बांग्लादेश में भीड़ हिंसा का संकट: जुलाई 2024 विद्रोह के बाद 154 से अधिक मौतें, पुलिस बेअसर
सारांश
मुख्य बातें
बांग्लादेश में जुलाई 2024 के विद्रोह के बाद से भीड़ हिंसा और कानून-व्यवस्था का संकट लगातार गहराता जा रहा है — जनवरी से अगस्त 2026 के बीच भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या की कम से कम 154 घटनाएँ दर्ज की गई हैं। ढाका स्थित मानवाधिकार संगठन ऐन ओ सालिश केंद्र (एएसके) के आँकड़ों पर आधारित यह तस्वीर बताती है कि राजनीतिक उथल-पुथल के बाद से आम नागरिकों में कानून अपने हाथ में लेने की प्रवृत्ति खतरनाक स्तर तक पहुँच चुकी है।
रिपोर्ट क्या कहती है
ग्लोबल वॉयसेज की एक विश्लेषण रिपोर्ट में 2024 की राजनीतिक उथल-पुथल के बाद सत्ता में आई अंतरिम सरकार के कार्यकाल और उसके बाद फरवरी 2026 के संसदीय चुनाव में सत्तारूढ़ हुई बीएनपी के नेतृत्व वाली सरकार — दोनों कार्यकालों में भीड़ हिंसा का यह सिलसिला बेरोकटोक जारी रहने की बात कही गई है। भ्रष्टाचार विरोधी संस्था ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल बांग्लादेश (टीआईबी) ने अपनी माँगें मनवाने के लिए भीड़ जुटाने की बढ़ती प्रवृत्ति को चिंताजनक करार दिया है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर संयुक्त राष्ट्र की विशेष दूत आइरीन खान के अनुसार, दोषियों को लगातार कार्रवाई से बच निकलने की स्थिति — यानी दण्डमुक्ति की संस्कृति — इस प्रवृत्ति को और हवा दे रही है।
पत्रकार पर हमले की आपबीती
बांग्लादेशी टीवी पत्रकार रिफात आलम रिसान खुद भीड़ हिंसा के शिकार हो चुके हैं। दिसंबर 2025 में ढाका में कट्टरपंथी इस्लामी नेता शरीफ उस्मान बिन हादी को गोली मारे जाने के बाद वे ढाका मेडिकल कॉलेज अस्पताल में रिपोर्टिंग और वीडियो फुटेज जुटाने पहुँचे थे। तभी भीड़ के एक व्यक्ति ने उन पर हादी को गोली मारने का आरोप लगा दिया और देखते-देखते स्थिति बिगड़ गई।
रिसान ने 20 सितंबर 2026 को ग्लोबल वॉयसेज से बातचीत में बताया कि भीड़ में यह बात फैलते ही — बिना किसी जाँच या पुष्टि के — लोगों ने उन पर हमला बोल दिया। उन्हें पीटा गया, अस्पताल से बाहर धकेल दिया गया और एक समय वे सड़क पर गिर पड़े। भीड़ ने उनका फोन छीनने की भी कोशिश की। अंततः एक साथी टीवी पत्रकार और अन्य मीडियाकर्मियों ने उन्हें बचाया।
भीड़ हिंसा के तौर-तरीके
एक अन्य बांग्लादेशी टीवी पत्रकार जमाल रुहानी ने भीड़ हिंसा की कार्यप्रणाली पर चिंता जताई। उनके अनुसार, आमतौर पर एक या दो लोग किसी व्यक्ति को निशाना बनाते हैं और उनके हमला करने के बाद आसपास मौजूद कई अन्य लोग भी उसमें शामिल हो जाते हैं।
रुहानी ने कहा कि मारपीट करने वाले लोगों को अक्सर यह तक पता नहीं होता कि जिस पर हमला हो रहा है, वह वास्तव में दोषी है या नहीं। कई बार पीड़ित को यह भी नहीं पता होता कि उस पर आरोप क्या है — भीड़ में कोई बस इतना कह देता है 'इसे मारो' और हमला शुरू हो जाता है।
पुलिस की स्थिति और सुरक्षा तंत्र पर सवाल
रुहानी ने पुलिस की तैयारियों पर भी गंभीर सवाल उठाए। उनके अनुसार, 5 अगस्त 2024 के बाद से पुलिस का मनोबल पहले जैसा नहीं रहा। उन्होंने आरोप लगाया कि जिन इलाकों में भीड़ हिंसा होती है, वहाँ पुलिस अक्सर पर्याप्त रूप से तैयार नहीं होती और लगातार सतर्क रहने की स्थिति नजर नहीं आती।
यह ऐसे समय में आया है जब बांग्लादेश पहले से ही राजनीतिक और सामाजिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। गौरतलब है कि विद्रोह के बाद पुलिस बल के बड़े पैमाने पर पुनर्गठन की प्रक्रिया और उससे उपजी अनिश्चितता ने सुरक्षा तंत्र को कमज़ोर किया है।
आगे क्या
मानवाधिकार संगठनों और पत्रकार समूहों की माँग है कि बीएनपी सरकार भीड़ हिंसा के मामलों में जवाबदेही सुनिश्चित करे और पुलिस बल को पुनः प्रभावी बनाने के लिए ठोस कदम उठाए। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक दण्डमुक्ति की संस्कृति खत्म नहीं होती, यह प्रवृत्ति और मजबूत होती रहेगी।