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ब्रिक्स सम्मेलन में पहलगाम हमले की निंदा और नई दिल्ली घोषणा भारत की बड़ी कूटनीतिक सफलता: पूर्व राजदूत जेके त्रिपाठी

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ब्रिक्स सम्मेलन में पहलगाम हमले की निंदा और नई दिल्ली घोषणा भारत की बड़ी कूटनीतिक सफलता: पूर्व राजदूत जेके त्रिपाठी

सारांश

ब्रिक्स मंच पर पहलगाम हमले की सर्वसम्मत निंदा और नई दिल्ली घोषणा — वर्षों की कूटनीतिक मेहनत का नतीजा। पूर्व राजदूत जेके त्रिपाठी ने इसे भारत की बड़ी सफलता बताया, लेकिन कहा कि असली परीक्षा अब कार्यान्वयन में है।

मुख्य बातें

पूर्व राजदूत जेके त्रिपाठी ने नई दिल्ली ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में पहलगाम आतंकी हमले की निंदा को भारत की बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि बताया।
घोषणापत्र में सात से आठ पैराग्राफ में आतंकवाद, टेरर फंडिंग और जम्मू-कश्मीर में हुए हमलों का स्पष्ट उल्लेख।
पिछले वर्ष तियानजिन एससीओ सम्मेलन में आतंकवाद का उल्लेख न होने पर भारत ने घोषणापत्र पर हस्ताक्षर नहीं किए थे।
त्रिपाठी ने PM मोदी के 'ग्लोबल साउथ को रूल शेपर बनना चाहिए' बयान का समर्थन किया; कहा 190-195 देशों की आवाज़ सुनी जाए।
भारत-चीन , सऊदी अरब-ईरान और यूएई-ईरान जैसे मतभेदों के बावजूद सर्वसम्मति बनना इस सम्मेलन की बड़ी उपलब्धि।
पूर्व राजदूत ने सावधान किया कि घोषणा का कार्यान्वयन ही असली कसौटी होगा।

पूर्व राजदूत जेके त्रिपाठी ने नई दिल्ली में संपन्न ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान पहलगाम आतंकी हमले की सर्वसम्मति से निंदा और नई दिल्ली घोषणा पर सभी सदस्य देशों की सहमति को भारत की एक ऐतिहासिक कूटनीतिक उपलब्धि करार दिया है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस आह्वान का भी समर्थन किया कि ग्लोबल साउथ को 'रूल टेकर' से 'रूल शेपर' बनना चाहिए, और कहा कि 190 से 195 देशों की आवाज़ वैश्विक मंच पर सुनी जानी आवश्यक है।

आतंकवाद पर बनी आम सहमति का महत्व

त्रिपाठी ने कहा कि यह सफलता एक दिन में नहीं, बल्कि पिछले एक वर्ष की कूटनीतिक मेहनत का परिणाम है। उन्होंने याद दिलाया कि पिछले वर्ष चीन के तियानजिन में हुए एससीओ शिखर सम्मेलन में आतंकवाद और टेरर फंडिंग के उल्लेख को लेकर विवाद हुआ था, जिसके चलते भारत ने उस घोषणापत्र पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया था।

उन्होंने कहा, 'इस साल बिश्केक में हुए एससीओ शिखर सम्मेलन और उसके बाद नई दिल्ली में आतंकवाद पर व्यापक चर्चा हुई। लगभग सात से आठ पैराग्राफ में आतंकवाद, टेरर फंडिंग और उसके विभिन्न रूपों को संबोधित किया गया, और जम्मू-कश्मीर तथा भारत में हुए आतंकी हमलों का स्पष्ट उल्लेख किया गया।' यह ऐसे समय में आया है जब भारत वर्षों से पड़ोस से प्रायोजित आतंकवाद के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने का प्रयास कर रहा था।

ग्लोबल साउथ और नियम निर्धारण का अधिकार

प्रधानमंत्री मोदी के 'ग्लोबल साउथ को रूल टेकर से रूल शेपर बनना चाहिए' वाले बयान पर त्रिपाठी ने कहा कि यह माँग तर्कसंगत और समय की ज़रूरत है। उनके अनुसार, विश्व के लगभग 190 से 195 देश ग्लोबल साउथ का हिस्सा हैं, फिर भी वैश्विक नियम मुख्यतः G7 के सात देशों द्वारा तय किए जाते हैं।

त्रिपाठी ने स्पष्ट किया कि ग्लोबल साउथ को अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में महज़ अनुपालनकर्ता नहीं, बल्कि नीति-निर्माता की भूमिका मिलनी चाहिए। गौरतलब है कि भारत इस मुद्दे को जी20 की अपनी अध्यक्षता के दौरान भी प्रमुखता से उठा चुका है।

भिन्न हितों के बावजूद एकजुटता

नई दिल्ली घोषणा पर सर्वसम्मति को पूर्व राजदूत ने इसलिए भी उल्लेखनीय बताया क्योंकि इसमें परस्पर विरोधी हितों वाले देशों ने भाग लिया। उन्होंने उदाहरण दिया — भारत और चीन, सऊदी अरब और ईरान, तथा यूएई और ईरान — जिनके आपसी मतभेद सर्वविदित हैं।

इसके बावजूद न केवल एक साझा घोषणा जारी हुई, बल्कि कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर आम सहमति भी बनी। त्रिपाठी के अनुसार, 'यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि है।' यह ब्रिक्स मंच की समावेशिता और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की बढ़ती प्रासंगिकता को भी रेखांकित करता है।

कार्यान्वयन की परीक्षा अभी बाकी

हालाँकि, पूर्व राजदूत ने सावधानी भी बरती। उन्होंने कहा कि घोषणाओं और उन पर ठोस अमल के बीच का अंतर ही असली कसौटी होती है। अब यह देखना होगा कि नई दिल्ली घोषणा में आतंकवाद पर बनी आम सहमति किस हद तक व्यावहारिक कार्रवाई में बदलती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि बहुपक्षीय मंचों पर घोषणाएँ प्रायः साझा भावना व्यक्त करती हैं, किंतु द्विपक्षीय स्तर पर उनका क्रियान्वयन जटिल रहता है। भारत के लिए यह सम्मेलन कूटनीतिक मोर्चे पर एक मज़बूत शुरुआत है, परंतु असली जीत तब होगी जब इन संकल्पों का ज़मीनी असर दिखे।

संपादकीय दृष्टिकोण

किंतु बहुपक्षीय मंचों पर 'निंदा' और 'ठोस कार्रवाई' के बीच की खाई अक्सर चौड़ी होती है। यह ऐसे समय में आया है जब चीन और पाकिस्तान के रिश्ते सुदृढ़ हैं, और बीजिंग आतंकवाद की परिभाषा पर सहमति देने के बावजूद इस्लामाबाद को कवर देता रहा है। ग्लोबल साउथ को 'रूल शेपर' बनाने की बात कूटनीतिक दृष्टि से प्रभावशाली है, परंतु G7 के संस्थागत ढाँचे को चुनौती देने के लिए केवल घोषणाएँ नहीं, ठोस वैकल्पिक संस्थाओं की ज़रूरत होगी।
RashtraPress
13 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ब्रिक्स सम्मेलन में पहलगाम हमले की निंदा क्यों महत्वपूर्ण है?
ब्रिक्स के सभी सदस्य देशों द्वारा सर्वसम्मति से पहलगाम आतंकी हमले की निंदा करना भारत के लिए कूटनीतिक मान्यता है, क्योंकि इसमें चीन जैसे देश भी शामिल हैं जो अतीत में ऐसे बयानों पर आपत्ति जताते रहे हैं। पूर्व राजदूत जेके त्रिपाठी के अनुसार यह पिछले एक वर्ष की कूटनीतिक मेहनत का परिणाम है।
नई दिल्ली घोषणा क्या है और इसमें क्या शामिल है?
नई दिल्ली घोषणा ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के अंत में जारी साझा दस्तावेज़ है, जिस पर सभी सदस्य देशों ने सर्वसम्मति से हस्ताक्षर किए। इसमें आतंकवाद, टेरर फंडिंग और जम्मू-कश्मीर सहित भारत में हुए आतंकी हमलों का स्पष्ट उल्लेख सात से आठ पैराग्राफ में किया गया है।
पिछले साल तियानजिन एससीओ सम्मेलन में क्या हुआ था?
पिछले वर्ष चीन के तियानजिन में हुए एससीओ शिखर सम्मेलन में आतंकवाद और टेरर फंडिंग का उल्लेख घोषणापत्र में न होने के कारण भारत ने उस पर हस्ताक्षर नहीं किए थे। इस वर्ष बिश्केक और नई दिल्ली में इन मुद्दों पर व्यापक चर्चा हुई और सहमति बनी।
PM मोदी के 'ग्लोबल साउथ को रूल शेपर' बनाने के बयान का क्या अर्थ है?
प्रधानमंत्री मोदी का आशय है कि विश्व के लगभग 190 से 195 देश जो ग्लोबल साउथ में आते हैं, उन्हें केवल G7 जैसे सात देशों द्वारा बनाए नियमों का पालन करने के बजाय वैश्विक नियम-निर्माण में सक्रिय भूमिका मिलनी चाहिए। पूर्व राजदूत त्रिपाठी ने इस विचार का पूर्ण समर्थन किया।
क्या नई दिल्ली घोषणा का कार्यान्वयन सुनिश्चित होगा?
पूर्व राजदूत जेके त्रिपाठी ने स्वयं माना कि घोषणा पर आम सहमति बड़ी उपलब्धि है, परंतु इसका कार्यान्वयन और ठोस कार्रवाई अभी देखनी बाकी है। विशेषज्ञों के अनुसार बहुपक्षीय घोषणाओं और उन पर व्यावहारिक अमल के बीच अक्सर बड़ा अंतर रहता है।
राष्ट्र प्रेस
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