पश्चिम बंगाल: नाबालिग गर्भधारण पर एसओपी के लिए 9 सदस्यीय विशेषज्ञ समिति गठित, 18 सितंबर को पहली बैठक
सारांश
मुख्य बातें
पश्चिम बंगाल स्वास्थ्य विभाग ने 18 वर्ष से कम आयु की लड़कियों — विवाहित होने पर भी — के गर्भधारण मामलों को संभालने के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तैयार करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके लिए नौ सदस्यों की एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया जा चुका है, जिसकी पहली बैठक 18 सितंबर 2026 को निर्धारित है।
पहल की पृष्ठभूमि
यह कदम राज्य सरकार की उस घोषणा के बाद उठाया गया है, जिसमें कहा गया कि अब से 18 वर्ष से पहले माँ बनने वाली नाबालिग लड़कियों के पतियों पर 'प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेज (POCSO) एक्ट के तहत मुकदमा चलाया जाएगा। राज्य सरकार ऐसे मामलों में स्वतः संज्ञान (सुओ मोटो) लेते हुए खुद मुकदमे दर्ज करेगी।
गौरतलब है कि POCSO के तहत 18 वर्ष से कम उम्र के साथ यौन संबंध कानूनन अपराध है, चाहे विवाह हुआ हो या नहीं। यह निर्देश किशोर बाल विवाह और उससे जुड़ी स्वास्थ्य जटिलताओं की बढ़ती चिंताओं के बीच आया है।
विशेषज्ञ समिति की संरचना
स्वास्थ्य विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि गठित समिति में चिकित्सा, प्रसूति और सार्वजनिक स्वास्थ्य के विशेषज्ञ शामिल हैं। समिति के प्रमुख सदस्यों में शामिल हैं:
डॉ. देबाशीष दास (कम्युनिटी मेडिसिन विभाग, कलकत्ता मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल), डॉ. संजय भट्टाचार्य (उलुबेरिया मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल), डॉ. सौरव चटर्जी (एनआरएस मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल), डॉ. तुलिका झा (रायगंज मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल), डॉ. शैली सेठ (रामपुरहाट मेडिकल एंड हॉस्पिटल) और डॉ. भास्कर पाल (अपोलो हॉस्पिटल) — ये सभी प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं।
इसके अतिरिक्त, स्वास्थ्य विभाग की ओर से मातृ स्वास्थ्य की डिप्टी डायरेक्टर श्यामली रुद्र, परिवार नियोजन अधिकारी शाश्वती नाग और पूर्वी मेदिनीपुर जिले की पब्लिक हेल्थ एंड नर्सिंग ऑफिसर सीमा माइती भी समिति में सम्मिलित हैं।
स्वास्थ्य मंत्री की चिंता और तर्क
राज्य के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. सरदवत मुखोपाध्याय ने कहा कि पश्चिम बंगाल में 18 वर्ष से कम उम्र में गर्भवती होने की घटनाएँ चिंताजनक रूप से अधिक हैं। उन्होंने कहा, "अगर कोई नाबालिग लड़की 18 साल से कम उम्र में गर्भवती हो जाती है तो इस बात की बहुत ज़्यादा संभावना होती है कि गर्भावस्था के दौरान उसकी मौत हो सकती है, इसलिए ऐसे मामलों को कैसे संभाला जाए, इस पर एक एसओपी होना ज़रूरी है।"
यह ऐसे समय में आया है जब राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के आँकड़े बार बार पश्चिम बंगाल को किशोर मातृत्व और बाल विवाह में उच्च दर वाले राज्यों में दर्शाते रहे हैं।
प्रस्तावित एसओपी की मुख्य विशेषताएँ
रिपोर्टों के अनुसार, प्रस्तावित एसओपी में निम्नलिखित बिंदु शामिल होंगे:
माँ को होने वाले जोखिमों की पहचान, नियमित एंटीनेटल चेकअप, एनीमिया और कुपोषण का उपचार, आवश्यकता पड़ने पर उच्च स्तरीय चिकित्सा केंद्रों में रेफरल, सुरक्षित प्रसव की व्यवस्था और प्रसवोत्तर माँ एवं शिशु की निगरानी।
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी ने स्पष्ट किया, "नई एसओपी में यह बताया जाएगा कि प्रेग्नेंसी की पुष्टि होने के तुरंत बाद किशोर लड़की को स्त्री रोग विशेषज्ञ और प्रसूति रोग विशेषज्ञ के पास ले जाया जाए और उसे प्रसव पूर्व देखभाल के दायरे में लाया जाए।"
आगे की राह
विशेषज्ञ समिति की पहली बैठक 18 सितंबर 2026 को प्रस्तावित है, जिसके बाद एसओपी का मसौदा तैयार करने का कार्य शुरू होगा। यह पहल न केवल चिकित्सकीय देखभाल का खाका खींचेगी, बल्कि POCSO के तहत कानूनी कार्रवाई के समानांतर स्वास्थ्य तंत्र को भी तैयार करेगी। राज्य में किशोर मातृत्व मृत्यु दर घटाने की दिशा में यह एक अहम संस्थागत कदम माना जा रहा है।