10 जुलाई 2026
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दलाई लामा का 91वाँ जन्मदिन: वाशिंगटन में भव्य समारोह, ट्रंप प्रशासन के अधिकारी ने की विरासत की सराहना

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दलाई लामा का 91वाँ जन्मदिन: वाशिंगटन में भव्य समारोह, ट्रंप प्रशासन के अधिकारी ने की विरासत की सराहना

सारांश

वाशिंगटन में दलाई लामा के 91वें जन्मदिन पर आयोजित समारोह सिर्फ उत्सव नहीं था — यह एक कूटनीतिक संकेत भी था। ट्रंप प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी की उपस्थिति और अमेरिकी कांग्रेस की 'डे ऑफ कम्पैशन' घोषणाएँ बताती हैं कि तिब्बत मुद्दा अमेरिकी नीति के केंद्र में बना हुआ है।

मुख्य बातें

दलाई लामा का 91वाँ जन्मदिन 10 जुलाई को वाशिंगटन में ऑफिस ऑफ तिब्बत और इंटरनेशनल कैंपेन फॉर तिब्बत के संयुक्त आयोजन में मनाया गया।
ट्रंप प्रशासन के तिब्बती मामलों के विशेष समन्वयक राइली बार्न्स ने समारोह में भाग लेकर दलाई लामा की विरासत को सम्मान दिया।
तिब्बती कार्यकर्ता लोबगा रांगजेन को श्रद्धांजलि दी गई, जिनका 2 जुलाई को संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के बाहर आत्मदाह के बाद निधन हो गया था।
अमेरिकी कांग्रेस और कई राज्यों व शहरों ने दलाई लामा के जन्मदिन को 'डे ऑफ कम्पैशन' घोषित किया है।
दलाई लामा 1959 से धर्मशाला में निर्वासन में हैं और 1989 में उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

तिब्बती आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा का 91वाँ जन्मदिन अमेरिकी राजधानी वाशिंगटन में 10 जुलाई को विशेष समारोह के साथ मनाया गया, जिसमें ट्रंप प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी राइली बार्न्स ने उनके जीवन, संदेश और वैश्विक विरासत की मुक्त कंठ से प्रशंसा की। ऑफिस ऑफ तिब्बत और इंटरनेशनल कैंपेन फॉर तिब्बत के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में तिब्बती समुदाय, राजनयिक, सरकारी प्रतिनिधि और सामाजिक संगठनों के सदस्य बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

समारोह का स्वरूप और प्रमुख उपस्थिति

कार्यक्रम की शुरुआत तिब्बती बौद्ध धर्मगुरुओं की प्रार्थनाओं से हुई। अमेरिका के तिब्बती मामलों के विशेष समन्वयक और लोकतंत्र, मानवाधिकार एवं श्रम मामलों के सहायक विदेश मंत्री राइली बार्न्स ने इस अवसर पर कहा, 'दलाई लामा और उनके जीवन का उत्सव मनाने के लिए यहाँ होना मेरे लिए सम्मान की बात है। मैं प्रार्थना करता हूँ कि आने वाले वर्षों में भी हमें ऐसे आयोजनों में शामिल होने का अवसर मिलता रहे।'

बार्न्स ने 2019 में धर्मशाला की अपनी यात्रा को भी याद किया, जब वे अमेरिकी विदेश मंत्रालय के ऑफिस ऑफ इंटरनेशनल रिलिजियस फ्रीडम में कार्यरत थे। उन्होंने बताया कि उस मुलाकात में उन्होंने दलाई लामा की करुणा, उदारता, हास्यबोध और आतिथ्य-भावना को प्रत्यक्ष रूप से अनुभव किया।

भावुक प्रसंग: पाँच साल की बेटी और खाता का सम्मान

बार्न्स ने पिछले वर्ष दलाई लामा के 90वें जन्मदिन समारोह का भी उल्लेख किया। उन्होंने एक हृदयस्पर्शी प्रसंग साझा करते हुए बताया कि उनकी पाँच साल की बेटी ने तिब्बती पारंपरिक स्कार्फ — खाता — जिसे वे घर लाए थे, एक अतिथि के स्वागत में स्वयं उपयोग किया, क्योंकि उसे याद था कि यह सम्मान और आतिथ्य का प्रतीक है। यह प्रसंग दर्शाता है कि दलाई लामा का प्रभाव पीढ़ियों की सीमाएँ पार कर रहा है।

तिब्बती कार्यकर्ता को श्रद्धांजलि

समारोह में तिब्बती कार्यकर्ता लोबगा रांगजेन को भी भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी गई। आयोजकों के अनुसार, 2 जुलाई को न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के बाहर आत्मदाह करने के बाद उनकी मृत्यु हो गई थी। उनकी स्मृति में दो मिनट का मौन रखा गया।

करुणा का संदेश और अमेरिकी मान्यता

उत्तर अमेरिका में दलाई लामा के प्रतिनिधि नामग्याल चोएदुप ने कहा कि यह आयोजन केवल जन्मदिन का उत्सव नहीं, बल्कि करुणा और सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों के संदेश को विश्वस्तर पर प्रसारित करने का अवसर है। उन्होंने कहा, '1959 में तिब्बती लोगों ने अपना देश खो दिया, लेकिन पूरी दुनिया को दलाई लामा मिल गए।'

चोएदुप ने यह भी बताया कि अमेरिकी कांग्रेस और देश के कई राज्यों व शहरों ने दलाई लामा के जन्मदिन को 'डे ऑफ कम्पैशन' घोषित किया है — करुणा, अहिंसा, अंतरधार्मिक सद्भाव और मानवीय मूल्यों के प्रति उनके योगदान को मान्यता देते हुए।

इंटरनेशनल कैंपेन फॉर तिब्बत की अध्यक्ष तेनचो ग्यात्सो ने कहा कि पिछले सात दशकों से अधिक समय से दलाई लामा ने दुनिया को यह सिखाया है कि करुणा ही असली शक्ति है, संवाद ही स्थायी शांति का मार्ग है, और सच्चा नेतृत्व विनम्रता, बुद्धिमत्ता तथा सेवाभाव पर टिका होता है।

दलाई लामा की पृष्ठभूमि और अमेरिकी नीति

1959 में तिब्बत छोड़ने के बाद दलाई लामा भारत आए और तब से धर्मशाला में निर्वासन में रह रहे हैं। तिब्बत मुद्दे के शांतिपूर्ण समाधान हेतु उनके अहिंसक प्रयासों को 1989 में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। अमेरिका में तिब्बती नीति अधिनियम 2002 के तहत स्थापित तिब्बती मामलों के विशेष समन्वयक का कार्यालय तिब्बत से संबंधित अमेरिकी कार्यक्रमों, नीतियों और सांस्कृतिक-धार्मिक विरासत की सुरक्षा का काम करता है। यह समारोह ऐसे समय में हुआ जब वैश्विक स्तर पर मानवीय संकट और भू-राजनीतिक तनाव गहरे हैं — और दलाई लामा का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो प्रशासन बदलने के बावजूद बनी रहती है। गौरतलब है कि चीन इस तरह के किसी भी अमेरिकी कदम को अपनी संप्रभुता में हस्तक्षेप मानता है, फिर भी वाशिंगटन ने 'डे ऑफ कम्पैशन' जैसी घोषणाओं के ज़रिए तिब्बत को प्रतीकात्मक रूप से जीवित रखा है। असली सवाल यह है कि क्या यह प्रतीकात्मक समर्थन कभी ठोस कूटनीतिक दबाव में बदलेगा — क्योंकि दलाई लामा की आयु और उत्तराधिकार का प्रश्न अब वैश्विक राजनीति का अगला बड़ा मोर्चा बनने वाला है।
RashtraPress
10 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दलाई लामा का 91वाँ जन्मदिन समारोह कहाँ और कैसे मनाया गया?
दलाई लामा का 91वाँ जन्मदिन 10 जुलाई को अमेरिकी राजधानी वाशिंगटन में ऑफिस ऑफ तिब्बत और इंटरनेशनल कैंपेन फॉर तिब्बत के संयुक्त आयोजन में मनाया गया। समारोह की शुरुआत तिब्बती बौद्ध प्रार्थनाओं से हुई और इसमें राजनयिक, सरकारी प्रतिनिधि व तिब्बती समुदाय के सदस्य शामिल हुए।
राइली बार्न्स कौन हैं और उन्होंने समारोह में क्या कहा?
राइली बार्न्स अमेरिका के तिब्बती मामलों के विशेष समन्वयक और लोकतंत्र, मानवाधिकार एवं श्रम मामलों के सहायक विदेश मंत्री हैं। उन्होंने कहा कि दलाई लामा के जन्मदिन का हिस्सा बनना उनके लिए सम्मान की बात है और उन्होंने 2019 की धर्मशाला यात्रा में दलाई लामा की करुणा व आतिथ्य-भावना को याद किया।
अमेरिका में 'डे ऑफ कम्पैशन' क्या है?
'डे ऑफ कम्पैशन' अमेरिकी कांग्रेस और कई राज्यों व शहरों द्वारा दलाई लामा के जन्मदिन पर की गई घोषणा है। इसके ज़रिए करुणा, अहिंसा, अंतरधार्मिक सद्भाव और मानवीय मूल्यों के प्रति उनके योगदान को सम्मान दिया जाता है।
तिब्बती कार्यकर्ता लोबगा रांगजेन कौन थे?
लोबगा रांगजेन एक तिब्बती कार्यकर्ता थे, जिनका 2 जुलाई को न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के बाहर आत्मदाह के बाद निधन हो गया। 10 जुलाई के समारोह में उन्हें दो मिनट के मौन के साथ श्रद्धांजलि दी गई।
दलाई लामा 1959 से भारत में क्यों हैं और उन्हें नोबेल पुरस्कार कब मिला?
1959 में तिब्बत छोड़ने के बाद दलाई लामा भारत आए और तब से धर्मशाला में निर्वासन में रह रहे हैं। तिब्बत मुद्दे के शांतिपूर्ण समाधान के लिए उनके अहिंसक प्रयासों को 1989 में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
राष्ट्र प्रेस
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