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चीनी पनडुब्बी से परमाणु-सक्षम मिसाइल परीक्षण, ईरान युद्ध में उलझे अमेरिका की नज़र चूकी

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चीनी पनडुब्बी से परमाणु-सक्षम मिसाइल परीक्षण, ईरान युद्ध में उलझे अमेरिका की नज़र चूकी

सारांश

अमेरिका जब ईरान से युद्ध में उलझा था, चीन ने पनडुब्बी से परमाणु-सक्षम मिसाइल दाग दी — और दुनिया की नज़र चूक गई। एशिया मीडिया सेंटर की रिपोर्ट कहती है कि यह महज़ संयोग हो या न हो, टोक्यो, कैनबरा और नई दिल्ली के रणनीतिकारों ने इस 'समय' को ज़रूर नोट किया होगा।

मुख्य बातें

चीन ने हाल ही में एक पनडुब्बी से परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम मिसाइल का परीक्षण किया, जो वैश्विक ध्यान से काफी हद तक बचा रहा।
एशिया मीडिया सेंटर की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका उस समय ईरान के साथ सीधे सैन्य संघर्ष में व्यस्त था और उसने होर्मुज जलडमरूमध्य के पास ईरान के दर्जनों ठिकानों पर हमले किए थे।
चीन का कहना है कि यह परीक्षण उसके वार्षिक सैन्य प्रशिक्षण कार्यक्रम का हिस्सा था।
सितंबर 2024 में चीन ने 44 वर्षों में पहली बार प्रशांत महासागर के अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में ICBM परीक्षण किया था; दिसंबर 2024 में साइलो-आधारित ICBM परीक्षण भी हुए।
रिपोर्ट में कहा गया कि चीन अब अपनी परमाणु क्षमता को खुले तौर पर प्रदर्शित करने की दिशा में बढ़ रहा है और समुद्री परमाणु गश्त की स्थायी तैनाती की ओर अग्रसर दिखता है।
नई दिल्ली , टोक्यो और कैनबरा के रणनीतिक विश्लेषकों ने इस परीक्षण के समय पर विशेष ध्यान दिया होगा — ऐसा रिपोर्ट में कहा गया है।

चीन ने हाल ही में एक परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम मिसाइल का परीक्षण अपनी पनडुब्बी से किया, लेकिन यह घटना उतनी वैश्विक चर्चा नहीं बटोर सकी जितनी अपेक्षित थी। एशिया मीडिया सेंटर की एक रिपोर्ट के अनुसार, इसकी प्रमुख वजह यह रही कि अमेरिका उस समय पश्चिम एशिया में ईरान के साथ जारी सैन्य संघर्ष में पूरी तरह उलझा हुआ था, जिससे इस रणनीतिक घटनाक्रम पर अपेक्षित निगरानी और कूटनीतिक प्रतिक्रिया संभव नहीं हो सकी।

परीक्षण का संदर्भ और समय

रिपोर्ट में कहा गया है कि फरवरी 2026 के अंत से अमेरिका ईरान के साथ सीधे सैन्य टकराव में है। चीन के इस मिसाइल परीक्षण वाले सप्ताह में यह संघर्ष और अधिक तीव्र हो गया, जब वॉशिंगटन ने होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों पर हुए हमलों के जवाब में ईरान के दर्जनों ठिकानों पर हमले किए। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कई महीनों से अमेरिका का ध्यान, उसकी सैन्य क्षमता और कूटनीतिक संसाधन खाड़ी क्षेत्र में केंद्रित रहे हैं।

बीजिंग का आधिकारिक पक्ष यह है कि यह परीक्षण उसके वार्षिक सैन्य प्रशिक्षण कार्यक्रम का हिस्सा था। रिपोर्ट की लेखिका दिव्या मल्होत्रा के अनुसार, केवल इसी आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि चीन ने अमेरिकी व्यस्तता का मौका देखकर जानबूझकर यह परीक्षण किया।

एशिया की राजधानियों में बढ़ी सतर्कता

मल्होत्रा ने लिखा कि यह परीक्षण ऐसे समय हुआ जब चीन के परमाणु संकेतों का गंभीर जवाब देने में सक्षम सबसे बड़ी शक्ति — अमेरिका — पूरी तरह दूसरे मोर्चे पर व्यस्त थी। उनके अनुसार, टोक्यो, कैनबरा और नई दिल्ली में रणनीतिक मामलों पर नज़र रखने वाले विश्लेषकों ने इस संयोग पर अवश्य ध्यान दिया होगा।

दक्षिण प्रशांत क्षेत्र में परमाणु अस्थिरता की चिंता

रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण प्रशांत परमाणु-मुक्त क्षेत्र के भीतर किसी मिसाइल का गिरना सबसे पहले न्यूज़ीलैंड के अपने रणनीतिक पड़ोस का मामला है। मल्होत्रा ने रेखांकित किया कि इस परीक्षण से पहले भी इस पूरे क्षेत्र में बढ़ती परमाणु अस्थिरता चिंता का विषय बनी हुई थी।

यह घटना अकेली नहीं है। रिपोर्ट में सितंबर 2024 में चीन द्वारा प्रशांत महासागर में किए गए अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) परीक्षण का भी उल्लेख किया गया है — जो 44 वर्षों में पहली बार अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में किया गया ऐसा परीक्षण था। इसके बाद दिसंबर 2024 में ज़मीन में बने साइलो-आधारित ICBM परीक्षण भी किए गए।

चीन की परमाणु रणनीति में बड़ा बदलाव

रिपोर्ट में कहा गया है कि इन सभी घटनाओं से स्पष्ट होता है कि चीन अब केवल सीमित और गुप्त परमाणु क्षमता रखने वाले देश की भूमिका में नहीं रह गया। वह अपना परमाणु भंडार बढ़ा रहा है, उसे अधिक सुदृढ़ बना रहा है, और अब उसे खुले तौर पर प्रदर्शित करने में भी पहले से अधिक सहज दिखता है।

मल्होत्रा के अनुसार, यदि चीन के तेज़ी से विस्तार पा रहे पनडुब्बी बेड़े को भी इस संदर्भ में देखा जाए, तो यह परीक्षण महज़ एकबारगी ताकत प्रदर्शन नहीं लगता। बल्कि यह समुद्र में परमाणु हथियारों से लैस पनडुब्बियों की निरंतर तैनाती की दिशा में एक सुनियोजित कदम प्रतीत होता है — एक क्षमता जो अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन के पास वर्षों से मौजूद है। आने वाले समय में यह प्रश्न और अधिक प्रासंगिक होता जाएगा कि क्या इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की शक्तियाँ इस बदलती परमाणु वास्तविकता के लिए पर्याप्त रूप से तैयार हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

न कि छिटपुट रूप से। नई दिल्ली के लिए यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि चीन-पाकिस्तान परमाणु धुरी के बीच भारत की रणनीतिक स्थिति और जटिल होती जा रही है। मुख्यधारा की कवरेज जो बात चूक जाती है, वह यह है कि असली ख़तरा किसी एक परीक्षण में नहीं, बल्कि उस सामान्यीकरण में है जो इन परीक्षणों की श्रृंखला से बन रही है।
RashtraPress
20 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

चीन ने पनडुब्बी से परमाणु-सक्षम मिसाइल का परीक्षण कब और क्यों किया?
चीन ने हाल ही में एक पनडुब्बी से परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम मिसाइल का परीक्षण किया। बीजिंग के अनुसार यह उसके वार्षिक सैन्य प्रशिक्षण कार्यक्रम का हिस्सा था, हालांकि एशिया मीडिया सेंटर की रिपोर्ट में इसके समय पर गहरी जाँच की माँग की गई है।
इस परीक्षण पर अमेरिका की प्रतिक्रिया क्यों सीमित रही?
एशिया मीडिया सेंटर की रिपोर्ट के अनुसार, उस समय अमेरिका ईरान के साथ सीधे सैन्य संघर्ष में था और होर्मुज जलडमरूमध्य के पास ईरान के दर्जनों ठिकानों पर हमले कर रहा था। इस कारण अमेरिका का ध्यान, सैन्य क्षमता और कूटनीतिक संसाधन खाड़ी क्षेत्र में केंद्रित थे।
चीन ने इससे पहले कौन-से परमाणु परीक्षण किए हैं?
सितंबर 2024 में चीन ने 44 वर्षों में पहली बार प्रशांत महासागर के अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में ICBM परीक्षण किया था। इसके बाद दिसंबर 2024 में ज़मीन में बने साइलो-आधारित ICBM परीक्षण भी किए गए।
दक्षिण प्रशांत क्षेत्र के लिए यह परीक्षण क्यों चिंताजनक है?
दक्षिण प्रशांत परमाणु-मुक्त क्षेत्र के भीतर मिसाइल गिरना न्यूज़ीलैंड सहित क्षेत्रीय देशों के रणनीतिक पड़ोस का सीधा मामला है। रिपोर्ट के अनुसार, इस परीक्षण से पहले भी इस क्षेत्र में परमाणु अस्थिरता बढ़ रही थी।
क्या चीन की परमाणु रणनीति में कोई बड़ा बदलाव आया है?
एशिया मीडिया सेंटर की रिपोर्ट के अनुसार, चीन अब केवल सीमित और गुप्त परमाणु क्षमता रखने तक सीमित नहीं रहा। वह अपना परमाणु भंडार बढ़ा रहा है और उसे खुले तौर पर प्रदर्शित करने में पहले से अधिक सहज दिखता है। तेज़ी से बढ़ता पनडुब्बी बेड़ा समुद्री परमाणु गश्त की स्थायी तैनाती की ओर संकेत करता है।
राष्ट्र प्रेस
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