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18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन पर पूर्व राजदूत महेश सचदेव: भारत बन सकता है पूर्व और पश्चिम के बीच सेतु

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18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन पर पूर्व राजदूत महेश सचदेव: भारत बन सकता है पूर्व और पश्चिम के बीच सेतु

सारांश

पूर्व राजदूत महेश सचदेव का मानना है कि 18वाँ ब्रिक्स शिखर सम्मेलन भारत के लिए महज़ एक मेज़बानी नहीं — यह वैश्विक ध्रुवीकरण के दौर में संतुलन साधने का दुर्लभ कूटनीतिक अवसर है। यूक्रेन युद्ध, व्यापारिक प्रतिबंधों और डी-डॉलराइज़ेशन की बहस के बीच भारत पूर्व और पश्चिम के बीच सेतु बन सकता है।

मुख्य बातें

पूर्व राजदूत महेश सचदेव ने 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था को मज़बूत करने का महत्वपूर्ण अवसर बताया।
यह चौथा अवसर है जब भारत ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेज़बानी कर रहा है।
यूक्रेन-रूस युद्ध और अमेरिका-ईरान टकराव के कारण खाद्य, तेल, गैस और उर्वरक कीमतों पर दबाव बढ़ा है।
न्यू डेवलपमेंट बैंक और CRA जैसी ब्रिक्स संस्थागत पहलों ने पश्चिम में डी-डॉलराइज़ेशन को लेकर आशंकाएँ बढ़ाई हैं।
सचदेव के अनुसार, भारत की तटस्थ स्थिति उसे ब्रिक्स और पश्चिम के बीच प्रभावी मध्यस्थ बना सकती है।
उन्होंने उम्मीद जताई कि भारत सम्मेलन को संवाद और व्यावहारिक समाधान की दिशा में उपयोग करेगा।

पूर्व राजदूत महेश सचदेव ने 8 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में कहा कि भारत में आयोजित होने वाला 18वाँ ब्रिक्स शिखर सम्मेलन उभरती अर्थव्यवस्थाओं को बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था को सुदृढ़ करने का एक दुर्लभ अवसर प्रदान करता है। उनके अनुसार, यूक्रेन-रूस युद्ध, अमेरिका-ईरान टकराव, व्यापारिक प्रतिबंध और आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधान जैसी वैश्विक चुनौतियों के बीच ब्रिक्स देशों का एकजुट होना समाधान की दिशा में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।

भारत की मेज़बानी का महत्व

सचदेव ने बताया कि यह चौथा अवसर है जब भारत ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेज़बानी कर रहा है। उनके अनुसार, मौजूदा अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों ने इस सम्मेलन की प्रासंगिकता को पहले से कहीं अधिक बढ़ा दिया है। उन्होंने कहा कि यूक्रेन-रूस और अमेरिका-ईरान संघर्षों का असर केवल संबंधित देशों तक नहीं रहा — खाद्य पदार्थों, तेल, गैस और उर्वरकों की कीमतों पर दबाव और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं का बाधित होना इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।

वैश्विक चुनौतियाँ और ब्रिक्स की भूमिका

सचदेव ने कहा कि इन युद्धों को समाप्त करने के अब तक के प्रयास अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर पाए हैं, क्योंकि संबंधित पक्ष किसी सर्वस्वीकार्य समाधान पर सहमत नहीं हो सके। उन्होंने अमेरिकी प्रतिबंधों और व्यापारिक नीतियों से उपजे आर्थिक व्यवधान का भी उल्लेख किया, जिसने वैश्विक मंदी की आशंका को और प्रबल किया है। उनके अनुसार, ब्रिक्स सम्मेलन बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं को आर्थिक सहयोग और रणनीतिक चुनौतियों पर एक साझा मंच पर विचार-विमर्श का अवसर देता है।

पश्चिमी देशों की आशंकाएँ

पूर्व राजदूत ने स्वीकार किया कि पश्चिमी देश ब्रिक्स को कुछ हद तक संदेह की दृष्टि से देखते हैं। पश्चिम में यह धारणा है कि संगठन पर चीन और रूस का प्रभाव अधिक है और इसकी दिशा पश्चिमी हितों के विरुद्ध जा सकती है। उन्होंने न्यू डेवलपमेंट बैंक और कंटिजेंसी रिज़र्व अरेंजमेंट (CRA) जैसी संस्थागत पहलों का उल्लेख करते हुए कहा कि डी-डॉलराइज़ेशन की चर्चा ने पश्चिमी देशों में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्थापित वैश्विक वित्तीय ढाँचे को चुनौती मिलने की आशंका पैदा की है।

भारत की कूटनीतिक भूमिका

सचदेव के अनुसार, भारत न तो ब्रिक्स के भीतर पश्चिम-विरोधी रुख का समर्थक है और न ही पश्चिमी देशों के किसी गुट का हिस्सा — यही तटस्थ स्थिति भारत को एक प्रभावी मध्यस्थ की भूमिका देती है। उन्होंने कहा कि भारत ब्रिक्स के भीतर आने वाले प्रस्तावों और संयुक्त घोषणाओं को संतुलित एवं व्यावहारिक दिशा देने का प्रयास कर सकता है, ताकि उनका रुख किसी एक ध्रुव के पक्ष या विरोध में जाने के बजाय समाधान की ओर हो।

आगे की राह

पूर्व राजदूत ने उम्मीद जताई कि भारत अपनी मेज़बानी के ज़रिए ऐसे प्रस्तावों को आगे बढ़ाएगा जो टकराव की बजाय संवाद और व्यावहारिक समाधान को प्रोत्साहित करें। उनके अनुसार, ब्रिक्स उभरती अर्थव्यवस्थाओं को वैश्विक निर्णय-प्रक्रिया में अधिक प्रभावी भागीदारी दिलाने वाला मंच बन सकता है — बशर्ते कि इस सम्मेलन को महज़ एक औपचारिक बैठक तक सीमित न रखा जाए।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन व्यवहार में यह तब परखी जाएगी जब संयुक्त घोषणापत्र में रूस या चीन के पक्ष में झुके किसी प्रस्ताव पर भारत को स्पष्ट रुख लेना होगा। गौरतलब है कि 2023 के जोहान्सबर्ग सम्मेलन में भी भारत ने संतुलन साधने की कोशिश की थी, पर कुछ घोषणाओं की भाषा पर असहमति सार्वजनिक हुई थी। बिना किसी बाध्यकारी तंत्र के, 'संतुलित समाधान' की अपील राजनयिक शिष्टाचार से आगे न जाए — यह जोखिम बना रहेगा।
RashtraPress
26 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

18वाँ ब्रिक्स शिखर सम्मेलन कहाँ और कब हो रहा है?
18वाँ ब्रिक्स शिखर सम्मेलन भारत में आयोजित हो रहा है। यह चौथा अवसर है जब भारत इस शिखर सम्मेलन की मेज़बानी कर रहा है, और पूर्व राजदूत महेश सचदेव के अनुसार मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों ने इसके महत्व को और बढ़ा दिया है।
पूर्व राजदूत महेश सचदेव ने ब्रिक्स सम्मेलन को क्यों महत्वपूर्ण बताया?
सचदेव के अनुसार, यूक्रेन-रूस युद्ध, अमेरिका-ईरान टकराव, व्यापारिक प्रतिबंध और आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधान जैसी चुनौतियों के बीच ब्रिक्स उभरती अर्थव्यवस्थाओं को एक साझा मंच पर आर्थिक और रणनीतिक समाधान तलाशने का अवसर देता है। उन्होंने इसे बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था को मज़बूत करने का दुर्लभ मौका बताया।
ब्रिक्स को लेकर पश्चिमी देशों की क्या आशंकाएँ हैं?
पश्चिमी देशों में यह धारणा है कि ब्रिक्स पर चीन और रूस का प्रभाव अधिक है और संगठन की दिशा उनके हितों के विरुद्ध जा सकती है। न्यू डेवलपमेंट बैंक और CRA जैसी पहलों तथा डी-डॉलराइज़ेशन की बहस ने यह आशंका और गहरी की है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्थापित वैश्विक वित्तीय ढाँचे को चुनौती मिल सकती है।
ब्रिक्स में भारत की क्या विशेष भूमिका हो सकती है?
सचदेव के अनुसार, भारत न तो ब्रिक्स के भीतर पश्चिम-विरोधी रुख का समर्थक है और न ही पश्चिमी गुट का हिस्सा — यह तटस्थ स्थिति उसे दोनों पक्षों के बीच प्रभावी मध्यस्थ बनाती है। भारत संयुक्त घोषणाओं को संतुलित और व्यावहारिक दिशा देने में अहम भूमिका निभा सकता है।
ब्रिक्स सम्मेलन में किन प्रमुख मुद्दों पर चर्चा होने की उम्मीद है?
पूर्व राजदूत सचदेव के अनुसार, यूक्रेन-रूस युद्ध, अमेरिका-ईरान संघर्ष और वैश्विक टैरिफ विवाद जैसे मुद्दे सम्मेलन के केंद्र में रह सकते हैं। इसके अलावा आर्थिक सहयोग, आपूर्ति श्रृंखलाओं की स्थिरता और वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में सुधार पर भी चर्चा अपेक्षित है।
राष्ट्र प्रेस
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