13 सितंबर 2026
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ब्रिक्स में पहलगाम हमले की निंदा: डिफेंस एक्सपर्ट पीके सहगल बोले — 'भारत की कूटनीति अद्वितीय'

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ब्रिक्स में पहलगाम हमले की निंदा: डिफेंस एक्सपर्ट पीके सहगल बोले — 'भारत की कूटनीति अद्वितीय'

सारांश

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में पहलगाम हमले की निंदा महज एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं थी — चीन की मौजूदगी में यह संदेश पाकिस्तान की ओर सीधा इशारा था। डिफेंस एक्सपर्ट पीके सहगल के मुताबिक, भारत ने वैश्विक मंच पर एक साथ अमेरिका, रूस, चीन और ईरान से बात करने की क्षमता साबित की — यह रणनीतिक स्वायत्तता की नई मिसाल है।

मुख्य बातें

ब्रिक्स संयुक्त घोषणापत्र में पहलगाम आतंकी हमले की निंदा की गई — बिना किसी देश का नाम लिए, लेकिन संदेश स्पष्ट।
डिफेंस एक्सपर्ट पीके सहगल ने कहा कि चीन की मौजूदगी में यह निंदा भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक उपलब्धियों में से एक है।
प्रधानमंत्री मोदी ने शी जिनपिंग से मुलाकात में LAC पर शांति और स्थिरता बनाए रखने का स्पष्ट संदेश दिया।
भारत रूस से SU-30 अपग्रेड (अनुमानित 11 अरब डॉलर ), SU-57 और 350 किमी रेंज की लंबी दूरी की मिसाइल चाहता है।
रूस दो स्कॉर्पीन पनडुब्बियाँ तत्काल देने और 3-4 और पनडुब्बियों के संयुक्त निर्माण को तैयार है।
भारत ने 'मेड इन इंडिया' और संयुक्त उत्पादन को रक्षा साझेदारी का केंद्र बनाने पर जोर दिया।

नई दिल्ली में 13 सितंबर 2026 को ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान जारी संयुक्त घोषणापत्र में पहलगाम आतंकी हमले की निंदा किए जाने को रक्षा विश्लेषकों ने भारत की बड़ी कूटनीतिक सफलता बताया है। सेवानिवृत्त मेजर जनरल और डिफेंस एक्सपर्ट पीके सहगल के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में जारी इस संयुक्त बयान ने वैश्विक मंच पर आतंकवाद के खिलाफ एक स्पष्ट और निर्विवाद संदेश दिया।

ब्रिक्स घोषणापत्र में आतंकवाद पर स्पष्ट रुख

सेवानिवृत्त मेजर जनरल पीके सहगल ने इस उपलब्धि की विशेषता बताते हुए कहा, 'ये बड़ी उपलब्धि है क्योंकि ब्रिक्स में चीन भी मौजूद था — एक ऐसा देश जो हमेशा पाकिस्तान के साथ खड़ा दिखता है। यहाँ बिना किसी देश का नाम लिए पहलगाम हिंसा की निंदा की गई। सब जानते थे कि इशारा किस की ओर था।' घोषणापत्र में स्पष्ट किया गया कि आतंक के हर स्वरूप की निंदा होनी चाहिए — चाहे उसका स्रोत कुछ भी हो या उसके पीछे की वजह कुछ भी — और आतंकवादियों के खिलाफ ठोस कार्रवाई की जानी चाहिए। यह ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद पर भारत की अंतरराष्ट्रीय लॉबिंग को मिश्रित प्रतिक्रियाएँ मिलती रही हैं।

भारत की रणनीतिक स्वायत्तता: अमेरिका, रूस, चीन सबके साथ

सहगल ने भारत की बहु-पक्षीय कूटनीति को 'अद्वितीय' बताते हुए कहा, 'जो भारत ने हासिल किया उसकी किसी से तुलना नहीं की जा सकती, वो एक मिसाल है। भारत ने दुनिया को — खासकर पश्चिम को — जता दिया कि वो एक ऐसा देश है जो अमेरिका, रूस, चीन और ईरान के साथ बिना अपने हितों से समझौता किए बात करने का दम रखता है।' गौरतलब है कि यह वैश्विक ध्रुवीकरण के उस दौर में आया है जब अधिकांश देश किसी एक खेमे में खड़े होने को विवश हो रहे हैं।

मोदी-शी जिनपिंग मुलाकात और एलएसी पर संदेश

रक्षा विशेषज्ञ के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई द्विपक्षीय बैठक में भारत ने स्पष्ट किया कि वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर शांति और स्थिरता बनाए रखना अनिवार्य है। सहगल के मुताबिक, इस संदेश ने सीमा पर तनाव के बीच भारत के रणनीतिक संतुलन को रेखांकित किया।

रूस के साथ रक्षा सहयोग: SU-57, SU-30 अपग्रेड और स्कॉर्पीन पनडुब्बियाँ

सहगल ने रूस के साथ रक्षा सहयोग के तीन प्रमुख बिंदुओं का विस्तार से उल्लेख किया। उनके अनुसार, भारत रूस से तीन प्राथमिकताओं पर जोर दे रहा है:

पहला, SU-30 लड़ाकू विमानों का अपग्रेड, जिस पर लगभग 11 अरब डॉलर का खर्च अनुमानित है और जो अगले 20-30 वर्षों तक भारत के काम आ सकता है। दूसरा, SU-57 पाँचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान, जिसे रूस तकनीक हस्तांतरण के साथ भारत को देने को तैयार है — लेकिन भारत की माँग है कि सोर्स कोड भी मिले ताकि भारत अपने रडार और सेंसर इंटिग्रेट कर सके। तीसरा, स्कॉर्पीन पनडुब्बियाँ — रूस दो पनडुब्बियाँ तत्काल देने को तैयार है और तीन-चार और पनडुब्बियों के संयुक्त निर्माण पर भारत में ही काम करने का प्रस्ताव है। इसके अलावा, भारत 350 किलोमीटर तक मार करने में सक्षम लंबी दूरी की मिसाइल की भी माँग कर रहा है।

सहगल ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत ने रूस के साथ संबंधों में विक्रेता और खरीदार की भूमिका से आगे बढ़कर 'मेड इन इंडिया' और संयुक्त उत्पादन को केंद्र में रखने की नीति अपनाई है।

आगे क्या: वैश्विक सुरक्षा ढाँचे में भारत की बढ़ती भूमिका

रक्षा विशेषज्ञ के अनुसार, ब्रिक्स में भारत, रूस और चीन की एक साथ मौजूदगी वैश्विक सुरक्षा ढाँचे को नई दिशा दे रही है। भारत का यह कदम न केवल पड़ोसी देशों को, बल्कि पश्चिमी शक्तियों को भी यह संकेत देता है कि नई दिल्ली अपनी विदेश नीति में किसी एक शक्ति पर निर्भर नहीं रहेगी। आने वाले महीनों में रक्षा समझौतों की दिशा तय करेगी कि ब्रिक्स में मिली यह कूटनीतिक सफलता ज़मीनी स्तर पर कितनी साकार होती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसका असली मूल्य इस बात में है कि चीन ने इस पर हस्ताक्षर किए — वही चीन जो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में बार-बार पाकिस्तान समर्थित आतंकियों के खिलाफ प्रस्तावों को रोकता रहा है। हालाँकि 'बिना देश का नाम लिए' की यह रणनीति दोहरी भी है — यह पाकिस्तान को सीधे जवाबदेह नहीं ठहराती। रक्षा सौदों पर भारत की 'मेड इन इंडिया' और सोर्स कोड की माँग सही दिशा में है, पर SU-57 जैसे संवेदनशील मामलों में रूस की तकनीक हस्तांतरण की सीमा अभी भी अस्पष्ट है। असली परीक्षा यह होगी कि यह कूटनीतिक सफलता ठोस रक्षा स्वावलंबन में कितनी तब्दील होती है।
RashtraPress
13 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ब्रिक्स घोषणापत्र में पहलगाम हमले की निंदा क्यों अहम है?
ब्रिक्स संयुक्त घोषणापत्र में पहलगाम हिंसा की निंदा इसलिए अहम है क्योंकि चीन — जो प्रायः पाकिस्तान का साथ देता है — इस समूह का सदस्य है और उसने भी इस बयान पर सहमति जताई। रक्षा विशेषज्ञ पीके सहगल के अनुसार, बिना किसी देश का नाम लिए भी यह संदेश स्पष्ट था कि इशारा किसकी ओर था।
मोदी-शी जिनपिंग बैठक में LAC को लेकर क्या हुआ?
ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की द्विपक्षीय बैठक हुई, जिसमें भारत ने स्पष्ट किया कि वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर शांति और स्थिरता बनाए रखना अनिवार्य है। यह बैठक सीमा पर चल रहे तनाव के बीच हुई।
भारत रूस से कौन-से तीन रक्षा सौदे चाहता है?
डिफेंस एक्सपर्ट पीके सहगल के अनुसार, भारत रूस से तीन प्रमुख चीजें चाहता है: SU-30 लड़ाकू विमानों का अपग्रेड (अनुमानित 11 अरब डॉलर), SU-57 पाँचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान (सोर्स कोड सहित तकनीक हस्तांतरण के साथ), और 350 किलोमीटर रेंज वाली लंबी दूरी की मिसाइल।
स्कॉर्पीन पनडुब्बियों पर रूस का क्या प्रस्ताव है?
रूस दो स्कॉर्पीन पनडुब्बियाँ तत्काल देने को तैयार है और बाकी तीन से चार पनडुब्बियों के लिए भारत में ही संयुक्त उत्पादन का प्रस्ताव दिया है। भारत रिपेयर और मेंटेनेंस भी देश में ही करने पर जोर दे रहा है।
ब्रिक्स में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का क्या महत्व है?
पीके सहगल के अनुसार, भारत ने ब्रिक्स में यह साबित किया कि वह अमेरिका, रूस, चीन और ईरान — सभी के साथ एक साथ अपने हितों से समझौता किए बिना बात कर सकता है। यह वैश्विक ध्रुवीकरण के दौर में भारत की बहु-पक्षीय कूटनीति की विशिष्टता को रेखांकित करता है।
राष्ट्र प्रेस
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