18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन: 40% वैश्विक GDP और 21 देशों के साथ बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ा कदम
सारांश
मुख्य बातें
भारत की अध्यक्षता में नई दिल्ली में आयोजित 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन वैश्विक भू-राजनीति और अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हो रहा है। विदेश मामलों के विशेषज्ञ प्रोफेसर मानस बेहरा के अनुसार, 21 देशों (11 नियमित और 10 भागीदार) का प्रतिनिधित्व करने वाला यह मंच अब पश्चिमी एकाधिकार के बरक्स एक संतुलित और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की नींव रख रहा है। वैश्विक स्तर पर यह समूह दुनिया की 40 फीसदी GDP और लगभग 49 फीसदी आबादी का प्रतिनिधित्व करता है, जो मौजूदा भू-राजनीतिक तनावों के बीच अत्यंत प्रासंगिक है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा संकट के बीच सम्मेलन
यह शिखर सम्मेलन ऐसे समय में आयोजित हो रहा है जब रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में ईरान पर बढ़ते सैन्य तनावों के कारण वैश्विक एनर्जी सप्लाई चेन पूरी तरह बाधित हो चुकी है। अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल, गैस और आवश्यक पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में लगातार अस्थिरता देखी जा रही है। ऐसे संकट के दौर में ब्रिक्स की थीम 'लचीलापन, नवाचार और टिकाऊ अर्थव्यवस्था' रखी गई है। भारत इस मंच के माध्यम से शांति, कूटनीतिक संवाद और आपसी सहमति के जरिए वैश्विक समस्याओं के समाधान का स्पष्ट संदेश दे रहा है।
डॉलर के दबदबे को चुनौती और बहुध्रुवीय रोडमैप
सम्मेलन के सबसे प्रमुख एजेंडे पर प्रकाश डालते हुए प्रोफेसर मानस बेहरा ने बताया कि ब्रिक्स के सामने सबसे बड़ा लक्ष्य एकतरफा वैश्विक व्यवस्था के विकल्प के रूप में बहुध्रुवीय रोडमैप तैयार करना है। अमेरिकी प्रतिबंधों की नीतियों के चलते मौजूदा वैश्विक व्यवस्था की स्थिरता पर सवाल उठे हैं। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अमेरिकी डॉलर की निर्भरता को कम करने पर ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। सदस्य देश अब आपसी लेन-देन अपनी स्थानीय मुद्राओं में करने पर ज़ोर दे रहे हैं, जो सीधे तौर पर डॉलर के वित्तीय वर्चस्व के लिए एक बड़ी चुनौती है, भले ही इसे पूरी तरह समाप्त होने में लंबा वक्त लगे।
भारत-रूस रक्षा साझेदारी और $100 अरब का व्यापार लक्ष्य
सम्मेलन के इतर द्विपक्षीय वार्ताओं का दौर भी बेहद अहम रहा है। भारत और रूस के बीच संबंधों को नया विस्तार देते हुए वर्ष 2030 तक $100 अरब (लगभग ₹8.3 लाख करोड़) के द्विपक्षीय व्यापार का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया गया है। भारत अपनी कुल ऊर्जा ज़रूरतों का लगभग 43 प्रतिशत कच्चा तेल रूस से आयात कर रहा है। इसके अलावा रक्षा क्षेत्र में S-400 और उन्नत S-500 वायु रक्षा प्रणालियों, ब्रह्मोस मिसाइल के अपग्रेडेशन और अत्याधुनिक पांचवीं पीढ़ी के Su-57 लड़ाकू विमानों की खरीद को लेकर रणनीतिक बातचीत चल रही है। इसके साथ ही इस्पात, अंतरिक्ष, रेलवे, उर्वरक और कृषि क्षेत्रों में भी सहयोग को बढ़ाया जा रहा है।
चीन और ईरान के साथ कूटनीतिक संतुलन
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन के साथ बैठक कर यह स्पष्ट संकेत दिया है कि अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद भारत अपने पारंपरिक साझेदारों के साथ संबंध प्रगाढ़ रखेगा। वहीं चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारतीय यात्रा और उनके उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल—जिसमें चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो सदस्य, विदेश मंत्री और वाणिज्य मंत्री शामिल हैं—की मौजूदगी दोनों देशों के बीच सीमा गतिरोध और व्यापारिक असंतुलन के बीच संवाद बहाली का सकारात्मक संकेत मानी जा रही है।