चीनी पनडुब्बी से परमाणु-सक्षम मिसाइल परीक्षण, ईरान युद्ध में उलझे अमेरिका की नज़र चूकी
सारांश
मुख्य बातें
चीन ने हाल ही में एक परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम मिसाइल का परीक्षण अपनी पनडुब्बी से किया, लेकिन यह घटना उतनी वैश्विक चर्चा नहीं बटोर सकी जितनी अपेक्षित थी। एशिया मीडिया सेंटर की एक रिपोर्ट के अनुसार, इसकी प्रमुख वजह यह रही कि अमेरिका उस समय पश्चिम एशिया में ईरान के साथ जारी सैन्य संघर्ष में पूरी तरह उलझा हुआ था, जिससे इस रणनीतिक घटनाक्रम पर अपेक्षित निगरानी और कूटनीतिक प्रतिक्रिया संभव नहीं हो सकी।
परीक्षण का संदर्भ और समय
रिपोर्ट में कहा गया है कि फरवरी 2026 के अंत से अमेरिका ईरान के साथ सीधे सैन्य टकराव में है। चीन के इस मिसाइल परीक्षण वाले सप्ताह में यह संघर्ष और अधिक तीव्र हो गया, जब वॉशिंगटन ने होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों पर हुए हमलों के जवाब में ईरान के दर्जनों ठिकानों पर हमले किए। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कई महीनों से अमेरिका का ध्यान, उसकी सैन्य क्षमता और कूटनीतिक संसाधन खाड़ी क्षेत्र में केंद्रित रहे हैं।
बीजिंग का आधिकारिक पक्ष यह है कि यह परीक्षण उसके वार्षिक सैन्य प्रशिक्षण कार्यक्रम का हिस्सा था। रिपोर्ट की लेखिका दिव्या मल्होत्रा के अनुसार, केवल इसी आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि चीन ने अमेरिकी व्यस्तता का मौका देखकर जानबूझकर यह परीक्षण किया।
एशिया की राजधानियों में बढ़ी सतर्कता
मल्होत्रा ने लिखा कि यह परीक्षण ऐसे समय हुआ जब चीन के परमाणु संकेतों का गंभीर जवाब देने में सक्षम सबसे बड़ी शक्ति — अमेरिका — पूरी तरह दूसरे मोर्चे पर व्यस्त थी। उनके अनुसार, टोक्यो, कैनबरा और नई दिल्ली में रणनीतिक मामलों पर नज़र रखने वाले विश्लेषकों ने इस संयोग पर अवश्य ध्यान दिया होगा।
दक्षिण प्रशांत क्षेत्र में परमाणु अस्थिरता की चिंता
रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण प्रशांत परमाणु-मुक्त क्षेत्र के भीतर किसी मिसाइल का गिरना सबसे पहले न्यूज़ीलैंड के अपने रणनीतिक पड़ोस का मामला है। मल्होत्रा ने रेखांकित किया कि इस परीक्षण से पहले भी इस पूरे क्षेत्र में बढ़ती परमाणु अस्थिरता चिंता का विषय बनी हुई थी।
यह घटना अकेली नहीं है। रिपोर्ट में सितंबर 2024 में चीन द्वारा प्रशांत महासागर में किए गए अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) परीक्षण का भी उल्लेख किया गया है — जो 44 वर्षों में पहली बार अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में किया गया ऐसा परीक्षण था। इसके बाद दिसंबर 2024 में ज़मीन में बने साइलो-आधारित ICBM परीक्षण भी किए गए।
चीन की परमाणु रणनीति में बड़ा बदलाव
रिपोर्ट में कहा गया है कि इन सभी घटनाओं से स्पष्ट होता है कि चीन अब केवल सीमित और गुप्त परमाणु क्षमता रखने वाले देश की भूमिका में नहीं रह गया। वह अपना परमाणु भंडार बढ़ा रहा है, उसे अधिक सुदृढ़ बना रहा है, और अब उसे खुले तौर पर प्रदर्शित करने में भी पहले से अधिक सहज दिखता है।
मल्होत्रा के अनुसार, यदि चीन के तेज़ी से विस्तार पा रहे पनडुब्बी बेड़े को भी इस संदर्भ में देखा जाए, तो यह परीक्षण महज़ एकबारगी ताकत प्रदर्शन नहीं लगता। बल्कि यह समुद्र में परमाणु हथियारों से लैस पनडुब्बियों की निरंतर तैनाती की दिशा में एक सुनियोजित कदम प्रतीत होता है — एक क्षमता जो अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन के पास वर्षों से मौजूद है। आने वाले समय में यह प्रश्न और अधिक प्रासंगिक होता जाएगा कि क्या इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की शक्तियाँ इस बदलती परमाणु वास्तविकता के लिए पर्याप्त रूप से तैयार हैं।