अफगानिस्तान-पाकिस्तान तनाव से मध्य एशिया व्यापार महत्वाकांक्षा को झटका, कजाखस्तान लक्ष्य $645 मिलियन तक सिमटा
सारांश
मुख्य बातें
अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच गहराता तनाव अब केवल सुरक्षा और राजनयिक दायरे तक सीमित नहीं रहा — इसने पाकिस्तान की उस महत्वाकांक्षी क्षेत्रीय व्यापार रणनीति को भी गंभीर नुकसान पहुँचाया है, जिसके तहत इस्लामाबाद अपने बंदरगाहों को मध्य एशिया का प्रवेश द्वार बनाना चाहता था। यूरेशियानेट की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, कजाखस्तान के साथ सालाना व्यापार एक अरब डॉलर से अधिक पहुँचने का जो अनुमान था, उसे अब घटाकर करीब 645 मिलियन डॉलर कर दिया गया है।
कजाखस्तान से व्यापार लक्ष्य में कटौती
1 नवंबर 2026 को अस्ताना में कजाखस्तान के उप प्रधानमंत्री सेरिक झुमांगारिन और पाकिस्तान के निवेश मंत्री कासिम अहमद शेख के बीच हुई बातचीत में यह संशोधित आकलन सामने आया। पाकिस्तान के निवेश मंत्री ने अस्ताना निवेश मंच पर कराची, ग्वादर और अन्य बंदरगाहों को मध्य एशियाई देशों के लिए 'रणनीतिक प्रवेश द्वार' बताया — लेकिन जमीनी हकीकत इस दावे से मेल नहीं खाती।
गौरतलब है कि यह लक्ष्य में कटौती उस समय हुई है जब पाकिस्तान अपनी अर्थव्यवस्था को क्षेत्रीय व्यापार के ज़रिये पुनर्जीवित करने की कोशिश में है।
उज्बेकिस्तान के साथ भी लक्ष्य चुनौतीपूर्ण
पाकिस्तान और उज्बेकिस्तान ने अगले पाँच वर्षों में सालाना द्विपक्षीय व्यापार दो अरब डॉलर तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा है। लेकिन उपलब्ध आँकड़े इस राह को आसान नहीं बताते। वर्ष 2024 में पाकिस्तान ने उज्बेकिस्तान को लगभग 129 मिलियन डॉलर का सामान निर्यात किया, जबकि उज्बेकिस्तान से आयात लगभग 257 मिलियन डॉलर रहा। 2025 के व्यापार आँकड़ों में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज नहीं हुई।
इस स्थिति में दो अरब डॉलर का लक्ष्य हासिल करना तब तक संभव नहीं दिखता, जब तक अफगानिस्तान से होकर गुज़रने वाले पारगमन मार्गों की स्थिति नहीं सुधरती।
अफगानिस्तान: भौगोलिक अड़चन और कूटनीतिक विवाद
अफगानिस्तान पाकिस्तान और मध्य एशिया के बीच भौगोलिक रूप से एक अनिवार्य संपर्क कड़ी है। मध्य एशियाई देशों का माल अफगानिस्तान के रास्ते ही पाकिस्तान के बंदरगाहों तक पहुँच सकता है और वहाँ से समुद्री मार्ग के ज़रिये वैश्विक बाज़ारों में जा सकता है। लेकिन दोनों देशों के बीच प्रमुख सीमा चौकियों के बंद रहने से माल की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हुई है।
तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के विरुद्ध कार्रवाई की पाकिस्तान की माँग और काबुल की ओर से इन आरोपों को खारिज करने के बीच दोनों देशों के संबंध लगातार तनावपूर्ण बने हुए हैं। यह तनाव सीमा पार व्यापार में बाधाओं के रूप में सामने आ रहा है, जिससे वे व्यापारी और निर्यातक सबसे अधिक प्रभावित हैं जो अफगानिस्तान को बाज़ार और मार्ग दोनों रूपों में इस्तेमाल करते थे।
मास्को फॉर्मेट बैठक में भी दिखी खाई
अक्टूबर 2026 में मास्को फॉर्मेट के तहत हुई क्षेत्रीय बैठक में आतंकवाद से जुड़े मुद्दों पर अफगानिस्तान और पाकिस्तान के प्रतिनिधियों के बीच मतभेद इतने गहरे थे कि संयुक्त बयान जारी नहीं हो सका। इस बैठक में भारत, चीन, ईरान, रूस और मध्य एशियाई देशों के प्रतिनिधि भी शामिल हुए थे।
यह Nवीं ऐसी बहुपक्षीय बैठक थी जहाँ इस्लामाबाद-काबुल की खाई ने क्षेत्रीय सहमति को बाधित किया।
भारत के क्षेत्रीय हितों पर असर
इस पूरे घटनाक्रम का असर भारत के क्षेत्रीय हितों के लिहाज़ से भी महत्वपूर्ण है। भारत लंबे समय से अफगानिस्तान और ईरान के रास्ते मध्य एशिया तक व्यापारिक और परिवहन संपर्क मज़बूत करने की पैरवी करता रहा है। चाबहार बंदरगाह और अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC) इसी व्यापक क्षेत्रीय संपर्क रणनीति के हिस्से हैं।
पाकिस्तान की अफगानिस्तान-निर्भर मध्य एशिया पहुँच जितनी कमज़ोर होती है, उतना ही भारत के वैकल्पिक मार्गों की रणनीतिक प्रासंगिकता बढ़ती है। आने वाले महीनों में यह भू-आर्थिक प्रतिस्पर्धा और तीखी होने की संभावना है।