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15वें दलाई लामा पर चीनी नियंत्रण की कोशिश पड़ेगी महंगी, पंचेन लामा विफलता से सबक लेने की चेतावनी

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15वें दलाई लामा पर चीनी नियंत्रण की कोशिश पड़ेगी महंगी, पंचेन लामा विफलता से सबक लेने की चेतावनी

सारांश

पंचेन लामा विवाद में ३० साल बाद भी चीन की नियुक्ति को तिब्बती जनता ने नहीं माना। अब दलाई लामा के भतीजे खेदरूब थोंडुप की चेतावनी है — 15वें दलाई लामा पर वही दांव दोहराना चीन के लिए कूटनीतिक और धार्मिक दोनों मोर्चों पर महंगा पड़ेगा।

मुख्य बातें

खेदरूब थोंडुप ने 'जर्नल ऑफ डेमोक्रेसी' में लिखा कि 15वें दलाई लामा के चयन में चीनी हस्तक्षेप पंचेन लामा जैसी विफलता दोहराएगा।
1995 में सीसीपी ने छह वर्षीय गेधुन चोएक्यी न्यिमा का अपहरण कर ग्याइनकैन नोरबू को 11वें पंचेन लामा नियुक्त किया, जिन्हें लगभग 30 वर्ष बाद भी वास्तविक मान्यता नहीं मिली।
चीन 'गोल्डन अर्न' प्रणाली का हवाला देकर 15वें दलाई लामा के लिए सरकारी मंजूरी अनिवार्य बनाना चाहता है।
रिपोर्ट के अनुसार, चीनी नियुक्ति को मंगोलिया , श्रीलंका , नेपाल और जापान के बौद्ध समुदाय राजनीतिक कठपुतली मानेंगे।
दशकों के दमन के बावजूद तिब्बती पहचान और धार्मिक आस्था बरकरार है, जो चीनी नियंत्रण के विरुद्ध प्रतिरोध की गारंटी है।

दलाई लामा के भतीजे खेदरूब थोंडुप ने अमेरिकी पत्रिका 'जर्नल ऑफ डेमोक्रेसी' में लिखा है कि यदि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) 15वें दलाई लामा के चयन को भी नियंत्रित करने का प्रयास करती है, तो उसे वही परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं जो 11वें पंचेन लामा के मामले में सामने आए थे। उनका तर्क है कि धार्मिक नेताओं की वैधता जनता की आस्था से उपजती है — किसी सरकारी आदेश से नहीं।

पंचेन लामा विवाद: चीन की विफलता का दर्पण

1995 में सीसीपी ने छह वर्षीय गेधुन चोएक्यी न्यिमा का अपहरण कर लिया था, जिन्हें 14वें दलाई लामा ने 11वें पंचेन लामा के रूप में मान्यता दी थी। उनकी जगह चीन ने ग्याइनकैन नोरबू को नियुक्त किया। थोंडुप के अनुसार, लगभग 30 वर्ष बीत जाने के बाद भी ग्याइनकैन नोरबू को तिब्बती जनता, बौद्ध समुदाय या वैश्विक धार्मिक जगत में वास्तविक मान्यता नहीं मिली है। उनकी पहचान केवल एक सरकार-समर्थित व्यक्ति के रूप में सीमित रही है।

चीन का 'गोल्डन अर्न' तर्क और उसकी कमज़ोरियाँ

रिपोर्ट के अनुसार, चीन पहले ही संकेत दे चुका है कि 15वें दलाई लामा को सरकारी मंजूरी लेनी होगी और वह 'गोल्डन अर्न' प्रणाली का हवाला देता है। थोंडुप ने इस तर्क को ऐतिहासिक रूप से कमज़ोर बताया है। उनके अनुसार, दलाई लामा केवल एक धार्मिक नेता नहीं, बल्कि करुणा, अहिंसा और तिब्बती संघर्ष के जीवंत प्रतीक हैं — इस भूमिका को किसी सरकारी अधिसूचना से परिभाषित नहीं किया जा सकता।

वैश्विक और कूटनीतिक परिणाम

रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यदि चीन अपनी पसंद के किसी व्यक्ति को दलाई लामा घोषित करता है, तो दुनिया उसे आध्यात्मिक गुरु नहीं बल्कि राजनीतिक कठपुतली के रूप में देखेगी। इसका असर मंगोलिया, श्रीलंका, नेपाल और जापान तक के बौद्ध समुदायों में महसूस किया जा सकता है। तिब्बत पहले से ही चीन के भारत, अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ संबंधों में एक संवेदनशील मुद्दा है।

तिब्बती पहचान और प्रतिरोध की दृढ़ता

रिपोर्ट इस बात पर भी ज़ोर देती है कि दशकों के सांस्कृतिक दमन, धार्मिक प्रतिबंधों और राजनीतिक उपेक्षा के बावजूद तिब्बती पहचान को मिटाया नहीं जा सका है। तिब्बतियों ने अपनी भाषा, परंपराएँ और धार्मिक आस्था को सुरक्षित रखा है। रिपोर्ट का दावा है कि यही दृढ़ता और प्रतिरोध 15वें दलाई लामा के उत्तराधिकार के समय भी उभरकर सामने आएगा।

आगे क्या होगा

रिपोर्ट के अनुसार, चीनी हस्तक्षेप से स्थिरता आने के बजाय विवाद और संघर्ष बढ़ने की आशंका है। दलाई लामा की वैश्विक प्रतिष्ठा के कारण उनके उत्तराधिकारी के चयन पर दुनियाभर की सरकारों और नागरिक संगठनों की नज़र बनी रहेगी। यह मुद्दा आने वाले वर्षों में चीन की कूटनीतिक चुनौतियों को और जटिल बना सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

विशेषकर भारत और एशिया के बौद्ध-बहुल देश, चीनी नियुक्ति को मान्यता देने से इनकार कर एक ठोस कूटनीतिक मोर्चा बना पाएँगे। यदि नहीं, तो खेदरूब थोंडुप की चेतावनी एक नैतिक वक्तव्य बनकर रह जाएगी — रणनीतिक दबाव नहीं।
RashtraPress
14 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

15वें दलाई लामा के चयन में चीन का क्या रुख है?
चीन का कहना है कि 15वें दलाई लामा को सरकारी मंजूरी लेनी होगी और वह 'गोल्डन अर्न' प्रणाली का हवाला देता है। रिपोर्ट के अनुसार यह तर्क ऐतिहासिक रूप से कमज़ोर है और तिब्बती समुदाय इसे स्वीकार नहीं करेगा।
पंचेन लामा विवाद क्या है और यह दलाई लामा उत्तराधिकार से कैसे जुड़ा है?
1995 में सीसीपी ने छह वर्षीय गेधुन चोएक्यी न्यिमा का अपहरण कर लिया, जिन्हें 14वें दलाई लामा ने 11वें पंचेन लामा माना था, और उनकी जगह ग्याइनकैन नोरबू को नियुक्त किया। लगभग 30 वर्ष बाद भी ग्याइनकैन नोरबू को तिब्बती जनता या वैश्विक बौद्ध समुदाय की वास्तविक मान्यता नहीं मिली, जो दर्शाता है कि जबरन नियुक्ति काम नहीं करती।
चीन द्वारा दलाई लामा नियुक्त करने के क्या कूटनीतिक परिणाम हो सकते हैं?
रिपोर्ट के अनुसार, चीनी नियुक्ति से मंगोलिया, श्रीलंका, नेपाल और जापान के बौद्ध समुदायों में नाराज़गी बढ़ेगी। इससे भारत, अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ चीन के संबंध और जटिल होंगे तथा अंतरराष्ट्रीय आलोचना तेज़ होगी।
खेदरूब थोंडुप कौन हैं और उन्होंने यह बात कहाँ कही?
खेदरूब थोंडुप 14वें दलाई लामा के भतीजे हैं। उन्होंने अमेरिकी पत्रिका 'जर्नल ऑफ डेमोक्रेसी' में लिखे एक लेख में यह चेतावनी दी है कि चीनी नियंत्रण की कोशिश पंचेन लामा जैसी विफलता को दोहराएगी।
क्या दशकों के दमन के बाद भी तिब्बती पहचान बची है?
रिपोर्ट के अनुसार, सांस्कृतिक दमन, धार्मिक प्रतिबंधों और राजनीतिक उपेक्षा के बावजूद तिब्बतियों ने अपनी भाषा, परंपराएँ और धार्मिक आस्था सुरक्षित रखी है। यही दृढ़ता 15वें दलाई लामा के उत्तराधिकार के समय भी चीनी नियंत्रण के विरुद्ध प्रतिरोध के रूप में उभरेगी।
राष्ट्र प्रेस
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