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ब्रिक्स विस्तार और वैश्विक दक्षिण: भारत-चीन साझा मंच या रणनीतिक प्रतिस्पर्धा?

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ब्रिक्स विस्तार और वैश्विक दक्षिण: भारत-चीन साझा मंच या रणनीतिक प्रतिस्पर्धा?

सारांश

ब्रिक्स अब सिर्फ उभरती अर्थव्यवस्थाओं का क्लब नहीं — यह वैश्विक दक्षिण की नई आवाज़ बनने की कोशिश है। भारत और चीन दोनों इसे अपने-अपने तरीके से ढालना चाहते हैं। सवाल यह है कि क्या दो प्रतिस्पर्धी शक्तियाँ एक साझा मंच पर टिकाऊ सहयोग कर सकती हैं?

मुख्य बातें

ब्रिक्स का विस्तार हो रहा है — यह मंच अब सदस्य और साझेदार देशों के एक व्यापक गठबंधन में बदल चुका है।
चीन ब्रिक्स को बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के लिए औज़ार मानता है; भारत विकासशील देशों की आवाज़ और बहुपक्षीय सुधार को प्राथमिकता देता है।
जलवायु, ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और डिजिटल बुनियादी ढाँचे पर भारत-चीन के बीच साझा हित मौजूद हैं।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और तकनीकी सहयोग ब्रिक्स एजेंडे का नया आयाम बन रहा है।
सदस्य देशों के बीच विविध हित और भारत-चीन प्रतिस्पर्धा ब्रिक्स की सबसे बड़ी आंतरिक चुनौती है।

ब्रिक्स का विस्तार वैश्विक कूटनीति में एक निर्णायक मोड़ बनता जा रहा है — खासकर तब, जब भारत और चीन दोनों इस मंच को वैश्विक दक्षिण की आवाज़ मज़बूत करने के लिए उपयोग करने की कोशिश कर रहे हैं। बीजिंग से मिल रहे संकेत बताते हैं कि जहाँ दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय मतभेद बरकरार हैं, वहीं ब्रिक्स के साझा मंच पर सहयोग की संभावनाएँ भी उभर रही हैं।

मंच का बदलता स्वरूप

एक समय 'ब्रिक' के रूप में जाना जाने वाला यह समूह अब सदस्य और साझेदार देशों के एक व्यापक गठबंधन में तब्दील हो चुका है। यह विस्तार ऐसे दौर में हो रहा है जब विकासशील देश वैश्विक निर्णय-प्रक्रिया में कहीं अधिक प्रतिनिधित्व की माँग कर रहे हैं और पश्चिम-केंद्रित वित्तीय व राजनीतिक संस्थाओं पर सवाल उठाए जा रहे हैं। गौरतलब है कि शीत युद्ध के बाद यह पहला ऐसा दशक है जब वैश्विक दक्षिण के देश एकजुट होकर बहुपक्षीय संस्थाओं में संरचनात्मक सुधार की माँग कर रहे हैं।

भारत और चीन के दृष्टिकोण

चीन ब्रिक्स के विस्तार को बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था स्थापित करने और वैश्विक शासन में सुधार को आगे बढ़ाने के अवसर के रूप में देखता है। भारत भी बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार और विकासशील देशों की आवाज़ को मज़बूत बनाने पर बल देता है, हालाँकि उसकी प्राथमिकताएँ चीन से कुछ अलग हैं।

जलवायु परिवर्तन, खाद्य एवं ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक व्यापार और विकासशील देशों के प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के बीच उल्लेखनीय साझा हित मौजूद हैं। यह ऐसे समय में आया है जब दोनों देशों के बीच सीमा विवाद और व्यापारिक तनाव अभी भी पूरी तरह से सुलझे नहीं हैं।

तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता — सहयोग का नया क्षेत्र

तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) ब्रिक्स सहयोग का एक नया आयाम बन रहे हैं। चीन डिजिटल अर्थव्यवस्था, एआई और औद्योगिक नवाचार में अपनी क्षमताएँ साझा करने पर जोर दे रहा है। दूसरी ओर, भारत के पास डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढाँचे (जैसे UPI और आधार) और तकनीकी प्रतिभा का अनुभव है, जिसे वैश्विक दक्षिण के साथ साझा किया जा सकता है। विश्लेषकों के अनुसार, इन दोनों दृष्टिकोणों में पूरकता की संभावना ब्रिक्स के लिए नए अवसर खोल सकती है।

विविधता की चुनौती

ब्रिक्स की बढ़ती विविधता एक अंतर्निहित चुनौती भी है। सदस्य देशों के राजनीतिक और आर्थिक हित अलग-अलग हैं, और भारत-चीन के बीच कई क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। आलोचकों का कहना है कि बिना किसी बाध्यकारी तंत्र के, ब्रिक्स एक घोषणापत्र-केंद्रित मंच बनकर रह सकता है।

आगे क्या होगा

ब्रिक्स की वास्तविक ताकत इस बात पर निर्भर करेगी कि सदस्य देश — विशेषकर भारत और चीन — अपनी विविधताओं और मतभेदों को प्रबंधित करते हुए साझा हितों पर व्यावहारिक सहयोग कितना कर पाते हैं। आने वाले वर्षों में यह मंच वैश्विक दक्षिण की बढ़ती आकांक्षाओं और प्रमुख उभरती शक्तियों की बदलती भूमिका का परीक्षण स्थल बनेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

व्यापार असंतुलन और रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता के बावजूद 'साझा मंच' की वकालत करना चीन की एक सुविचारित कूटनीतिक रणनीति की तरह दिखता है। भारत के लिए ब्रिक्स में भागीदारी और चीनी नेतृत्व को स्वीकार करना दो अलग बातें हैं — यह अंतर भारतीय नीति-निर्माताओं को स्पष्ट रखना होगा। वैश्विक दक्षिण की असली ताकत तभी बनेगी जब भारत अपनी शर्तों पर इस मंच का उपयोग करे, न कि किसी और की कथा के सहयात्री के रूप में।
RashtraPress
14 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ब्रिक्स क्या है और इसका विस्तार क्यों हो रहा है?
ब्रिक्स मूलतः ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका का समूह था, जो अब नए सदस्य और साझेदार देशों के साथ विस्तारित हो चुका है। यह विस्तार इसलिए हो रहा है क्योंकि विकासशील देश वैश्विक निर्णय-प्रक्रिया में अधिक प्रतिनिधित्व चाहते हैं और पश्चिम-केंद्रित संस्थाओं के विकल्प तलाश रहे हैं।
भारत और चीन के ब्रिक्स को लेकर दृष्टिकोण में क्या अंतर है?
चीन ब्रिक्स को बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था और वैश्विक शासन सुधार के लिए उपकरण मानता है, जबकि भारत बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार और विकासशील देशों की आवाज़ को प्राथमिकता देता है। दोनों की प्राथमिकताएँ मिलती-जुलती होते हुए भी रणनीतिक रूप से अलग हैं।
ब्रिक्स में भारत-चीन सहयोग किन क्षेत्रों में संभव है?
जलवायु परिवर्तन, खाद्य एवं ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक व्यापार, तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) में दोनों देशों के बीच साझा हित हैं। भारत का डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढाँचे का अनुभव और चीन की AI क्षमताएँ मिलकर ब्रिक्स के लिए नए अवसर बना सकती हैं।
ब्रिक्स विस्तार की सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
सदस्य देशों के अलग-अलग राजनीतिक और आर्थिक हित तथा भारत-चीन के बीच कई क्षेत्रों में प्रत्यक्ष प्रतिस्पर्धा ब्रिक्स की सबसे बड़ी आंतरिक चुनौती है। आलोचकों का कहना है कि बिना किसी बाध्यकारी तंत्र के यह मंच घोषणापत्रों तक सीमित रह सकता है।
ब्रिक्स वैश्विक दक्षिण के लिए कितना प्रभावी मंच है?
ब्रिक्स वैश्विक दक्षिण को एक साझा आवाज़ देने की क्षमता रखता है, लेकिन इसकी प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर है कि सदस्य देश मतभेदों को प्रबंधित करते हुए साझा हितों पर कितना व्यावहारिक सहयोग कर पाते हैं। आने वाले वर्षों में यह तय होगा कि ब्रिक्स एक प्रभावशाली वैश्विक मंच बनता है या सिर्फ एक कूटनीतिक प्रतीक।
राष्ट्र प्रेस
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