8 अगस्त 2026
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तिब्बती बौद्ध धर्म को 'चीनी बौद्ध धर्म' बनाने की बीजिंग की मुहिम पर उठे सवाल, धार्मिक स्वतंत्रता खतरे में

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तिब्बती बौद्ध धर्म को 'चीनी बौद्ध धर्म' बनाने की बीजिंग की मुहिम पर उठे सवाल, धार्मिक स्वतंत्रता खतरे में

सारांश

बीजिंग की 'चीनी बौद्ध धर्म' मुहिम महज शब्दावली का बदलाव नहीं — यह तिब्बती सांस्कृतिक पहचान और धार्मिक स्वायत्तता पर सीधा प्रहार है। दलाई लामा के भतीजे खेद्रूब थोंडुप के आरोप बताते हैं कि सीसीपी धर्म को आस्था नहीं, राज्य-सर्वोच्चता के लिए खतरा मानती है।

मुख्य बातें

दलाई लामा के भतीजे खेद्रूब थोंडुप ने 'द तिब्बत एक्सप्रेस' में लेख प्रकाशित कर बीजिंग की धार्मिक नीतियों पर गंभीर आरोप लगाए।
कथित तौर पर सीसीपी तिब्बती बौद्ध धर्म को 'चीनी बौद्ध धर्म' के रूप में पेश कर धार्मिक संस्थाओं को राज्य-नियंत्रण में लाना चाहती है।
थोंडुप के अनुसार, मठों, चर्चों और मस्जिदों पर निगरानी रखी जाती है और स्वतंत्र धार्मिक नेतृत्व की गुंजाइश सीमित है।
कथित तौर पर उइगर धार्मिक नेताओं की आवाज़ दबाई गई, कुछ मस्जिदें ध्वस्त की गईं और ईसाई धर्मस्थलों से क्रॉस हटाए गए।
थोंडुप ने दावा किया कि इस अभियान का एक लक्ष्य दलाई लामा के आध्यात्मिक प्रभाव को कमज़ोर करना भी है।

बीजिंग द्वारा तिब्बती बौद्ध धर्म को 'चीनी बौद्ध धर्म' के रूप में पुनर्परिभाषित करने की कथित मुहिम ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर चिंताएँ उत्पन्न कर दी हैं। आलोचकों का कहना है कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) इस अभियान के ज़रिए तिब्बती सांस्कृतिक पहचान को मिटाने और धार्मिक संस्थाओं को राज्य-नियंत्रण में लाने का प्रयास कर रही है। 'द तिब्बत एक्सप्रेस' में 8 अगस्त को प्रकाशित एक विस्तृत लेख में यह आरोप लगाए गए हैं।

किसने उठाई आवाज़

दलाई लामा के भतीजे खेद्रूब थोंडुप ने 'द तिब्बत एक्सप्रेस' में प्रकाशित अपने लेख में आरोप लगाया कि बीजिंग का यह अभियान 'केवल धार्मिक शब्दावली बदलने तक सीमित नहीं है।' उनके अनुसार, इसका वास्तविक उद्देश्य धार्मिक संस्थानों और आस्था को राज्य के नियंत्रण में लाना है। थोंडुप ने स्पष्ट किया कि यह मामला धर्मशास्त्र से कहीं अधिक संप्रभुता से जुड़ा है।

उन्होंने लिखा: 'चीन की कम्युनिस्ट पार्टी लंबे समय से धर्म को व्यक्तिगत आस्था का विषय भर नहीं, बल्कि राज्य की सर्वोच्चता के लिए चुनौती के रूप में देखती रही है। तिब्बती बौद्ध धर्म को चीनी बौद्ध धर्म के रूप में पेश करना इसी व्यापक नीति का हिस्सा है, जिसके तहत विभिन्न धार्मिक परंपराओं को पार्टी की वैचारिक व्यवस्था के अनुरूप ढालने का प्रयास किया जा रहा है।'

धार्मिक नियंत्रण का तंत्र

थोंडुप के अनुसार, चीन में धार्मिक समुदायों को राज्य-नियंत्रित संगठनों के माध्यम से ही कार्य करने की अनुमति है। ये संगठन धार्मिक नेताओं, शिक्षाओं और गतिविधियों की निगरानी करते हैं। उनके दावे के अनुसार, मठों, चर्चों और मस्जिदों पर कड़ी निगरानी रखी जाती है और स्वतंत्र धार्मिक नेतृत्व की गुंजाइश अत्यंत सीमित है।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि धार्मिक नेताओं को राजनीतिक विचारधारा से जुड़ी शिक्षा दी जाती है, धार्मिक उपदेशों को नियंत्रित किया जाता है और राज्य की अनुमति के बाहर होने वाली धार्मिक गतिविधियों पर कार्रवाई की जाती है।

तिब्बती पहचान पर असर

थोंडुप ने कहा कि तिब्बती बौद्ध धर्म केवल एक आध्यात्मिक परंपरा नहीं, बल्कि तिब्बती समुदाय की सांस्कृतिक पहचान और ऐतिहासिक स्मृति का अभिन्न अंग है। उनके अनुसार, इसे 'चीनी बौद्ध धर्म' की संज्ञा देना इसकी विशिष्ट धार्मिक परंपरा और पहचान को कमज़ोर करने का प्रयास है, जो इसे चीन की राष्ट्रीय एकता की आधिकारिक अवधारणा से जोड़ता है। उन्होंने यह भी दावा किया कि इस प्रक्रिया का एक उद्देश्य दलाई लामा के प्रभाव को सीमित करना है, जो तिब्बती समुदाय के लिए आध्यात्मिक स्वतंत्रता के प्रमुख प्रतीक बने हुए हैं।

अन्य धार्मिक समुदायों पर कथित असर

थोंडुप ने अपने लेख में ईसाई और मुस्लिम समुदायों की स्थिति का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, कथित तौर पर ईसाई धार्मिक स्थलों से क्रॉस हटाए गए, पादरियों को हिरासत में लिया गया और धार्मिक ग्रंथों को पार्टी के मूल्यों के अनुरूप ढालने के प्रयास किए गए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ मस्जिदों को ध्वस्त किया गया, उइगर धार्मिक नेताओं की आवाज़ दबाई गई और कुरान पढ़ने पर प्रतिबंध लगाए गए।

यह ऐसे समय में आया है जब चीन में धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन पहले से ही चिंता जताते रहे हैं। गौरतलब है कि बीजिंग ने इन आरोपों को अब तक सार्वजनिक रूप से खारिज किया है और अपनी नीतियों को 'धार्मिक सद्भाव' के लिए आवश्यक बताता रहा है।

आगे क्या

थोंडुप के इस लेख ने तिब्बत समर्थक संगठनों और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार पैरोकारों के बीच नई बहस छेड़ दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि बीजिंग की यह नीति आने वाले वर्षों में तिब्बती धार्मिक और सांस्कृतिक संरचना को किस हद तक प्रभावित करती है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

शिनजियांग और हांगकांग — तीनों में यही पैटर्न दिखता है: सांस्कृतिक विशिष्टता को पहले 'राष्ट्रीय एकता' के ढाँचे में समेटो, फिर धीरे-धीरे स्वायत्त अधिकार का आधार ही खत्म करो। मुख्यधारा की कवरेज इस मुद्दे को अक्सर तिब्बत-चीन द्विपक्षीय विवाद तक सीमित कर देती है, जबकि असल सवाल यह है कि क्या किसी राज्य को धार्मिक पहचान को कानूनी रूप से पुनर्परिभाषित करने का अधिकार है। जब तक अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस पर ठोस जवाबदेही तय नहीं करता, ऐसे दावे केवल रिपोर्टों तक सिमटे रहेंगे।
RashtraPress
8 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बीजिंग की 'चीनी बौद्ध धर्म' मुहिम क्या है?
यह कथित तौर पर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) की वह नीति है जिसके तहत तिब्बती बौद्ध धर्म को 'चीनी बौद्ध धर्म' के रूप में पुनर्परिभाषित किया जा रहा है। आलोचकों का कहना है कि इसका उद्देश्य धार्मिक संस्थाओं को राज्य-नियंत्रण में लाना और तिब्बती सांस्कृतिक पहचान को कमज़ोर करना है।
खेद्रूब थोंडुप कौन हैं और उन्होंने क्या आरोप लगाए?
खेद्रूब थोंडुप दलाई लामा के भतीजे हैं, जिन्होंने 'द तिब्बत एक्सप्रेस' में प्रकाशित लेख में आरोप लगाया कि बीजिंग का अभियान धार्मिक शब्दावली बदलने से कहीं आगे जाता है। उनके अनुसार, सीसीपी धर्म को राज्य-सर्वोच्चता के लिए चुनौती मानती है और मठों से लेकर मस्जिदों तक सभी पर निगरानी रखी जाती है।
इस मुहिम का तिब्बती पहचान पर क्या असर पड़ रहा है?
थोंडुप के अनुसार, तिब्बती बौद्ध धर्म तिब्बती समुदाय की सांस्कृतिक पहचान और ऐतिहासिक स्मृति का अभिन्न हिस्सा है। इसे 'चीनी बौद्ध धर्म' कहना इस विशिष्ट परंपरा को चीन की राष्ट्रीय एकता की अवधारणा में समाहित करने का प्रयास है, जिससे तिब्बती धार्मिक और सांस्कृतिक स्वायत्तता कमज़ोर होती है।
क्या चीन में अन्य धार्मिक समुदाय भी प्रभावित हैं?
थोंडुप के अनुसार, कथित तौर पर ईसाई धर्मस्थलों से क्रॉस हटाए गए, पादरियों को हिरासत में लिया गया और उइगर मुस्लिम समुदाय के धार्मिक नेताओं की आवाज़ दबाई गई। कुछ मस्जिदें ध्वस्त किए जाने और कुरान पढ़ने पर प्रतिबंध लगाए जाने के भी आरोप हैं।
दलाई लामा की इस मुद्दे में क्या भूमिका है?
थोंडुप ने दावा किया है कि बीजिंग की इस मुहिम का एक प्रमुख उद्देश्य दलाई लामा के आध्यात्मिक प्रभाव को सीमित करना है। दलाई लामा तिब्बती समुदाय के लिए आध्यात्मिक स्वतंत्रता के सबसे बड़े प्रतीक बने हुए हैं, और बीजिंग उनकी इस भूमिका को कमज़ोर करना चाहता है।
राष्ट्र प्रेस
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