ब्रिक्स शिखर सम्मेलन: PM मोदी ने 3 दिनों में 15 द्विपक्षीय बैठकें कीं, नई दिल्ली घोषणापत्र को मिली मंजूरी
सारांश
मुख्य बातें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान 11 से 13 सितंबर 2026 के बीच विभिन्न देशों के राष्ट्राध्यक्षों और शासनाध्यक्षों के साथ 15 औपचारिक द्विपक्षीय बैठकें कीं। सम्मेलन का समापन नई दिल्ली घोषणापत्र को सभी सदस्य देशों की मंजूरी मिलने के साथ हुआ, जो भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता की सबसे बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि मानी जा रही है।
मुख्य घटनाक्रम
तीन दिनों की इस कूटनीतिक सक्रियता में रूस, ईरान, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, मलेशिया, वियतनाम, कजाकिस्तान, फिलीपींस, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और कई अफ्रीकी देशों के नेता शामिल रहे। औपचारिक बैठकों के अतिरिक्त प्रधानमंत्री ने कई राष्ट्राध्यक्षों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के प्रमुखों के साथ 'पुल-असाइड' यानी अनौपचारिक संक्षिप्त मुलाकातें भी कीं।
यह शिखर सम्मेलन केवल बहुपक्षीय विचार-विमर्श का मंच नहीं बना, बल्कि भारत के लिए एक साथ कई देशों के साथ रणनीतिक, आर्थिक, ऊर्जा और रक्षा संबंधों को आगे बढ़ाने का असाधारण अवसर भी साबित हुआ।
पहले दिन की प्रमुख बैठकें
कूटनीतिक सिलसिले की शुरुआत 11 सितंबर को हुई जब प्रधानमंत्री मोदी ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ बैठक की। रूस के साथ भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी, रक्षा सहयोग और ऊर्जा संबंधों की पृष्ठभूमि में यह मुलाकात ऐसे समय हुई जब रूस-यूक्रेन संघर्ष को लेकर वैश्विक भू-राजनीतिक समीकरण लगातार बदल रहे हैं।
उसी दिन मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन और संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस से भी मुलाकात की। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और होर्मुज स्ट्रेट को लेकर बनी अनिश्चितता के बीच चाबहार बंदरगाह, मध्य एशिया तक संपर्क, ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दे एजेंडे में प्रमुख रहे। संयुक्त राष्ट्र महासचिव के साथ वैश्विक दक्षिण, बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार और संयुक्त राष्ट्र सुधार पर चर्चा हुई — जो भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के केंद्रीय एजेंडे में रहे हैं।
दूसरे दिन: मोदी-शी मुलाकात सबसे चर्चित
12 सितंबर को प्रधानमंत्री ने इथियोपिया के प्रधानमंत्री अबी अहमद अली, मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम, अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान और वियतनाम के प्रधानमंत्री ले मिन्ह हंग के साथ बैठकें कीं। रक्षा, ऊर्जा, निवेश, व्यापार, दुर्लभ खनिज, अंतरिक्ष और संपर्क जैसे क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाओं पर चर्चा हुई।
हालाँकि 12 सितंबर की सर्वाधिक चर्चित बैठक चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ हुई। गलवान संघर्ष के बाद भारत-चीन संबंधों में आए तनाव के बाद दोनों देश हाल के समय में संबंधों को स्थिर करने की दिशा में कदम उठा रहे हैं। सीमा, व्यापार और रणनीतिक मुद्दों पर मतभेद कायम रहने के बावजूद यह उच्चस्तरीय संवाद संबंधों को स्थिरता देने की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना गया। इसी दिन राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने भी ईरानी राष्ट्रपति पेजेश्कियन से मुलाकात की, जो भारत-ईरान उच्चस्तरीय संपर्क की निरंतरता को दर्शाता है।
तीसरे दिन: अफ्रीका और वैश्विक दक्षिण पर जोर
13 सितंबर को प्रधानमंत्री मोदी ने कजाकिस्तान के राष्ट्रपति कसीम-जोमार्ट टोकायेव, फिलीपींस के राष्ट्रपति फर्डिनेंड मार्कोस जूनियर, मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सिसी और दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा के साथ बैठकें कीं। इसके बाद उन्होंने बुरुंडी के राष्ट्रपति एवरेस्ट नदाइशिमिये, नाइजीरिया के उपराष्ट्रपति काशिम शेट्टीमा और युगांडा की उपराष्ट्रपति जेसिका अलुपो के साथ भी द्विपक्षीय वार्ता की।
गौरतलब है कि अफ्रीकी देशों के साथ इन बैठकों ने भारत की वैश्विक दक्षिण नीति को व्यावहारिक धरातल पर रेखांकित किया। यह ऐसे समय में आया है जब भारत अफ्रीकी महाद्वीप में चीन की बढ़ती उपस्थिति के समानांतर अपनी भागीदारी को विस्तार देने की कोशिश कर रहा है।
भारत की कूटनीतिक रणनीति और आगे की राह
विश्लेषकों के अनुसार ब्रिक्स जैसे बहुपक्षीय मंच का उपयोग एक साथ इतने देशों के साथ द्विपक्षीय एजेंडा आगे बढ़ाने के लिए करना भारत की परिपक्व कूटनीतिक रणनीति का प्रमाण है। रूस, ईरान और चीन के साथ बैठकों ने जहाँ भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की तस्वीर पेश की, वहीं अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया, मध्य एशिया और खाड़ी देशों के नेताओं से संवाद ने भारत की व्यापक वैश्विक साझेदारी को रेखांकित किया। नई दिल्ली घोषणापत्र के माध्यम से भारत ने वैश्विक दक्षिण की आवाज, संयुक्त राष्ट्र सुधार और आर्थिक सहयोग के एजेंडे को आगे बढ़ाया। आने वाले महीनों में इन बैठकों में बनी सहमतियों के ठोस परिणाम सामने आने की उम्मीद है।