नई दिल्ली घोषणा: ब्रिक्स में भारत की कूटनीतिक जीत, विशेषज्ञ वाइल अव्वाद बोले — 'ऐतिहासिक उपलब्धि'
सारांश
मुख्य बातें
विदेशी मामलों के विशेषज्ञ वाइल अव्वाद ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में सर्वसम्मति से पारित नई दिल्ली घोषणा को भारत की बड़ी कूटनीतिक सफलता करार दिया है। उनके अनुसार, आपसी विरोधाभासों और तनावों के बावजूद भारत सभी प्रतिद्वंद्वी देशों को एक मंच पर लाने में सफल रहा, जहाँ समृद्धि, व्यापार और आर्थिक सहयोग जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा हुई। 13 सितंबर 2026 को अपनी प्रतिक्रिया में अव्वाद ने कहा कि यह घोषणा आने वाले वर्षों में वैश्विक कूटनीति में मील का पत्थर बनेगी।
नई दिल्ली घोषणा का महत्त्व
वाइल अव्वाद ने कहा, 'इसे हमेशा दिल्ली घोषणा के रूप में याद रखा जाएगा, क्योंकि ब्रिक्स सदस्य देशों के बीच सभी विरोधाभासों और आपसी टकराव के बावजूद भारत सभी प्रतिद्वंद्वी पक्षों को एक मेज पर लाने और समृद्धि, आर्थिक परस्पर निर्भरता, देशों के बीच व्यापार और एक-दूसरे की मदद से जुड़े मामलों पर चर्चा करने में सफलतापूर्वक सक्षम रहा।' उन्होंने इसे केवल भारत नहीं, बल्कि समस्त ब्रिक्स सदस्यों के लिए एक 'जीत की स्थिति' बताया।
गौरतलब है कि ब्रिक्स समूह में ऐसे देश शामिल हैं जिनके बीच द्विपक्षीय तनाव किसी से छुपे नहीं हैं। ऐसे में सर्वसम्मति से घोषणा का पारित होना कूटनीतिक दृष्टि से उल्लेखनीय माना जा रहा है।
भारत की प्राथमिकताएँ और उपलब्धियाँ
अव्वाद के अनुसार, भारत आतंकवाद-रोधी उपायों को घोषणापत्र में शामिल करवाने में सफल रहा। उन्होंने कहा, 'भारत आतंकवाद के मुद्दे को चर्चा में लाने में सफल रहा और आतंकवाद-रोधी उपायों पर विचार किया जाना चाहिए तथा किसी को भी आतंकवाद का समर्थन नहीं करना चाहिए।'
इसके अलावा, द्विपक्षीय विवादों के सौहार्दपूर्ण समाधान और संयुक्त राष्ट्र के पुनर्गठन जैसे मुद्दों पर भी भारत का पक्ष घोषणापत्र में स्थान पा सका। अव्वाद ने कहा कि ये वे बिंदु हैं जो भारत पहले से उठाता आया है और इस बार उन्हें अंतरराष्ट्रीय सहमति मिली।
भू-राजनीतिक संदर्भ और वैश्विक परिदृश्य
विशेषज्ञ ने यह भी रेखांकित किया कि इस शिखर सम्मेलन में रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया संघर्ष, एशिया-प्रशांत क्षेत्र की अस्थिरता तथा लेबनान, फिलिस्तीन, ईरान और हूती आंदोलन जैसे संवेदनशील मुद्दों को भी उचित स्थान मिला। उनके अनुसार, यह दर्शाता है कि ग्लोबल साउथ के नेता साझा हितों पर सामूहिक रुख अपनाने में सक्षम हो रहे हैं।
यह ऐसे समय में आया है जब पश्चिमी देशों के नेतृत्व वाली विश्व व्यवस्था को चुनौती मिल रही है और बहुध्रुवीय विश्व की माँग तेज़ हो रही है।
ब्रिक्स की भविष्य की भूमिका
अव्वाद ने ब्रिक्स की भावी भूमिका पर कहा कि यह समूह न केवल एक आर्थिक शक्ति बनेगा, बल्कि आने वाले वर्षों में एक राजनीतिक शक्ति के रूप में भी उभर सकता है। उनके अनुसार, समूह को और सदस्यों को साथ लेकर चलने की क्षमता विकसित करनी होगी, ताकि यह वास्तव में भविष्य की बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में दक्षिण-दक्षिण सहयोग का प्रतिनिधित्व कर सके।
विशेषज्ञों की नज़र अब इस बात पर है कि नई दिल्ली घोषणा में की गई प्रतिबद्धताएँ किस हद तक ज़मीनी नीतियों में तब्दील होती हैं — क्योंकि सहमति और क्रियान्वयन के बीच की खाई ही बहुपक्षीय मंचों की असली परीक्षा होती है।