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चीन की बौद्ध कूटनीति: श्रीलंका में प्रभाव बढ़ाने की रणनीति

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चीन की बौद्ध कूटनीति: श्रीलंका में प्रभाव बढ़ाने की रणनीति

सारांश

श्रीलंका में बौद्ध मूल्यों के कमजोर होने और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के एजेंडे की गहराई से स्थापना की एक सोची-समझी रणनीति चल रही है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यदि इसे नहीं रोका गया, तो यह देश की सांस्कृतिक पहचान को कमजोर कर सकती है।

मुख्य बातें

श्रीलंका में बौद्ध मूल्यों को कमजोर करने की एक सोची-समझी रणनीति चल रही है।
चीन बौद्ध धर्म का उपयोग सॉफ्ट-पावर के रूप में कर रहा है।
श्रीलंका को अपनी सांस्कृतिक पहचान को बचाने के लिए सतर्क रहना चाहिए।
चीन की कूटनीति केवल आर्थिक मदद तक सीमित नहीं है।
यदि रोकने के उपाय नहीं किए गए, तो बौद्ध संस्थाएं विदेशी प्रचार का साधन बन सकती हैं।

कोलंबो, 5 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। श्रीलंका में बौद्ध मूल्यों को सुनियोजित ढंग से कमजोर करने और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) के लक्ष्यों को गहराई से स्थापित करने की एक रणनीति चल रही है। यह एक प्रकार की सांस्कृतिक कूटनीति प्रतीत होती है, परंतु असल में यह एक वैचारिक घुसपैठ है। श्रीलंका को सावधानी से आगे बढ़ने की आवश्यकता है, ताकि वह अपनी सदियों पुरानी बौद्ध विरासत को आर्थिक निर्भरता के बदले दांव पर न लगाए। यह बात एक रिपोर्ट में सामने आई है।

श्रीलंकाई समाचार चैनल सीलोन वायर न्यूज के अनुसार, “श्रीलंका, जिसे थेरवाद बौद्ध धर्म की जन्मस्थली के रूप में जाना जाता है, अब अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान के एक सूक्ष्म लेकिन गहरे नुकसान का सामना कर रहा है। इस परिवर्तन के केंद्र में चीन द्वारा बौद्ध धर्म को सॉफ्ट-पावर के रूप में उपयोग करना है, जो उसकी व्यापक कम्युनिस्ट पार्टी की रणनीति से सावधानीपूर्वक जुड़ा हुआ है। भले ही बीजिंग की पहले मित्रता और साझा विरासत की भाषा में प्रस्तुत की जाती हो, परंतु असलियत में इसके पीछे विचारधारा की घुसपैठ और सांस्कृतिक हेरफेर छिपा है।”

रिपोर्ट बताती है कि चीन ने लंबे समय से धर्म को कूटनीति के एक उपकरण के रूप में देखा है। श्रीलंका में जहां बौद्ध धर्म की गहरी आध्यात्मिक जड़ें हैं, बीजिंग के लिए यह स्वाभाविक प्रवेश द्वार बन जाता है। चीन मंदिरों का पुनर्निर्माण, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और तीर्थ यात्राओं को प्रायोजित करता है, और खुद को बौद्ध विरासत का संरक्षक बताता है।

रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि इस दिखावे के पीछे एक सुनियोजित प्रयास छिपा है, जिसका उद्देश्य श्रीलंका की बौद्ध संस्थाओं को कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ चाइना (सीसीपी) के विश्वदृष्टि के साथ जोड़ना है। विद्वानों का कहना है कि चीन की बौद्ध कूटनीति केवल सांस्कृतिक समानता तक सीमित नहीं है; यह सीसीपी की विदेश नीति की एक आवश्यकता है, जिसका उद्देश्य उसकी छवि को नरम बनाना और राज्य-से-राज्य संबंधों के साथ पार्टी-से-पार्टी संबंधों को भी मजबूत करना है।”

इसमें कहा गया है, “हंबनटोटा पोर्ट जैसे महंगे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के कारण श्रीलंका को लोन चुकाने में कठिनाई हो रही है, जिससे उसे ऐसी रियायतें देनी पड़ रही हैं जो चीनी नियंत्रण को और गहरा बना रही हैं। हाल ही में, समझौतों ने श्रीलंका के डिजिटल इकॉनमी प्लान को स्पष्ट रूप से चीनी निवेश से जोड़ दिया है। यह केवल वित्तीय सहायता के बारे में नहीं है, यह चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के आइडियोलॉजिकल फ्रेमवर्क को देश के शासन में शामिल करने के बारे में है।”

रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यदि इस वैचारिक घुसपैठ को नहीं रोका गया, तो यह सदियों पुरानी आध्यात्मिक विरासत को कमजोर कर सकती है और “श्रीलंका की बौद्ध संस्थाओं को विदेशी प्रचार का साधन बना सकती है, बजाय इसके कि वे शाश्वत ज्ञान की संरक्षक बनी रहें।”

संपादकीय दृष्टिकोण

यह स्थिति गंभीर है। श्रीलंका को अपनी सांस्कृतिक पहचान को बचाने के लिए सतर्क रहना होगा। चीन की कूटनीति का प्रभाव केवल आर्थिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और सांस्कृतिक भी है, जो देश की संप्रभुता को कमजोर कर सकता है।
RashtraPress
16 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

चीन की बौद्ध कूटनीति का उद्देश्य क्या है?
चीन की बौद्ध कूटनीति का उद्देश्य श्रीलंका की बौद्ध संस्थाओं को कम्युनिस्ट पार्टी के विश्वदृष्टि के साथ जोड़ना है।
क्या श्रीलंका की बौद्ध विरासत खतरे में है?
हाँ, यदि इस वैचारिक घुसपैठ को रोका नहीं गया, तो यह श्रीलंका की सदियों पुरानी बौद्ध विरासत को कमजोर कर सकती है।
बीजिंग की रणनीति में क्या शामिल है?
बीजिंग मंदिरों का पुनर्निर्माण, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और तीर्थ यात्राओं को प्रायोजित करता है।
श्रीलंका को क्या सावधानी बरतनी चाहिए?
श्रीलंका को अपनी आर्थिक निर्भरता को कम करने और अपनी सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने के लिए सावधानी से आगे बढ़ना चाहिए।
चीन की कूटनीति का श्रीलंका पर क्या प्रभाव है?
चीन की कूटनीति श्रीलंका की सांस्कृतिक पहचान को धीरे-धीरे पुनर्परिभाषित कर रही है।
राष्ट्र प्रेस
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