ब्रिक्स में पहलगाम हमले की निंदा: डिफेंस एक्सपर्ट पीके सहगल बोले — 'भारत की कूटनीति अद्वितीय'
सारांश
मुख्य बातें
नई दिल्ली में 13 सितंबर 2026 को ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान जारी संयुक्त घोषणापत्र में पहलगाम आतंकी हमले की निंदा किए जाने को रक्षा विश्लेषकों ने भारत की बड़ी कूटनीतिक सफलता बताया है। सेवानिवृत्त मेजर जनरल और डिफेंस एक्सपर्ट पीके सहगल के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में जारी इस संयुक्त बयान ने वैश्विक मंच पर आतंकवाद के खिलाफ एक स्पष्ट और निर्विवाद संदेश दिया।
ब्रिक्स घोषणापत्र में आतंकवाद पर स्पष्ट रुख
सेवानिवृत्त मेजर जनरल पीके सहगल ने इस उपलब्धि की विशेषता बताते हुए कहा, 'ये बड़ी उपलब्धि है क्योंकि ब्रिक्स में चीन भी मौजूद था — एक ऐसा देश जो हमेशा पाकिस्तान के साथ खड़ा दिखता है। यहाँ बिना किसी देश का नाम लिए पहलगाम हिंसा की निंदा की गई। सब जानते थे कि इशारा किस की ओर था।' घोषणापत्र में स्पष्ट किया गया कि आतंक के हर स्वरूप की निंदा होनी चाहिए — चाहे उसका स्रोत कुछ भी हो या उसके पीछे की वजह कुछ भी — और आतंकवादियों के खिलाफ ठोस कार्रवाई की जानी चाहिए। यह ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद पर भारत की अंतरराष्ट्रीय लॉबिंग को मिश्रित प्रतिक्रियाएँ मिलती रही हैं।
भारत की रणनीतिक स्वायत्तता: अमेरिका, रूस, चीन सबके साथ
सहगल ने भारत की बहु-पक्षीय कूटनीति को 'अद्वितीय' बताते हुए कहा, 'जो भारत ने हासिल किया उसकी किसी से तुलना नहीं की जा सकती, वो एक मिसाल है। भारत ने दुनिया को — खासकर पश्चिम को — जता दिया कि वो एक ऐसा देश है जो अमेरिका, रूस, चीन और ईरान के साथ बिना अपने हितों से समझौता किए बात करने का दम रखता है।' गौरतलब है कि यह वैश्विक ध्रुवीकरण के उस दौर में आया है जब अधिकांश देश किसी एक खेमे में खड़े होने को विवश हो रहे हैं।
मोदी-शी जिनपिंग मुलाकात और एलएसी पर संदेश
रक्षा विशेषज्ञ के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई द्विपक्षीय बैठक में भारत ने स्पष्ट किया कि वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर शांति और स्थिरता बनाए रखना अनिवार्य है। सहगल के मुताबिक, इस संदेश ने सीमा पर तनाव के बीच भारत के रणनीतिक संतुलन को रेखांकित किया।
रूस के साथ रक्षा सहयोग: SU-57, SU-30 अपग्रेड और स्कॉर्पीन पनडुब्बियाँ
सहगल ने रूस के साथ रक्षा सहयोग के तीन प्रमुख बिंदुओं का विस्तार से उल्लेख किया। उनके अनुसार, भारत रूस से तीन प्राथमिकताओं पर जोर दे रहा है:
पहला, SU-30 लड़ाकू विमानों का अपग्रेड, जिस पर लगभग 11 अरब डॉलर का खर्च अनुमानित है और जो अगले 20-30 वर्षों तक भारत के काम आ सकता है। दूसरा, SU-57 पाँचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान, जिसे रूस तकनीक हस्तांतरण के साथ भारत को देने को तैयार है — लेकिन भारत की माँग है कि सोर्स कोड भी मिले ताकि भारत अपने रडार और सेंसर इंटिग्रेट कर सके। तीसरा, स्कॉर्पीन पनडुब्बियाँ — रूस दो पनडुब्बियाँ तत्काल देने को तैयार है और तीन-चार और पनडुब्बियों के संयुक्त निर्माण पर भारत में ही काम करने का प्रस्ताव है। इसके अलावा, भारत 350 किलोमीटर तक मार करने में सक्षम लंबी दूरी की मिसाइल की भी माँग कर रहा है।
सहगल ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत ने रूस के साथ संबंधों में विक्रेता और खरीदार की भूमिका से आगे बढ़कर 'मेड इन इंडिया' और संयुक्त उत्पादन को केंद्र में रखने की नीति अपनाई है।
आगे क्या: वैश्विक सुरक्षा ढाँचे में भारत की बढ़ती भूमिका
रक्षा विशेषज्ञ के अनुसार, ब्रिक्स में भारत, रूस और चीन की एक साथ मौजूदगी वैश्विक सुरक्षा ढाँचे को नई दिशा दे रही है। भारत का यह कदम न केवल पड़ोसी देशों को, बल्कि पश्चिमी शक्तियों को भी यह संकेत देता है कि नई दिल्ली अपनी विदेश नीति में किसी एक शक्ति पर निर्भर नहीं रहेगी। आने वाले महीनों में रक्षा समझौतों की दिशा तय करेगी कि ब्रिक्स में मिली यह कूटनीतिक सफलता ज़मीनी स्तर पर कितनी साकार होती है।