18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में मोदी की कूटनीतिक जीत, मध्य पूर्व पर सर्वसम्मत घोषणापत्र पारित
सारांश
मुख्य बातें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने एक बड़ी कूटनीतिक सफलता के रूप में चिह्नित किया है। मध्य पूर्व में जारी संघर्ष को लेकर आपसी मतभेदों के बावजूद, मोदी ने सभी 10 पूर्ण सदस्य देशों और सऊदी अरब को एक कड़े शब्दों वाले संयुक्त घोषणापत्र पर सहमत करा लिया — जो इस शिखर सम्मेलन की सबसे उल्लेखनीय उपलब्धि मानी जा रही है।
मुख्य घटनाक्रम
जापान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी ने शनिवार को एक बड़ी कूटनीतिक कामयाबी हासिल की। अलग-अलग राय रखने वाले ब्रिक्स सदस्यों को एकजुट कर एक सर्वसम्मत बयान पर लाना, वैश्विक विभाजन के इस दौर में असाधारण माना जा रहा है। घोषणापत्र में किसी देश का नाम लिए बिना संयम बरतने और हालात बिगाड़ने वाले कार्यों से बचने की अपील की गई। इसमें आम नागरिकों के बुनियादी ढाँचे और परमाणु सुविधाओं पर जानबूझकर किए जाने वाले हमलों पर 'गहरी चिंता' भी जताई गई।
मोदी का 20-वर्षीय विजन
रूसी समाचार एजेंसी टीएएसएस की रिपोर्ट के अनुसार, नेताओं की बैठक में शुरुआती संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने समूह से एक महत्वाकांक्षी 20-वर्षीय विजन अपनाने और निर्णयों को निरंतर लागू करने के लिए ठोस तंत्र बनाने की अपील की।
मोदी ने कहा, 'आज, ब्रिक्स एक परिपक्व अवस्था में पहुँच गया है। पिछले दो दशकों में, इस समूह ने वैश्विक मंच पर अपनी एक अलग पहचान बनाई है। हम एक-दूसरे के विचारों का सम्मान करते हैं और आम सहमति के आधार पर आगे बढ़ते हैं। हम किसी से टकराव के जरिए नहीं, बल्कि सभी को इस प्रक्रिया में शामिल करके विकास की कोशिश करते हैं। अब समय आ गया है कि ब्रिक्स के भीतर हमारी एकता और आम सहमति को वैश्विक मंच पर ठोस नतीजों में बदला जाए।'
घोषणापत्र के मुख्य बिंदु
अल जजीरा की रिपोर्ट के अनुसार, ब्रिक्स देशों ने सर्वसम्मति से जो संयुक्त घोषणापत्र अपनाया, उसमें मध्य पूर्व में संयम और वैश्विक व्यापार, आपूर्ति श्रृंखला और ऊर्जा के निर्बाध प्रवाह को सुनिश्चित करने पर ज़ोर दिया गया। यह शिखर सम्मेलन ऐसे मुश्किल समय में हुआ जब मध्य पूर्व और यूक्रेन के युद्धों से ऊर्जा और शिपिंग बाधित हो रही है और टैरिफ दबाव सदस्यों को प्रभावित कर रहे हैं।
घोषणापत्र में 'अधिकतम संयम' बरतने की अपील की गई और आम नागरिकों के बुनियादी ढाँचे तथा परमाणु सुविधाओं पर जानबूझकर किए जाने वाले हमलों के खिलाफ विशेष चेतावनी दी गई। गौरतलब है कि यह घोषणापत्र तब आया है जब समूह के भीतर इन मुद्दों पर एकमत होना कठिन माना जा रहा था।
ब्रिक्स बिजनेस फोरम की भूमिका
शिखर सम्मेलन के समानांतर ब्रिक्स बिजनेस फोरम ने व्यापार, निवेश, वित्त, प्रौद्योगिकी और विकास की चुनौतियों पर व्यापार जगत के नेताओं, मंत्रियों और राष्ट्राध्यक्षों को एक साझा मंच दिया। यूरेशिया रिव्यू की रिपोर्ट के अनुसार, इस फोरम ने ब्रिक्स बिजनेस काउंसिल की सिफारिशों पर चर्चा में भी अहम भूमिका निभाई। एमएसएमई, डिजिटल अर्थव्यवस्था, मानकों में सहयोग और मूल्य श्रृंखला एकीकरण पर इन सिफारिशों को शिखर सम्मेलन के घोषणापत्र में नियमित रूप से शामिल किया जाता है।
वैश्विक मीडिया का नजरिया
द न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, शिखर सम्मेलन का केंद्रीय सवाल यह था कि प्रधानमंत्री मोदी या चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग — विकासशील दुनिया की अधिक प्रभावशाली आवाज़ के रूप में कौन उभरेगा। द वॉल स्ट्रीट जर्नल ने कहा कि अमेरिका के साथ भारत और चीन के संबंधों में अनिश्चितता ने इन दोनों परमाणु-सक्षम पड़ोसी देशों के लिए तनाव कम करने का एक दुर्लभ अवसर उत्पन्न किया है। अमेरिकी प्रमुख अखबारों ने इस समिट को बदलते वैश्विक व्यवस्था की झलक के रूप में देखा — जो तनावपूर्ण गठबंधनों, क्षेत्रीय युद्धों और वाशिंगटन-बीजिंग प्रतिस्पर्धा से आकार ले रहा है।
यह ऐसे समय में आया है जब ब्रिक्स समूह का विस्तार हो चुका है और उसकी वैश्विक प्रासंगिकता पर बहस तेज है। भारत की अध्यक्षता में सर्वसम्मत घोषणापत्र का आना, नई दिल्ली के लिए एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक संकेत है।