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ब्रिक्स विदेश मंत्री बैठक में ईरान-यूएई के बीच मतभेद, भारत ने संवाद और कूटनीति पर दिया जोर

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ब्रिक्स विदेश मंत्री बैठक में ईरान-यूएई के बीच मतभेद, भारत ने संवाद और कूटनीति पर दिया जोर

सारांश

नई दिल्ली में ब्रिक्स विदेश मंत्री बैठक में ईरान-यूएई के बीच खुले मतभेद ने समूह की एकजुटता पर सवाल खड़े किए। भारत ने संवाद और कूटनीति की राह थामे रखी, लेकिन सितंबर शिखर सम्मेलन में सर्वसम्मति वाले दस्तावेज की संभावना अनिश्चित बनी हुई है।

मुख्य बातें

नई दिल्ली में 24 मई 2026 को आयोजित ब्रिक्स विदेश मंत्री बैठक में ईरान और यूएई के बीच खुले मतभेद सामने आए।
पूर्व राजनयिक अनिल त्रिगुणायत के अनुसार, सहमति की कमी ब्रिक्स के लिए आगे बड़ी चुनौतियों का संकेत है।
प्रधानमंत्री मोदी और विदेश मंत्री जयशंकर ने पश्चिम एशिया में रह रहे भारत के लगभग एक करोड़ प्रवासियों के हितों की रक्षा के लिए व्यापक कूटनीतिक संपर्क बनाए रखा।
भारत की अध्यक्षता की थीम 'बिल्डिंग फॉर रेजिलिएंस, इनोवेशन, कोऑपरेशन एंड सस्टेनेबिलिटी' है।
सितंबर 2026 के ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में सर्वसम्मति आधारित संयुक्त दस्तावेज की संभावना पर अनिश्चितता बनी हुई है।

नई दिल्ली में 24 मई 2026 को आयोजित ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में समूह के भीतर आंतरिक मतभेद खुलकर सामने आए — खासतौर पर ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बीच — जब अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते टकराव की पृष्ठभूमि में यह बैठक हुई। भारत ने इस पूरे घटनाक्रम में संवाद, कूटनीति और तनाव में कमी की अपनी परंपरागत नीति को दोहराया।

बैठक में क्या हुआ

पश्चिम एशिया मामलों के जानकार और पूर्व भारतीय राजनयिक अनिल त्रिगुणायत ने अपने विश्लेषण में कहा कि बैठक में सहमति की कमी यह संकेत देती है कि यदि पश्चिम एशिया में जारी तनाव जल्द नहीं थमा, तो ब्रिक्स को आगे और बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि हालांकि ब्रिक्स मुख्यतः भू-आर्थिक सहयोग पर केंद्रित है, लेकिन भू-राजनीतिक विभाजन और महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा उसके गैर-टकराव वाले स्वरूप को प्रभावित करती है।

भारत की कूटनीतिक स्थिति

त्रिगुणायत के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने क्षेत्र तथा दुनिया के विभिन्न नेताओं के साथ व्यापक बातचीत की, ताकि तनाव कम किया जा सके और पश्चिम एशिया में रह रहे भारत के लगभग एक करोड़ प्रवासियों के हितों की रक्षा सुनिश्चित की जा सके। भारत लगातार यह स्पष्ट करता रहा है कि गैर-पश्चिमी होने का अर्थ पश्चिम-विरोधी नहीं है।

विदेश मंत्री जयशंकर ने ब्रिक्स के प्रति भारत की प्रतिबद्धता दोहराते हुए कहा, 'भारत आपसी समझ, एकजुटता, खुलेपन, समावेशिता, पूर्ण परामर्श और सहमति के सिद्धांतों के अनुरूप ब्रिक्स को मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है।'

भारत की अध्यक्षता और थीम

भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के तहत 'बिल्डिंग फॉर रेजिलिएंस, इनोवेशन, कोऑपरेशन एंड सस्टेनेबिलिटी' थीम को अपनाया गया है। त्रिगुणायत के अनुसार यह थीम उस दिशा का प्रतीक है, जिस ओर तेजी से बंटती वैश्विक व्यवस्था में एक गैर-पश्चिमी मंच के रूप में ब्रिक्स आगे बढ़ सकता है। सितंबर 2026 में भारत ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की अध्यक्षता करेगा।

शिखर सम्मेलन पर अनिश्चितता

अमेरिका-ईरान-इजरायल संघर्ष के कारण सर्वसम्मति आधारित संयुक्त दस्तावेज तैयार होने की संभावना पर अनिश्चितता छा गई है। त्रिगुणायत ने यह भी कहा कि जब बड़ी शक्तियाँ अंतरराष्ट्रीय कानून और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी व्यवस्थाओं से दूर होती जा रही हैं, तब वैश्विक सहभागिता के वैकल्पिक ढाँचे और मॉडल की तलाश तेज हो गई है।

ब्रिक्स का व्यापक एजेंडा

पूर्व राजनयिक ने जोर देकर कहा कि ब्रिक्स केवल मौजूदा संघर्ष तक सीमित नहीं है। यह समूह आर्थिक सहयोग, आतंकवाद-रोधी प्रयासों, जलवायु कार्रवाई, व्यापार, प्रौद्योगिकी, कनेक्टिविटी और सतत विकास जैसे व्यापक एजेंडे पर काम कर रहा है। उनके अनुसार, 'समानता, न्याय और संतुलन' के सिद्धांत अब ब्रिक्स और भारत की कूटनीतिक प्राथमिकताओं की पहचान बनते जा रहे हैं और ग्लोबल साउथ के देशों के बीच तेजी से प्रासंगिक हो रहे हैं। सितंबर के शिखर सम्मेलन से पहले भारत की अध्यक्षता इस मंच को नई दिशा देने की कोशिश में जुटी है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन जब सदस्य देश आपस में ही सहमत नहीं हो पाते, तो सितंबर शिखर सम्मेलन का संयुक्त दस्तावेज महज एक औपचारिकता बनकर रह सकता है। असली परीक्षा यह है कि भारत की अध्यक्षता ग्लोबल साउथ की आवाज़ को ठोस नीतिगत प्रतिबद्धताओं में बदल पाती है या केवल घोषणाओं तक सीमित रहती है।
RashtraPress
9 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ब्रिक्स विदेश मंत्री बैठक में ईरान और यूएई के बीच मतभेद क्यों उभरे?
अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष की पृष्ठभूमि में दोनों देशों के हित और दृष्टिकोण अलग-अलग हैं, जिससे ब्रिक्स जैसे मंच पर सहमति बनाना कठिन हो गया। पूर्व राजनयिक अनिल त्रिगुणायत के अनुसार यह सहमति की कमी समूह के लिए आगे बड़ी चुनौतियों का संकेत है।
ब्रिक्स में भारत की अध्यक्षता की थीम क्या है?
'बिल्डिंग फॉर रेजिलिएंस, इनोवेशन, कोऑपरेशन एंड सस्टेनेबिलिटी' भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता की थीम है। यह तेजी से बंटती वैश्विक व्यवस्था में एक गैर-पश्चिमी मंच के रूप में ब्रिक्स की दिशा को परिभाषित करती है।
सितंबर 2026 के ब्रिक्स शिखर सम्मेलन पर अनिश्चितता क्यों है?
अमेरिका-ईरान-इजरायल संघर्ष के कारण सदस्य देशों के बीच सर्वसम्मति बनाना कठिन हो गया है, जिससे संयुक्त दस्तावेज तैयार होने की संभावना पर सवाल उठ रहे हैं। त्रिगुणायत के अनुसार यह स्थिति ब्रिक्स के गैर-टकराव वाले स्वरूप को प्रभावित कर रही है।
पश्चिम एशिया संकट में भारत के प्रवासियों पर क्या असर है?
पश्चिम एशिया में भारत के लगभग एक करोड़ प्रवासी रहते हैं, जिनके हितों की रक्षा भारत की कूटनीतिक प्राथमिकता है। प्रधानमंत्री मोदी और विदेश मंत्री जयशंकर ने इसी उद्देश्य से क्षेत्र के विभिन्न नेताओं के साथ व्यापक बातचीत की है।
ब्रिक्स का व्यापक एजेंडा क्या है और यह केवल संघर्ष तक सीमित क्यों नहीं है?
ब्रिक्स आर्थिक सहयोग, आतंकवाद-रोधी प्रयासों, जलवायु कार्रवाई, व्यापार, प्रौद्योगिकी, कनेक्टिविटी और सतत विकास जैसे व्यापक एजेंडे पर काम कर रहा है। त्रिगुणायत के अनुसार, समानता, न्याय और संतुलन के सिद्धांत ग्लोबल साउथ के देशों के बीच तेजी से प्रासंगिक हो रहे हैं।
राष्ट्र प्रेस
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