13 सितंबर 2026
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ब्रिक्स व्यापार को गति देने के लिए नॉन-टैरिफ बाधाएँ हटाना ज़रूरी: ईईपीसी इंडिया

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ब्रिक्स व्यापार को गति देने के लिए नॉन-टैरिफ बाधाएँ हटाना ज़रूरी: ईईपीसी इंडिया

सारांश

ईईपीसी इंडिया के चेयरमैन पंकज चड्ढा ने कहा कि ब्रिक्स देशों में नॉन-टैरिफ बाधाएँ हटाने और स्थानीय मुद्राओं में भुगतान प्रणाली अपनाने से भारतीय निर्यातकों की 75% समस्याएँ सुलझ सकती हैं। ब्रिक्स वैश्विक व्यापार के एक-चौथाई का प्रतिनिधित्व करता है और भारत का इंजीनियरिंग निर्यात $122.43 अरब तक पहुँच चुका है।

मुख्य बातें

ईईपीसी इंडिया ने 13 सितंबर 2026 को ब्रिक्स देशों में नॉन-टैरिफ बाधाएँ समाप्त करने और स्थानीय मुद्राओं में भुगतान प्रणाली विकसित करने की माँग की।
चेयरमैन पंकज चड्ढा के अनुसार, इन दो कदमों से भारतीय निर्यातकों की लगभग 75 प्रतिशत समस्याएँ हल हो सकती हैं।
ब्रिक्स समूह वैश्विक व्यापार का लगभग एक-चौथाई हिस्सा प्रतिनिधित्व करता है।
भारत के कुल वस्तु निर्यात में इंजीनियरिंग उत्पादों की हिस्सेदारी लगभग 27 प्रतिशत है।
अप्रैल 2025–मार्च 2026 के बीच भारत का इंजीनियरिंग निर्यात $122.43 अरब रहा।
ब्राज़ील , चीन , इंडोनेशिया , सऊदी अरब और दक्षिण अफ्रीका भारतीय इंजीनियरिंग उत्पादों के प्रमुख ब्रिक्स बाज़ार हैं।

इंजीनियरिंग निर्यात संवर्धन परिषद ईईपीसी इंडिया ने 13 सितंबर 2026 को माँग उठाई कि ब्रिक्स सदस्य देशों के बीच व्यापार को नई रफ़्तार देने के लिए गैर-शुल्क बाधाओं (नॉन-टैरिफ बैरियर्स) को समाप्त करना और स्थानीय मुद्राओं में सुगम भुगतान प्रणाली विकसित करना अनिवार्य है। संस्था का मानना है कि ये दो कदम भारतीय निर्यातकों की 75 प्रतिशत व्यापारिक समस्याओं का समाधान कर सकते हैं।

मुख्य माँग और तर्क

ईईपीसी इंडिया के चेयरमैन पंकज चड्ढा ने कहा कि भारतीय निर्यातकों के सामने आने वाली लगभग 75 प्रतिशत समस्याओं का समाधान गैर-शुल्क बाधाओं को कम करने और राष्ट्रीय मुद्राओं में तेज़ एवं प्रभावी भुगतान व्यवस्था लागू करने से हो सकता है। उन्होंने कहा, 'एक्सपोर्टर्स को होने वाली लगभग 75 प्रतिशत समस्याओं को नॉन-टैरिफ बाधाओं को हटाकर और अलग-अलग देशों की अपनी करेंसी में आसान और कुशल पेमेंट सिस्टम अपनाकर हल किया जा सकता है।'

चड्ढा ने यह भी कहा कि ब्रिक्स देशों के बीच नॉन-टैरिफ बाधाओं पर साझा समझौता करना अब समय की माँग है। उनके अनुसार, 'हम ब्रिक्स देशों के बीच नॉन-टैरिफ बाधाओं पर एक आम समझौता कर सकते हैं और कुछ स्टैंडर्ड्स पर सहमत हो सकते हैं। हालाँकि हम इस पर कुछ समय से चर्चा कर रहे हैं, लेकिन अब इसे लागू करने का समय आ गया है।'

नॉन-टैरिफ बाधाएँ: टैरिफ से बड़ी चुनौती

चड्ढा ने रेखांकित किया कि अधिकांश देशों में नॉन-टैरिफ उपायों से निर्यात की लागत, प्रत्यक्ष शुल्कों (टैरिफ) की तुलना में कहीं अधिक बढ़ जाती है। यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता बढ़ रही है और देश अपनी आपूर्ति शृंखलाओं को पुनर्गठित कर रहे हैं। इसीलिए व्यापारिक साझेदार देशों के बीच नियामकीय (रेगुलेटरी) प्रक्रियाओं को सरल बनाने के लिए तत्काल कदम उठाने की ज़रूरत है।

ब्रिक्स का वैश्विक व्यापार में महत्व

गौरतलब है कि ब्रिक्स समूह वर्तमान में वैश्विक व्यापार का लगभग एक-चौथाई हिस्सा प्रतिनिधित्व करता है। यदि सदस्य देश गैर-शुल्क बाधाएँ घटाने और भुगतान प्रणालियों में समन्वय स्थापित करने में सफल होते हैं, तो समूह की वैश्विक व्यापार हिस्सेदारी और अधिक बढ़ सकती है। ब्रिक्स देशों में ब्राज़ील, चीन, इंडोनेशिया, सऊदी अरब और दक्षिण अफ्रीका भारतीय इंजीनियरिंग उत्पादों के प्रमुख बाज़ार हैं।

भारतीय इंजीनियरिंग निर्यात की भूमिका

भारत के लिए यह मुद्दा विशेष रूप से अहम है, क्योंकि इंजीनियरिंग उत्पाद देश के कुल वस्तु निर्यात (मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट) में लगभग 27 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखते हैं। आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, अप्रैल 2025 से मार्च 2026 के बीच भारत का इंजीनियरिंग निर्यात $122.43 अरब रहा। यह उस देश की उल्लेखनीय यात्रा है, जो 1950 के दशक में मात्र $1 करोड़ (10 मिलियन डॉलर) का इंजीनियरिंग निर्यातक था।

ईईपीसी इंडिया वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा प्रायोजित भारत का प्रमुख व्यापार एवं निवेश संवर्धन संगठन है, जिसे मंत्रालय द्वारा देश की आदर्श ईपीसी (निर्यात संवर्धन परिषद) के रूप में मान्यता प्राप्त है। आगे देखें तो ब्रिक्स देशों के बीच व्यापारिक मानकों पर आम सहमति बनना भारत की निर्यात महत्वाकांक्षाओं के लिए एक निर्णायक अवसर साबित हो सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन ब्रिक्स की विविधता — जिसमें चीन जैसी प्रमुख अर्थव्यवस्था और भारत के बीच पहले से व्यापार असंतुलन है — इस 'साझा मानकों' वाले लक्ष्य को व्यवहार में जटिल बनाती है। स्थानीय मुद्राओं में भुगतान प्रणाली का विचार नया नहीं है, बल्कि पिछले कई वर्षों से चर्चा में है, लेकिन डॉलर-प्रभुत्व और विनिमय दर अनिश्चितता जैसी बाधाएँ इसे अभी तक व्यापक स्तर पर लागू नहीं होने दे सकी हैं। जब तक ब्रिक्स के भीतर किसी बाध्यकारी विवाद-निपटान तंत्र की रूपरेखा नहीं बनती, तब तक 'आम समझौते' की बातें केवल घोषणापत्र बनकर रह सकती हैं। भारत को चाहिए कि वह ब्रिक्स मंचों पर इस एजेंडे को ठोस, क्रियान्वयन-योग्य प्रस्तावों के साथ आगे बढ़ाए, न कि केवल वक्तव्यों तक सीमित रखे।
RashtraPress
13 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ईईपीसी इंडिया ने ब्रिक्स देशों के लिए क्या माँग की है?
ईईपीसी इंडिया ने ब्रिक्स सदस्य देशों के बीच गैर-शुल्क बाधाओं (नॉन-टैरिफ बैरियर्स) को समाप्त करने और स्थानीय मुद्राओं में सुगम भुगतान प्रणाली विकसित करने की माँग की है। संस्था का मानना है कि इससे भारतीय निर्यातकों की 75 प्रतिशत समस्याएँ हल हो सकती हैं।
नॉन-टैरिफ बाधाएँ क्या होती हैं और ये निर्यात को कैसे प्रभावित करती हैं?
नॉन-टैरिफ बाधाएँ वे नियामकीय, मानक-संबंधी और प्रशासनिक अवरोध हैं जो सीधे शुल्क (टैरिफ) के अलावा निर्यात की लागत और जटिलता बढ़ाते हैं। ईईपीसी इंडिया के अनुसार, अधिकांश देशों में इन उपायों से निर्यात लागत सीधे टैरिफ की तुलना में कहीं अधिक हो जाती है, जिससे प्रतिस्पर्धात्मकता घटती है।
ब्रिक्स में भारत के लिए प्रमुख इंजीनियरिंग निर्यात बाज़ार कौन से हैं?
ब्रिक्स देशों में ब्राज़ील, चीन, इंडोनेशिया, सऊदी अरब और दक्षिण अफ्रीका भारतीय इंजीनियरिंग उत्पादों के मुख्य बाज़ार हैं। भारत के कुल वस्तु निर्यात में इंजीनियरिंग उत्पादों की हिस्सेदारी लगभग 27 प्रतिशत है।
भारत का इंजीनियरिंग निर्यात कितना बड़ा है?
अप्रैल 2025 से मार्च 2026 के बीच भारत का इंजीनियरिंग निर्यात $122.43 अरब रहा। 1950 के दशक में यह मात्र $1 करोड़ (10 मिलियन डॉलर) था, जो सात दशकों में हज़ारों गुना बढ़ चुका है।
ब्रिक्स समूह का वैश्विक व्यापार में क्या महत्व है?
ब्रिक्स समूह वर्तमान में वैश्विक व्यापार का लगभग एक-चौथाई हिस्सा प्रतिनिधित्व करता है। यदि सदस्य देश नॉन-टैरिफ बाधाएँ घटाने और भुगतान प्रणालियों में समन्वय में सफल होते हैं, तो समूह की वैश्विक व्यापार हिस्सेदारी और बढ़ सकती है।
राष्ट्र प्रेस
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