चीन बौद्ध धर्म को CCP के राजनीतिक एजेंडे का हथियार बना रहा है: रिपोर्ट
सारांश
मुख्य बातें
एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट के अनुसार, चीन में बौद्ध धर्म को आध्यात्मिक आस्था के रूप में नहीं, बल्कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के राजनीतिक नियंत्रण के एक सुनियोजित औज़ार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मंदिरों को पर्यटन केंद्रों में तब्दील किया जा रहा है, भिक्षुओं को सरकारी कर्मचारियों की भाँति संचालित किया जा रहा है, और धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या इस प्रकार की जा रही है कि वे CCP के प्रति निष्ठा को बढ़ावा दें।
रिपोर्ट के मुख्य दावे
'यूरोपियन टाइम्स' में प्रकाशित एक लेख में लेखक खेदरूब थोंडुप ने लिखा है कि चीन का बौद्ध धर्म के प्रति रुख आस्था पर नहीं, बल्कि राजनीतिक उपयोगिता पर टिका है। उनके अनुसार, संवैधानिक रूप से नास्तिक होने के बावजूद CCP धर्म को तभी स्वीकार करती है जब उसे सांस्कृतिक विरासत, पर्यटन या समाजवाद के पूरक के रूप में प्रस्तुत किया जा सके। जहाँ बौद्ध धर्म राजनीतिक या जातीय पहचान से जुड़ता है — विशेषकर तिब्बत में — वहाँ उसे खतरे के रूप में देखा जाता है।
दलाई लामा के पुनर्जन्म पर बीजिंग का दावा
रिपोर्ट के अनुसार, बीजिंग यह दावा करता है कि भविष्य के दलाई लामा के पुनर्जन्म को मंजूरी देने का अधिकार उसके पास है। लेख में कहा गया है कि यह तिब्बती बौद्ध परंपरा को उसकी आध्यात्मिक विरासत से अलग कर राज्य के नियंत्रण में लाने का प्रयास है। दलाई लामा के प्रति सार्वजनिक निष्ठा को कथित तौर पर सरकार-विरोधी गतिविधि माना जाता है।
तिब्बती मठों पर निगरानी और 'देशभक्ति शिक्षा'
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि तिब्बत के मठों पर कड़ी निगरानी रखी जाती है और भिक्षुओं को अनिवार्य रूप से 'देशभक्ति शिक्षा' से गुजरना पड़ता है। धार्मिक शिक्षा की जगह राजनीतिक विचारधारा को प्राथमिकता दी जा रही है, जबकि तिब्बती बौद्ध अनुष्ठानों, त्योहारों और शिक्षाओं पर प्रतिबंध या कड़ा नियमन लागू है। कई धार्मिक परंपराओं को 'लोक संस्कृति' के रूप में पेश कर उनका आध्यात्मिक स्वरूप कमज़ोर किया जा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर चीन की 'संरक्षक' छवि
रिपोर्ट के अनुसार, चीन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खुद को बौद्ध विरासत के संरक्षक के रूप में प्रस्तुत करने के लिए मंदिरों के जीर्णोद्धार, अंतरराष्ट्रीय बौद्ध सम्मेलनों और थाईलैंड, श्रीलंका तथा म्यांमार जैसे देशों में सरकारी समर्थन से तीर्थ यात्राओं को बढ़ावा देता है। आलोचकों का कहना है कि यह 'सॉफ्ट पावर' रणनीति का हिस्सा है, जो भीतर और बाहर दो अलग-अलग छवियाँ बनाती है।
तिब्बती पहचान और असहमति को कमज़ोर करने की रणनीति
लेख में यह भी दावा किया गया है कि तिब्बत में बौद्ध धर्म पर बढ़ता नियंत्रण तिब्बती पहचान और असहमति को कमज़ोर करने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है। साथ ही रिपोर्ट यह भी स्वीकार करती है कि आस्था को पूर्णतः राजनीतिक नियंत्रण में लाना संभव नहीं है — और यही इस नीति की सबसे बड़ी चुनौती है। यह रिपोर्ट ऐसे समय में सामने आई है जब तिब्बत में धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय में चिंताएँ लगातार गहरी होती जा रही हैं।