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पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच भारत-बेलारूस व्यापार: जॉइंट मैन्युफैक्चरिंग और नए रूट पर जोर

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पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच भारत-बेलारूस व्यापार: जॉइंट मैन्युफैक्चरिंग और नए रूट पर जोर

सारांश

पश्चिमी प्रतिबंधों ने बेलारूस के यूरोपीय रास्ते बंद कर दिए — अब मिन्स्क की नज़र नई दिल्ली पर है। जॉइंट मैन्युफैक्चरिंग, पोटाश व्यापार और रुपया-रूबल पेमेंट से लेकर ब्रिक्स-SCO तक, बेलारूस के महावाणिज्य दूत मात्सुको ने साफ किया कि भारत अब उनकी विदेश नीति का केंद्र है।

मुख्य बातें

बेलारूस के महावाणिज्य दूत अलियाक्सांद्र मात्सुको ने 24 मई को मुंबई से भारत-बेलारूस संबंधों पर विस्तृत बातचीत की।
पश्चिमी प्रतिबंधों से यूरोपीय व्यापार मार्ग बंद होने के बाद बेलारूस भारत के साथ नए ट्रेड रूट और जॉइंट वेंचर की तलाश में है।
बेलारूस ब्रिक्स में साझेदार देश और SCO का पूर्ण सदस्य बन चुका है; भारत के समर्थन की सराहना की गई।
दोनों देश पोटाश फर्टिलाइजर व्यापार और रुपया-रूबल पेमेंट सिस्टम पर काम कर रहे हैं।
हेवी-ड्यूटी माइनिंग ट्रक और मशीनरी में बेलारूस की विशेषज्ञता को 'मेक इन इंडिया' के साथ जोड़ने की योजना।
दोनों देशों के रक्षा मंत्रालयों ने हाल ही में सैन्य-तकनीकी सहयोग पर चर्चा की।

पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों से पारंपरिक यूरोपीय व्यापार मार्ग बंद होने के बाद बेलारूस अब भारत के साथ नए व्यापारिक रास्ते तलाश रहा है। मुंबई में तैनात बेलारूस के महावाणिज्य दूत अलियाक्सांद्र मात्सुको ने 24 मई को दिए एक विशेष साक्षात्कार में कहा कि जॉइंट मैन्युफैक्चरिंग, फर्टिलाइजर व्यापार, रक्षा सहयोग और फिल्म उद्योग — ये सभी क्षेत्र दोनों देशों के बीच साझेदारी को नई ऊँचाई दे सकते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि ब्रिक्स और शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन (SCO) जैसे बहुपक्षीय मंचों पर भारत का समर्थन बेलारूस के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

नए व्यापार मार्ग और पश्चिमी दबाव

महावाणिज्य दूत मात्सुको ने कहा, "हाँ, इस मामले में भारत पश्चिमी देशों के दबाव का मुकाबला करने के लिए हमारे देश का बहुत समर्थन करता है और हम इस मामले में भारत सरकार के बहुत शुक्रगुजार हैं।" पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के चलते बेलारूस के यूरोपीय ट्रेड रूट काफी हद तक बंद हो चुके हैं। ऐसे में भारत के साथ कूटनीतिक और व्यापारिक संबंध मज़बूत करना मिन्स्क की प्राथमिकता बन गई है।

जॉइंट मैन्युफैक्चरिंग और 'मेक इन इंडिया' संरेखण

बेलारूस हेवी-ड्यूटी माइनिंग ट्रक और औद्योगिक मशीनरी निर्माण में विश्वस्तरीय विशेषज्ञता रखता है। मात्सुको ने कहा कि "भारत दुनिया का सबसे बड़ा देश है जिसका बाज़ार कभी खत्म नहीं होता। इसीलिए मेरा मानना है कि सबसे उम्मीद वाला क्षेत्र तकनीक के ट्रांसफर या जॉइंट वेंचर के मामले में कुछ ऐसा ही है।" यह रुख भारत की 'मेक इन इंडिया' नीति के साथ सीधे संरेखित है। दोनों देशों के रक्षा मंत्रालयों ने हाल ही में सैन्य-तकनीकी सहयोग के अंतरिम परिणामों पर चर्चा भी की है।

फर्टिलाइजर व्यापार और पेमेंट सिस्टम

बेलारूस पोटाश फर्टिलाइजर का एक प्रमुख वैश्विक उत्पादक है, जिसकी भारतीय कृषि क्षेत्र को नियमित ज़रूरत रहती है। वैश्विक पेमेंट व्यवस्था में व्यवधान के बीच दोनों सरकारें रुपया-रूबल जैसे प्रत्यक्ष भुगतान विकल्पों और शिपिंग व्यवस्था को सुचारु बनाने पर काम कर रही हैं। मात्सुको ने कहा कि दोनों सरकारें इस मुद्दे को सुलझाने में गहरी दिलचस्पी रखती हैं।

ब्रिक्स-SCO और बहुपक्षीय भागीदारी

मात्सुको ने बताया, "बेलारूस अब शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन का पूर्ण सदस्य है और ब्रिक्स में साझेदार देश है। ब्रिक्स की पूर्ण सदस्यता की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम है। अब हमारी प्राथमिकता है विदेश नीति में एशियाई देशों के साथ रहना।" उन्होंने दोनों संगठनों में बेलारूस की सदस्यता का समर्थन करने के भारत के रुख की सराहना की।

फिल्म उद्योग: सहयोग का अनोखा स्तंभ

दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक संबंधों की बात करें तो मात्सुको ने फिल्म उद्योग को सहयोग के सबसे ज़रूरी स्तंभों में से एक बताया। उन्होंने कहा कि बेलारूस को मुंबई इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल और इंडियन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल जैसे आयोजनों में आमंत्रित किया जाता है, जबकि भारतीय कंपनियाँ नवंबर में होने वाले मिन्स्क इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल 'लिस्टोपैड' में भाग लेती हैं। भारतीय फिल्मकार लोकेशन शूटिंग के लिए भी बेलारूस का रुख कर रहे हैं। आने वाले समय में दोनों देशों के बीच व्यापार और कूटनीतिक संबंधों को और मज़बूत करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाने की उम्मीद है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि पश्चिमी दबाव से उपजी व्यावहारिक मजबूरी है — और भारत इस स्थिति का रणनीतिक लाभ उठा सकता है। पोटाश फर्टिलाइजर पर भारत की निर्भरता और बेलारूस की भारी औद्योगिक मशीनरी की विशेषज्ञता — दोनों मिलकर एक पूरक साझेदारी का आधार बनते हैं। लेकिन रुपया-रूबल पेमेंट व्यवस्था की जटिलताएँ और पश्चिमी देशों के द्वितीयक प्रतिबंधों का जोखिम भारतीय कंपनियों के लिए असली बाधाएँ हैं, जिनका ज़िक्र इस बातचीत में नहीं हुआ। SCO और ब्रिक्स जैसे मंचों पर साझा उपस्थिति संरचनात्मक आधार देती है, पर व्यापार को वास्तव में बढ़ाने के लिए ठोस समझौतों और पारदर्शी क्रियान्वयन की दरकार होगी।
RashtraPress
9 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बेलारूस भारत के साथ नए व्यापार मार्ग क्यों तलाश रहा है?
पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के कारण बेलारूस के यूरोपीय व्यापार मार्ग बंद हो गए हैं, जिससे वह भारत जैसे बड़े बाज़ार के साथ नई व्यापारिक और कूटनीतिक साझेदारी बनाने की कोशिश कर रहा है। महावाणिज्य दूत मात्सुको के अनुसार, भारत इस दबाव से निपटने में बेलारूस का समर्थन करता है।
भारत-बेलारूस जॉइंट मैन्युफैक्चरिंग में कौन-से क्षेत्र शामिल हैं?
बेलारूस हेवी-ड्यूटी माइनिंग ट्रक और औद्योगिक मशीनरी निर्माण में विशेषज्ञता रखता है। दोनों देश तकनीक हस्तांतरण और जॉइंट वेंचर के माध्यम से इस क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की योजना बना रहे हैं, जो भारत की 'मेक इन इंडिया' नीति के अनुरूप है।
भारत और बेलारूस के बीच पेमेंट की समस्या कैसे सुलझाई जा रही है?
वैश्विक पेमेंट व्यवस्था में व्यवधान के बीच दोनों सरकारें रुपया-रूबल जैसे प्रत्यक्ष भुगतान विकल्पों पर काम कर रही हैं। महावाणिज्य दूत मात्सुको ने कहा कि दोनों सरकारें इस मुद्दे को सुलझाने में गहरी दिलचस्पी रखती हैं, हालाँकि विस्तृत ब्यौरा अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है।
ब्रिक्स और SCO में बेलारूस की क्या स्थिति है?
बेलारूस अब शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन (SCO) का पूर्ण सदस्य है और ब्रिक्स में साझेदार देश का दर्जा प्राप्त कर चुका है। मात्सुको ने बताया कि ब्रिक्स की पूर्ण सदस्यता उनका अगला लक्ष्य है और भारत के समर्थन की उन्होंने सराहना की।
भारत-बेलारूस के बीच फिल्म उद्योग में किस तरह का सहयोग है?
दोनों देश मुंबई इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल और मिन्स्क इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल 'लिस्टोपैड' जैसे आयोजनों में प्रतिनिधिमंडल भेजते हैं और फिल्मों की स्क्रीनिंग करते हैं। भारतीय फिल्मकार लोकेशन शूटिंग के लिए बेलारूस जाते हैं, और मात्सुको ने इसे दोनों देशों के बीच सहयोग के सबसे ज़रूरी स्तंभों में से एक बताया।
राष्ट्र प्रेस
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