13 सितंबर 2026
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बांग्लादेश में खसरे का प्रकोप: 1.89 लाख से अधिक मामले, 1,012 मौतें — टीकाकरण व्यवस्था पर सवाल

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बांग्लादेश में खसरे का प्रकोप: 1.89 लाख से अधिक मामले, 1,012 मौतें — टीकाकरण व्यवस्था पर सवाल

सारांश

बांग्लादेश में 15 मार्च 2026 से अब तक 1.89 लाख से अधिक खसरा मामले और 1,012 मौतें दर्ज हो चुकी हैं — और यह त्रासदी उस बीमारी से है जिसे टीके से रोका जा सकता था। कोविड के बाद टूटी टीकाकरण कड़ी और हाशिये के समुदायों तक पहुँच की कमी ने एक 'सफल' माने जाने वाले स्वास्थ्य कार्यक्रम को उजागर कर दिया।

मुख्य बातें

15 मार्च 2026 से बांग्लादेश में 1.89 लाख से अधिक खसरा या खसरे जैसे मामले दर्ज, जिनमें अधिकांश बच्चे।
पुष्ट और संदिग्ध मामलों को मिलाकर मौतों का आंकड़ा 1,012 तक पहुँचा; 1.49 लाख मरीजों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।
कोविड-19 महामारी ने नियमित टीकाकरण अभियान बाधित किए, जिससे बड़ी संख्या में बच्चे छूट गए।
आपातकालीन अभियान में 1.97 करोड़ बच्चों को टीका लगाने का दावा, लेकिन विटामिन-ए अभियान में 2.23 करोड़ बच्चों तक पहुँच से लक्ष्य-अनुमान पर सवाल।
अगस्त 2026 में मामलों में फिर तेज़ी, जून-जुलाई की अस्थायी गिरावट के बाद।
विशेषज्ञों ने इसे रोकी जा सकने वाली शासन विफलता करार दिया और गहन जाँच की माँग की।

बांग्लादेश इस समय हाल के वर्षों के सबसे भीषण सार्वजनिक स्वास्थ्य संकटों में से एक से जूझ रहा है। स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (DGHS) के आंकड़ों के अनुसार, 15 मार्च 2026 से अब तक देश में 1.89 लाख से अधिक लोग — जिनमें अधिकांश बच्चे हैं — खसरे या खसरे जैसे लक्षणों से प्रभावित हुए हैं। पुष्ट और संदिग्ध मामलों को मिलाकर मौतों का आंकड़ा 1,012 तक पहुँच चुका है, जिससे यह प्रकोप एक रोकी जा सकने वाली त्रासदी बनकर उभरा है।

मुख्य आँकड़े और स्थिति

DGHS के आंकड़ों के अनुसार, प्रभावित 1.89 लाख से अधिक मामलों में से कम से कम 1.49 लाख मरीजों को अस्पताल में भर्ती कराने की ज़रूरत पड़ी। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने यह भी स्पष्ट किया है कि पुष्ट और संदिग्ध संक्रमण तथा मौतों के आंकड़ों में अंतर है, इसलिए वास्तविक संख्या और अधिक हो सकती है।

गौरतलब है कि खसरा एक ऐसी बीमारी है जिसे टीकाकरण के ज़रिए बड़े पैमाने पर रोका जा सकता है, फिर भी बड़ी संख्या में बच्चों की इससे मृत्यु हो रही है — जो इस प्रकोप को और भी गंभीर बनाता है।

टीकाकरण व्यवस्था की विफलता कैसे हुई

बांग्लादेश का टीकाकरण कार्यक्रम कभी विकासशील देशों के बीच एक सफल मॉडल माना जाता था। सरकार के नेतृत्व, गैर-सरकारी संगठनों की सक्रिय भागीदारी और सामुदायिक जागरूकता के बल पर हासिल की गई उच्च कवरेज ने लाखों बच्चों को बीमारियों से बचाया था।

हालांकि, रिपोर्टों के अनुसार, कोविड-19 महामारी ने नियमित टीकाकरण अभियानों को बाधित किया और कई बच्चों को बाद में दोबारा टीकाकरण व्यवस्था से नहीं जोड़ा जा सका। इसके अलावा, दुर्गम इलाकों में रहने वाली आबादी, शहरी झुग्गी-बस्तियों के निवासी, प्रवासी और अन्य हाशिये पर रहने वाले समुदाय विशेष रूप से असुरक्षित रहे।

यह भी सामने आया कि उन बच्चों की पहचान करने और उनका नियमित फॉलो-अप करने की प्रक्रिया पर्याप्त नहीं रही, जिन्हें कोई भी टीका नहीं मिला था। ये सभी खामियाँ धीरे-धीरे जमा होती रहीं और अंततः इस विकराल प्रकोप के रूप में सामने आईं।

आपातकालीन टीकाकरण और नई चुनौतियाँ

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए बांग्लादेश के अधिकारियों ने बड़े पैमाने पर आपातकालीन टीकाकरण अभियान शुरू किया और करीब 1.97 करोड़ बच्चों को टीका लगाए जाने की जानकारी दी।

हालांकि, जब इसी आयु वर्ग के बच्चों के लिए चलाए गए विटामिन-ए अभियान में करीब 2.23 करोड़ बच्चों तक पहुँच दर्ज की गई, तो जनसंख्या अनुमान की सटीकता पर सवाल उठने लगे। अधिकारियों ने स्वयं स्वीकार किया कि खसरा टीकाकरण के लिए लक्षित बच्चों की मूल संख्या का अनुमान कम आँका गया था।

संक्रमण की रफ्तार और ताज़ा स्थिति

जून और जुलाई 2026 में संक्रमण के मामलों में अस्थायी गिरावट देखी गई थी, लेकिन अगस्त 2026 में मामलों में फिर तेज़ उछाल आ गया। यह इस बात का संकेत है कि प्रकोप अभी पूरी तरह काबू में नहीं आया है और कमज़ोर वर्गों में वायरस का प्रसार जारी है।

विशेषज्ञों का आकलन और आगे की राह

स्वास्थ्य विशेषज्ञों और रिपोर्टों ने इस पूरे प्रकरण को एक ऐसी सार्वजनिक स्वास्थ्य विफलता करार दिया है जिसे काफी हद तक रोका जा सकता था। इसे व्यापक तौर पर शासन व्यवस्था की गंभीर विफलता के रूप में भी देखा जा रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस पूरे प्रकरण की गहन जाँच कराई जाए और टीकाकरण व्यवस्था को नए सिरे से मज़बूत किया जाए, ताकि भविष्य में इस तरह की स्थिति दोबारा न उत्पन्न हो। यह संकट पड़ोसी देशों के लिए भी एक चेतावनी है कि महामारी के बाद टीकाकरण की खाई को भरना कितना ज़रूरी है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि यह कि टीकाकरण व्यवस्था कितनी नाज़ुक है। कोविड महामारी के बाद बनी 'इम्युनाइज़ेशन गैप' की चेतावनी विश्व स्वास्थ्य संगठन वर्षों से दे रहा था — बांग्लादेश ने उसे गंभीरता से नहीं लिया। असली सवाल यह है कि जब जनसंख्या अनुमान ही गलत निकले और आपातकालीन अभियान में भी लक्ष्य से कम बच्चों तक पहुँचा गया, तो जवाबदेही किसकी है। भारत सहित अन्य देशों को भी अपने टीकाकरण आँकड़ों की पड़ताल करनी चाहिए — क्योंकि 'हाई कवरेज' का दावा और ज़मीनी हकीकत के बीच की खाई जब भरती है, तो बच्चों की जान से भरती है।
RashtraPress
13 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बांग्लादेश में खसरे का यह प्रकोप कब से शुरू हुआ और कितना गंभीर है?
यह प्रकोप 15 मार्च 2026 से शुरू हुआ और 13 सितंबर 2026 तक 1.89 लाख से अधिक मामले तथा 1,012 मौतें दर्ज की जा चुकी हैं। इनमें अधिकांश प्रभावित बच्चे हैं और 1.49 लाख से ज़्यादा मरीजों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।
बांग्लादेश में खसरा इतना फैला क्यों जबकि देश का टीकाकरण कार्यक्रम पहले सफल माना जाता था?
कोविड-19 महामारी ने नियमित टीकाकरण अभियानों को बाधित किया और कई बच्चों को बाद में टीकाकरण से नहीं जोड़ा जा सका। इसके अलावा दुर्गम इलाके, शहरी झुग्गियाँ, प्रवासी समुदाय और अपर्याप्त फॉलो-अप व्यवस्था ने मिलकर टीकाकरण कवरेज में बड़े अंतराल पैदा किए।
बांग्लादेश सरकार ने इस प्रकोप से निपटने के लिए क्या कदम उठाए हैं?
अधिकारियों ने आपातकालीन टीकाकरण अभियान चलाकर करीब 1.97 करोड़ बच्चों को टीका लगाने की जानकारी दी है। हालांकि, उसी आयु वर्ग के लिए विटामिन-ए अभियान में 2.23 करोड़ बच्चों तक पहुँच दर्ज होने के बाद अधिकारियों ने माना कि लक्षित बच्चों की संख्या का अनुमान कम आँका गया था।
क्या बांग्लादेश में खसरे का यह प्रकोप अब नियंत्रण में है?
जून और जुलाई 2026 में मामलों में अस्थायी गिरावट देखी गई थी, लेकिन अगस्त 2026 में संक्रमण फिर बढ़ गया। इससे स्पष्ट है कि प्रकोप अभी पूरी तरह काबू में नहीं है।
इस खसरा संकट से क्या सीख मिलती है और आगे क्या होना चाहिए?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यह रोकी जा सकने वाली त्रासदी है और इसे शासन व्यवस्था की विफलता माना जाना चाहिए। विशेषज्ञ पूरे प्रकरण की गहन जाँच और टीकाकरण व्यवस्था को मज़बूत करने की माँग कर रहे हैं, ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न आए।
राष्ट्र प्रेस
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