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तिब्बत में चीन के मेगा डैम के नीचे सक्रिय फॉल्ट लाइन, चीनी वैज्ञानिकों ने जताई गंभीर चिंता

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तिब्बत में चीन के मेगा डैम के नीचे सक्रिय फॉल्ट लाइन, चीनी वैज्ञानिकों ने जताई गंभीर चिंता

सारांश

चीन की यारलुंग त्सांगपो जलविद्युत परियोजना के ठीक नीचे सक्रिय पाइजेन फॉल्ट लाइन मिली है — यह चेतावनी खुद चीनी वैज्ञानिकों ने दी है। दुनिया के सबसे बड़े बांध का निर्माण हिमालय के सर्वाधिक भूकंप-प्रवण क्षेत्र में हो रहा है, और यह भारत की ब्रह्मपुत्र नदी से महज 50 किलोमीटर ऊपर है।

मुख्य बातें

चीनी वैज्ञानिकों ने तिब्बत के मेतोग जलविद्युत स्टेशन के नीचे सक्रिय पाइजेन फॉल्ट लाइन की पहचान की।
यह परियोजना स्थल उस बिंदु से लगभग 50 किलोमीटर पहले है जहाँ यारलुंग त्सांगपो भारत में प्रवेश कर ब्रह्मपुत्र बनती है।
शोध चाइना जियोलॉजिकल सर्वे के पर्यवेक्षण में हुआ और 'सेडिमेंटरी जियोलॉजी एंड टेथियन जियोलॉजी' पत्रिका में प्रकाशित हुआ।
पाइजेन फॉल्ट हिमयुग के बाद से सक्रिय है; भूकंप या जलाशय भराव के दौरान भूस्खलन का खतरा बढ़ सकता है।
वैज्ञानिकों ने परियोजना बंद करने की माँग नहीं की, लेकिन मज़बूत सुरक्षा उपायों की सिफारिश की।

चीनी वैज्ञानिकों ने तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नदी पर निर्माणाधीन विश्व की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजना — मेतोग जलविद्युत स्टेशन — के भू-वैज्ञानिक जोखिमों को लेकर गंभीर आगाह किया है। शोधकर्ताओं के अनुसार, परियोजना स्थल के ठीक नीचे एक सक्रिय पाइजेन फॉल्ट लाइन मौजूद है, जो इस विशाल बांध की संरचनात्मक मजबूती के लिए दीर्घकालिक खतरा उत्पन्न कर सकती है।

अध्ययन का आधार और स्रोत

यह चेतावनी चीनी भाषा की वैज्ञानिक पत्रिका 'सेडिमेंटरी जियोलॉजी एंड टेथियन जियोलॉजी' में पिछले महीने प्रकाशित एक शोध पर आधारित है। यह अध्ययन सरकारी संस्था चाइना जियोलॉजिकल सर्वे के पर्यवेक्षण में चेंगदू यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी, चाइना जियोलॉजिकल सर्वे के सिविल-मिलिट्री इंटीग्रेशन सेंटर और मिडिल यारलुंग जांगबो रिवर नेचुरल रिसोर्सेज ऑब्जर्वेशन एंड रिसर्च स्टेशन के भूवैज्ञानिकों ने मिलकर किया। इस शोध की जानकारी साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट ने रिपोर्ट की।

पाइजेन फॉल्ट: क्या है खतरा

अध्ययन के अनुसार, पाइजेन फॉल्ट — पूर्वी हिमालय क्षेत्र में पृथ्वी की ऊपरी सतह में मौजूद एक सक्रिय भूगर्भीय दरार — सीधे मेतोग काउंटी, तिब्बत में प्रस्तावित बांध स्थल के नीचे से गुजरती है। यह स्थान उस बिंदु से लगभग 50 किलोमीटर पहले है जहाँ यारलुंग त्सांगपो नदी भारत में प्रवेश करती है और ब्रह्मपुत्र का रूप लेती है।

शोधकर्ताओं के अनुसार, यह फॉल्ट हिमयुग के बाद से सक्रिय बनी हुई है। इसके कारण आसपास की चट्टानों में दरारें आई हैं और उनके भौतिक गुणों में बदलाव हुआ है, जिससे क्षेत्र में बनने वाली इंजीनियरिंग परियोजनाओं — बांध, सड़कें, पुल, सुरंगें और जलाशय — की नींव और स्थिरता कमज़ोर हो सकती है।

जलाशय क्षेत्र में भूस्खलन का जोखिम

अध्ययन में यह भी रेखांकित किया गया है कि पाइजेन क्षेत्र यारलुंग त्सांगपो जलविद्युत परियोजना के जलाशय क्षेत्र के भीतर आता है। जलाशय के आसपास की भूमि की संरचना ढीली है और आपसी पकड़ कमज़ोर है। ऐसे में लंबे समय तक पानी के संपर्क, भूकंप या फॉल्ट गतिविधि की स्थिति में ढलानों के अस्थिर होने और भूस्खलन का खतरा काफी बढ़ जाता है। गौरतलब है कि हिमालयी भूकंपीय क्षेत्र दुनिया के सर्वाधिक सक्रिय भूकंप-प्रवण क्षेत्रों में गिना जाता है।

वैज्ञानिकों की सिफारिशें

हालाँकि शोधकर्ताओं ने परियोजना को रोकने की माँग नहीं की है, लेकिन उन्होंने इंजीनियरों को अधिक सुदृढ़ सुरक्षा उपाय अपनाने की सलाह दी है। इनमें ढलानों की स्थिरता बढ़ाना, रिटेनिंग संरचनाओं की स्थापना और भूस्खलन, भू-धंसाव तथा अन्य भू-वैज्ञानिक खतरों को कम करने के उपाय प्रमुख हैं।

भारत के लिए निहितार्थ

यह परियोजना भारत के लिए भी सामरिक और पर्यावरणीय दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यारलुंग त्सांगपो ही भारत में ब्रह्मपुत्र नदी बनती है और अरुणाचल प्रदेश एवं असम के करोड़ों लोगों की जल-आपूर्ति, कृषि और पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करती है। यह ऐसे समय में आया है जब भारत-चीन सीमा क्षेत्र में जल-भू-राजनीति पहले से ही संवेदनशील बनी हुई है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि चीन इन वैज्ञानिक चेतावनियों के आलोक में परियोजना की डिज़ाइन और सुरक्षा मानकों में क्या बदलाव करता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि चीन की सरकारी संस्था चाइना जियोलॉजिकल सर्वे के पर्यवेक्षण में काम करने वाले वैज्ञानिकों ने ही दी है — यह दर्शाता है कि जोखिम को नज़रअंदाज़ करना अब संभव नहीं रहा। असली सवाल यह है कि क्या बीजिंग इन चेतावनियों को परियोजना की डिज़ाइन में वास्तव में शामिल करेगा, या ये सिफारिशें महज कागज़ी औपचारिकता बनकर रह जाएंगी। भारत के लिए यह और भी चिंताजनक है — ब्रह्मपुत्र पर निर्भर करोड़ों लोगों की सुरक्षा एक ऐसे बांध की इंजीनियरिंग निर्णयों पर टिकी है जिस पर उनका कोई नियंत्रण नहीं है। मुख्यधारा की कवरेज परियोजना के आकार पर केंद्रित रहती है, जबकि असली कहानी यह है कि भूकंपीय जोखिम और जल-भू-राजनीति का यह संगम दक्षिण एशिया के लिए एक दीर्घकालिक रणनीतिक चुनौती है।
RashtraPress
12 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मेतोग जलविद्युत स्टेशन के नीचे कौन-सी फॉल्ट लाइन मिली है?
चीनी वैज्ञानिकों ने पाया है कि पाइजेन फॉल्ट — पूर्वी हिमालय में पृथ्वी की ऊपरी सतह में मौजूद एक सक्रिय भूगर्भीय दरार — सीधे तिब्बत के मेतोग काउंटी में निर्माणाधीन मेतोग जलविद्युत स्टेशन के नीचे से गुजरती है। यह फॉल्ट हिमयुग के बाद से सक्रिय बताई गई है।
यह परियोजना भारत के लिए क्यों महत्त्वपूर्ण है?
यारलुंग त्सांगपो नदी ही भारत में ब्रह्मपुत्र बनती है, और बांध स्थल उस बिंदु से महज 50 किलोमीटर पहले है जहाँ यह नदी भारत में प्रवेश करती है। किसी भी भू-वैज्ञानिक या संरचनात्मक विफलता की स्थिति में अरुणाचल प्रदेश और असम के करोड़ों लोगों पर गंभीर असर पड़ सकता है।
क्या वैज्ञानिकों ने इस परियोजना को रोकने की माँग की है?
नहीं, शोधकर्ताओं ने परियोजना बंद करने की माँग नहीं की है। उन्होंने इंजीनियरों को ढलानों की स्थिरता बढ़ाने, रिटेनिंग संरचनाएँ स्थापित करने और भूस्खलन व भू-धंसाव जैसे खतरों को कम करने के उपाय अपनाने की सलाह दी है।
यह शोध किसने किया और कहाँ प्रकाशित हुआ?
यह अध्ययन चेंगदू यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी, चाइना जियोलॉजिकल सर्वे के सिविल-मिलिट्री इंटीग्रेशन सेंटर और मिडिल यारलुंग जांगबो रिवर नेचुरल रिसोर्सेज ऑब्जर्वेशन एंड रिसर्च स्टेशन के भूवैज्ञानिकों ने मिलकर किया। यह चीनी भाषा की पत्रिका 'सेडिमेंटरी जियोलॉजी एंड टेथियन जियोलॉजी' में प्रकाशित हुआ।
पाइजेन फॉल्ट से बांध और जलाशय को क्या-क्या खतरे हैं?
शोधकर्ताओं के अनुसार, पाइजेन फॉल्ट के कारण आसपास की चट्टानों में दरारें आ चुकी हैं और उनके भौतिक गुण कमज़ोर हो गए हैं। जलाशय क्षेत्र की ढीली भूमि संरचना के कारण लंबे समय तक पानी के संपर्क, भूकंप या फॉल्ट गतिविधि के दौरान भूस्खलन और भू-धंसाव का खतरा बढ़ जाता है।
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