत्रित हो सकता है।
चिड़चिड़ापन, अवसाद, चिंता और याददाश्त कमज़ोर होना नींद की कमी के प्रमुख मानसिक दुष्प्रभाव हैं।
रात को स्क्रीन से दूरी , तय समय पर सोना और हल्का रात्रि भोजन नींद की गुणवत्ता सुधारने में सहायक हैं।

पर्याप्त नींद की कमी आज की जीवनशैली में एक गंभीर स्वास्थ्य संकट बनती जा रही है — स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, रोज़ाना 7 से 8 घंटे से कम सोना शरीर और मानसिक स्वास्थ्य दोनों को नुकसान पहुँचाता है। नेशनल हेल्थ मिशन (NHM) के आँकड़ों के अनुसार, लगातार नींद न पूरी होने से हृदय रोग, डायबिटीज और मानसिक विकारों का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है। काम के दबाव और डिजिटल स्क्रीन के बढ़ते उपयोग के बीच लाखों भारतीय अनजाने में अपनी सेहत से खिलवाड़ कर रहे हैं।

नींद क्यों है स्वास्थ्य की नींव

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि नींद केवल थकान मिटाने का माध्यम नहीं है — यह शरीर की मरम्मत और मानसिक पुनर्निर्माण की प्रक्रिया है। नींद के दौरान शरीर की कोशिकाएँ रिपेयर होती हैं, रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) मज़बूत होती है और मस्तिष्क दिनभर की सूचनाओं को संसाधित करता है। विशेषज्ञों के अनुसार, प्रतिदिन कम से कम 7 से 8 घंटे की नींद उतनी ही ज़रूरी है जितना संतुलित आहार और नियमित व्यायाम।

नींद की कमी से शरीर पर असर

नींद पूरी न होने का सबसे पहला असर दिनभर की थकान और सुस्ती के रूप में सामने आता है, जिससे कार्यक्षमता घटती है और तनाव बढ़ता है। NHM के अनुसार, लंबे समय तक नींद की कमी से भूख नियंत्रित करने वाले हार्मोन प्रभावित होते हैं, जिससे वज़न अनियंत्रित रूप से बढ़ सकता है। इसके अलावा, ब्लड प्रेशर अनियंत्रित होने और हृदय की धड़कन प्रभावित होने का जोखिम भी बढ़ जाता है।

त्वचा पर भी इसका असर दिखता है — चेहरे पर झुर्रियाँ, कालापन और सुस्ती नज़र आने लगती है। NHM के अनुसार, कम नींद हृदय संबंधी बीमारियों और टाइप-2 डायबिटीज का खतरा भी कई गुना बढ़ा देती है।

मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव

नींद की कमी का असर केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक स्तर पर भी गहरा होता है। विशेषज्ञों के अनुसार, अपर्याप्त नींद से चिड़चिड़ापन, अवसाद (डिप्रेशन), चिंता और याददाश्त कमज़ोर होने जैसी समस्याएँ सामान्य हो जाती हैं। यह ऐसे समय में चिंताजनक है जब भारत में मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ पहले से ही तेज़ी से बढ़ रही हैं।

अच्छी नींद के लिए व्यावहारिक सुझाव

स्वास्थ्य विशेषज्ञ बेहतर नींद के लिए कुछ सरल उपाय सुझाते हैं। रोज़ाना तय समय पर सोएँ और उठें ताकि शरीर की आंतरिक घड़ी (सर्केडियन रिदम) बनी रहे। रात को मोबाइल और टीवी स्क्रीन से दूरी बनाएँ, क्योंकि नीली रोशनी नींद के हार्मोन मेलाटोनिन को बाधित करती है। हल्का व्यायाम फायदेमंद है, लेकिन सोने से ठीक पहले नहीं। रात का भोजन हल्का रखें और शांत व अँधेरे कमरे में सोने की आदत डालें।

गौरतलब है कि यदि लगातार नींद न आना या अत्यधिक थकान महसूस हो तो चिकित्सक से परामर्श लेना ज़रूरी है, क्योंकि यह किसी अंतर्निहित स्वास्थ्य समस्या का संकेत हो सकता है। नींद को प्राथमिकता देना आज की सबसे ज़रूरी स्वास्थ्य आदतों में से एक है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जिसे अभी भी व्यक्तिगत लापरवाही माना जाता है, न कि एक प्रणालीगत समस्या। काम के लंबे घंटे, डिजिटल स्क्रीन की लत और 'कम सोना = अधिक मेहनत' की सांस्कृतिक मानसिकता इस संकट को और गहरा कर रही है। NHM के दिशानिर्देश मौजूद हैं, लेकिन नींद स्वास्थ्य को राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में वह प्राथमिकता नहीं मिली जो पोषण या व्यायाम को मिलती है। जब तक कार्यस्थल संस्कृति और डिजिटल उपभोग की आदतें नहीं बदलतीं, व्यक्तिगत सुझाव सीमित प्रभाव ही डालेंगे।
RashtraPress
13 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

नींद की कमी से कौन-कौन सी बीमारियाँ हो सकती हैं?
नींद की कमी से हृदय रोग, अनियंत्रित ब्लड प्रेशर, टाइप-2 डायबिटीज, मोटापा और मानसिक विकारों का जोखिम बढ़ता है। NHM के अनुसार, लंबे समय तक अपर्याप्त नींद लेने से शरीर के हार्मोनल संतुलन और रोग प्रतिरोधक क्षमता दोनों प्रभावित होते हैं।
एक वयस्क को रोज़ाना कितने घंटे सोना चाहिए?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, एक वयस्क को प्रतिदिन कम से कम 7 से 8 घंटे की नींद लेनी चाहिए। यह नींद शरीर की कोशिकाओं की मरम्मत, इम्युनिटी मज़बूत करने और मस्तिष्क को तरोताज़ा रखने के लिए ज़रूरी है।
नींद की कमी का मानसिक स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ता है?
अपर्याप्त नींद से चिड़चिड़ापन, अवसाद, चिंता और याददाश्त कमज़ोर होने जैसी समस्याएँ सामान्य हो जाती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, मानसिक स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए नींद उतनी ही ज़रूरी है जितना मनोचिकित्सा या दवाएँ।
अच्छी नींद के लिए क्या करना चाहिए?
रोज़ाना तय समय पर सोना और उठना, रात को मोबाइल व टीवी से दूरी, हल्का रात्रि भोजन और शांत-अँधेरे कमरे में सोना अच्छी नींद के लिए सबसे कारगर उपाय हैं। सोने से ठीक पहले तीव्र व्यायाम से बचना भी ज़रूरी है।
कब डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए?
यदि लगातार नींद न आना, रात में बार-बार जागना या दिनभर अत्यधिक थकान महसूस हो, तो चिकित्सक से परामर्श लेना ज़रूरी है। यह किसी अंतर्निहित स्वास्थ्य समस्या — जैसे स्लीप एपनिया या थायरॉइड विकार — का संकेत हो सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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