18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन नई दिल्ली में संपन्न, ग्लोबल साउथ की एकता और भारत-चीन सहयोग पर जोर
सारांश
मुख्य बातें
18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 12 और 13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में आयोजित हुआ — ऐसे समय में जब यह बहुपक्षीय मंच अपनी स्थापना की 20वीं वर्षगांठ मना रहा है। इस सम्मेलन ने निष्पक्षता, न्याय और समावेशी विकास के लिए ग्लोबल साउथ की आकांक्षाओं को एक साझा मंच दिया, और यह परखा कि उभरती बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ एकजुटता के ज़रिए वैश्विक अनिश्चितताओं में स्थिरता का स्रोत बन सकती हैं या नहीं।
ब्रिक्स का विस्तार और आर्थिक वज़न
शुरुआत में मात्र चार सदस्य देशों वाला यह समूह अब 11 औपचारिक सदस्यों और 10 साझेदार देशों तक पहुँच चुका है। ब्रिक्स देशों में दुनिया की लगभग आधी आबादी निवास करती है, वैश्विक आर्थिक उत्पादन में इनकी हिस्सेदारी करीब 30 प्रतिशत है और वैश्विक व्यापार का पाँचवाँ हिस्सा इन्हीं देशों से होकर गुज़रता है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के अनुमान के अनुसार वर्ष 2028 तक 'ग्रेटर ब्रिक्स' की आर्थिक विकास दर जी7 की तुलना में तीन गुना हो जाएगी।
गौरतलब है कि वर्ष 2026 में नई औद्योगिक क्रांति में साझेदारी पर ब्रिक्स फोरम के तहत 11 शहरों ने साझेदार शहरों का नेटवर्क बनाना शुरू किया है, जिससे सहयोग का दायरा राष्ट्रीय स्तर से शहर-स्तर तक विस्तृत हुआ है। इस वर्ष की पहली तिमाही तक नव विकास बैंक (NDB) ने कुल 42.9 अरब डॉलर की 140 निवेश परियोजनाओं को स्वीकृति दे दी है।
भारत-चीन संबंधों की अहम भूमिका
ब्रिक्स सहयोग में भारत और चीन की केंद्रीय भूमिका इस साल और अगले साल क्रमशः दोनों देशों की अध्यक्षता के रूप में और भी स्पष्ट हो गई है। दोनों देशों के नेताओं ने रणनीतिक सहमति बनाई है कि वे एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि साझेदार हैं और एक-दूसरे के विकास के लिए खतरा नहीं, बल्कि अवसर हैं।
यह ऐसे समय में आया है जब द्विपक्षीय संबंधों में ठोस सुधार भी दर्ज हुए हैं। वर्ष 2025 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 1 खरब 55 अरब 60 करोड़ डॉलर रहा। इसके अलावा दोनों पक्षों ने पाँच सीधी उड़ानें फिर से शुरू कीं और छह साल के अंतराल के बाद सीमा व्यापार बहाल किया। सुरक्षा मोर्चे पर, चीन-भारत सीमा विवाद पर विशेष प्रतिनिधियों की 25वीं बैठक में आठ-सूत्री सहमति बनी, जिसमें दोनों पक्षों ने सीमांत क्षेत्रों में शांति और स्थिरता बनाए रखने की प्रतिबद्धता दोहराई।
चुनौतियाँ और ब्रिक्स की विशिष्टता
हालाँकि, ग्लोबल साउथ के लिए एकजुटता का यह रास्ता चुनौतियों से मुक्त नहीं है। आंतरिक विकास का अंतर बढ़ रहा है, विदेशी तकनीक पर निर्भरता बनी हुई है और वैश्वीकरण-विरोधी सोच तथा एकपक्षवाद का दबाव भी मौजूद है। ब्रिक्स के विस्तार से समूह का प्रतिनिधित्व तो बढ़ा है, लेकिन आम सहमति तक पहुँचना भी अपेक्षाकृत जटिल हो गया है।
विशेषज्ञों के अनुसार ब्रिक्स की खासियत यही है कि यह 'रणनीतिक अलगाव के बिना रणनीतिक स्वायत्तता' का मंच है — यानी सभी मुद्दों पर एकमत होना अनिवार्य नहीं। इसी वजह से भारत अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी बनाए रख सकता है, जबकि सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात पश्चिमी देशों से गहरे आर्थिक संबंध रख सकते हैं।
ब्रिक्स का दीर्घकालिक उद्देश्य
ब्रिक्स मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को प्रतिस्थापित करने की कोशिश नहीं करता। बल्कि, समानांतर तंत्र बनाकर उभरती आर्थिक शक्तियों के लिए संस्थागत स्थान विस्तारित करना इसका मूल उद्देश्य है। आँकड़ों के अनुसार, चीन और भारत — दुनिया की दो सर्वाधिक आबादी वाली उभरती अर्थव्यवस्थाओं — के बीच सीमा, व्यापार और राजनयिक संबंधों में आया सुधार ग्लोबल साउथ की एकता का सबसे ठोस प्रमाण माना जा रहा है।
आगे देखें तो नई दिल्ली सम्मेलन के बाद ब्रिक्स की अगली अध्यक्षता चीन के पास जाएगी, जिससे यह देखना दिलचस्प होगा कि समूह अपने विस्तारित ढाँचे में एकता और गति दोनों कायम रख पाता है या नहीं।