दलाई लामा उत्तराधिकार पर चीन की 'वेटिंग गेम' रणनीति, तिब्बत में बढ़ सकता है विरोध
सारांश
मुख्य बातें
14वें दलाई लामा के उत्तराधिकार को लेकर बीजिंग एक सुनियोजित 'इंतजार की नीति' अपना रहा है — जिसके तहत वह भविष्य में अगले दलाई लामा की नियुक्ति पर नियंत्रण स्थापित कर तिब्बत मुद्दे को कमज़ोर करने की कोशिश करेगा। 'द तिब्बत एक्सप्रेस' में प्रकाशित एक लेख में यह चेतावनी दी गई है कि यह रणनीति उल्टी पड़ सकती है — तिब्बती लोगों में आक्रोश बढ़ सकता है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तिब्बत के प्रति समर्थन और मज़बूत हो सकता है।
बीजिंग की 'वेटिंग गेम' रणनीति क्या है
14वें दलाई लामा के भतीजे खेद्रूब थोंडुप ने अपने लेख में लिखा कि बीजिंग ने लगातार दलाई लामा के साथ बातचीत करने से इनकार किया है। उन्होंने स्पष्ट किया, 'बीजिंग का यह रुख कोई रणनीतिक दुविधा नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति है — चीनी नेतृत्व जानबूझकर टालने की नीति अपना रहा है।' उनके अनुसार, चीन को उम्मीद है कि दलाई लामा के बाद वह उत्तराधिकार को नियंत्रित कर तिब्बत के मुद्दे को बेअसर कर देगा।
थोंडुप के अनुसार यह नीति तीन धारणाओं पर टिकी है: पहला — दलाई लामा के बिना निर्वासन में रह रहा तिब्बती समुदाय बिखर जाएगा; दूसरा — सरकार द्वारा नियुक्त दलाई लामा से निर्वासित समुदाय के उत्तराधिकारी की वैधता खत्म हो जाएगी; और तीसरा — उनके निधन के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय की रुचि घट जाएगी।
बीजिंग बातचीत से क्यों कतराता है
थोंडुप ने विश्लेषण किया कि बीजिंग इसलिए बातचीत से बचता है क्योंकि उसे डर है कि ऐसा करने से दलाई लामा को राजनीतिक वैधता मिल जाएगी — जो उनके उस दावे के विपरीत होगा जिसमें वे दलाई लामा को 'अलगाववादी' करार देते हैं। इसके अलावा, चीनी अधिकारियों को यह भी आशंका है कि यदि तिब्बत को कोई रियायत दी गई, तो अन्य अल्पसंख्यक क्षेत्र भी अधिक स्वायत्तता की माँग कर सकते हैं।
यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब 14वें दलाई लामा की आयु को देखते हुए उत्तराधिकार का प्रश्न अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में केंद्रीय विषय बनता जा रहा है। गौरतलब है कि बीजिंग नियंत्रण वाली व्यवस्था के ज़रिए अगले दलाई लामा को नियुक्त करना चाहता है, ताकि धार्मिक मामलों पर अपने अधिकार के दावे को और मज़बूत कर सके।
धार्मिक वैधता पर खतरा
थोंडुप ने रेखांकित किया कि दुनिया भर के तिब्बती बौद्ध राज्य द्वारा नियुक्त दलाई लामा को स्वीकार करने से इनकार कर सकते हैं, जिससे बीजिंग का अधिकार और कमज़ोर पड़ जाएगा। उनका यह तर्क तिब्बती बौद्ध परंपरा की उस मूल मान्यता पर आधारित है, जिसके अनुसार दलाई लामा की पहचान आध्यात्मिक प्रक्रिया से होती है — किसी राजनीतिक नियुक्ति से नहीं।
रिपोर्ट में इस आदेश को तिब्बती बौद्ध धर्म के मूल मूल्यों की अनदेखी करार दिया गया है, जो तिब्बती समुदाय में गहरी नाराज़गी पैदा कर सकता है।
बीजिंग के लिए जोखिम और संभावित परिणाम
थोंडुप ने चेतावनी दी कि उत्तराधिकार से जुड़ा विवाद तिब्बत के लिए वैश्विक समर्थन को घटाने के बजाय और बढ़ा सकता है। जबरदस्ती थोपे गए कदमों से लोगों में नाराज़गी बढ़ेगी और तिब्बतियों को चीन से और दूर किया जाएगा। उन्होंने माना कि इस तरीके से शायद थोड़े समय के लिए नियंत्रण मिल जाए, लेकिन दीर्घकालिक स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय साख को भारी नुकसान होगा।
निर्वासित तिब्बती समुदाय और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील
थोंडुप ने निर्वासित तिब्बतियों से उत्तराधिकार को लेकर योजना बनाने और एकता बनाए रखने का आह्वान किया, जिससे बीजिंग के नैरेटिव का मुकाबला किया जा सके। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय पक्षों से भी धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक संरक्षण के मुद्दों पर सक्रिय रूप से जुड़े रहने का अनुरोध किया। आने वाले वर्षों में यह प्रश्न वैश्विक कूटनीति और मानवाधिकार के केंद्र में बना रहेगा।