ब्रिक्स व्यापार को गति देने के लिए नॉन-टैरिफ बाधाएँ हटाना ज़रूरी: ईईपीसी इंडिया
सारांश
मुख्य बातें
इंजीनियरिंग निर्यात संवर्धन परिषद ईईपीसी इंडिया ने 13 सितंबर 2026 को माँग उठाई कि ब्रिक्स सदस्य देशों के बीच व्यापार को नई रफ़्तार देने के लिए गैर-शुल्क बाधाओं (नॉन-टैरिफ बैरियर्स) को समाप्त करना और स्थानीय मुद्राओं में सुगम भुगतान प्रणाली विकसित करना अनिवार्य है। संस्था का मानना है कि ये दो कदम भारतीय निर्यातकों की 75 प्रतिशत व्यापारिक समस्याओं का समाधान कर सकते हैं।
मुख्य माँग और तर्क
ईईपीसी इंडिया के चेयरमैन पंकज चड्ढा ने कहा कि भारतीय निर्यातकों के सामने आने वाली लगभग 75 प्रतिशत समस्याओं का समाधान गैर-शुल्क बाधाओं को कम करने और राष्ट्रीय मुद्राओं में तेज़ एवं प्रभावी भुगतान व्यवस्था लागू करने से हो सकता है। उन्होंने कहा, 'एक्सपोर्टर्स को होने वाली लगभग 75 प्रतिशत समस्याओं को नॉन-टैरिफ बाधाओं को हटाकर और अलग-अलग देशों की अपनी करेंसी में आसान और कुशल पेमेंट सिस्टम अपनाकर हल किया जा सकता है।'
चड्ढा ने यह भी कहा कि ब्रिक्स देशों के बीच नॉन-टैरिफ बाधाओं पर साझा समझौता करना अब समय की माँग है। उनके अनुसार, 'हम ब्रिक्स देशों के बीच नॉन-टैरिफ बाधाओं पर एक आम समझौता कर सकते हैं और कुछ स्टैंडर्ड्स पर सहमत हो सकते हैं। हालाँकि हम इस पर कुछ समय से चर्चा कर रहे हैं, लेकिन अब इसे लागू करने का समय आ गया है।'
नॉन-टैरिफ बाधाएँ: टैरिफ से बड़ी चुनौती
चड्ढा ने रेखांकित किया कि अधिकांश देशों में नॉन-टैरिफ उपायों से निर्यात की लागत, प्रत्यक्ष शुल्कों (टैरिफ) की तुलना में कहीं अधिक बढ़ जाती है। यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता बढ़ रही है और देश अपनी आपूर्ति शृंखलाओं को पुनर्गठित कर रहे हैं। इसीलिए व्यापारिक साझेदार देशों के बीच नियामकीय (रेगुलेटरी) प्रक्रियाओं को सरल बनाने के लिए तत्काल कदम उठाने की ज़रूरत है।
ब्रिक्स का वैश्विक व्यापार में महत्व
गौरतलब है कि ब्रिक्स समूह वर्तमान में वैश्विक व्यापार का लगभग एक-चौथाई हिस्सा प्रतिनिधित्व करता है। यदि सदस्य देश गैर-शुल्क बाधाएँ घटाने और भुगतान प्रणालियों में समन्वय स्थापित करने में सफल होते हैं, तो समूह की वैश्विक व्यापार हिस्सेदारी और अधिक बढ़ सकती है। ब्रिक्स देशों में ब्राज़ील, चीन, इंडोनेशिया, सऊदी अरब और दक्षिण अफ्रीका भारतीय इंजीनियरिंग उत्पादों के प्रमुख बाज़ार हैं।
भारतीय इंजीनियरिंग निर्यात की भूमिका
भारत के लिए यह मुद्दा विशेष रूप से अहम है, क्योंकि इंजीनियरिंग उत्पाद देश के कुल वस्तु निर्यात (मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट) में लगभग 27 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखते हैं। आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, अप्रैल 2025 से मार्च 2026 के बीच भारत का इंजीनियरिंग निर्यात $122.43 अरब रहा। यह उस देश की उल्लेखनीय यात्रा है, जो 1950 के दशक में मात्र $1 करोड़ (10 मिलियन डॉलर) का इंजीनियरिंग निर्यातक था।
ईईपीसी इंडिया वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा प्रायोजित भारत का प्रमुख व्यापार एवं निवेश संवर्धन संगठन है, जिसे मंत्रालय द्वारा देश की आदर्श ईपीसी (निर्यात संवर्धन परिषद) के रूप में मान्यता प्राप्त है। आगे देखें तो ब्रिक्स देशों के बीच व्यापारिक मानकों पर आम सहमति बनना भारत की निर्यात महत्वाकांक्षाओं के लिए एक निर्णायक अवसर साबित हो सकता है।