21 अक्टूबर 2026
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दक्षिण कोरिया को युद्धकालीन सैन्य कमान (ओपकॉन) हस्तांतरण पर अमेरिका सतर्क, बदलते खतरों का हवाला

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दक्षिण कोरिया को युद्धकालीन सैन्य कमान (ओपकॉन) हस्तांतरण पर अमेरिका सतर्क, बदलते खतरों का हवाला

सारांश

दक्षिण कोरिया ओपकॉन वापस चाहता है — और राष्ट्रपति ली जे म्युंग 2030 से पहले इसे हासिल करने पर अड़े हैं। लेकिन अमेरिका का कहना है कि उत्तर कोरिया के बदलते परमाणु और मिसाइल खतरों ने पुराने मानकों को अपर्याप्त बना दिया है — और शर्तें पूरी होने से पहले कोई हस्तांतरण नहीं होगा।

मुख्य बातें

अमेरिकी वरिष्ठ अधिकारी ने 21 अक्टूबर 2026 को कहा कि ओपकॉन हस्तांतरण की बुनियादी शर्तें अपरिवर्तित हैं, लेकिन कोरियाई प्रायद्वीप में खतरे का माहौल तेज़ी से बदल रहा है।
दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति ली जे म्युंग ने 2030 में कार्यकाल समाप्त होने से पहले ओपकॉन वापस लेने की मांग दोहराई।
जनरल जेवियर ब्रनसन ने उत्तर कोरिया के मिसाइल परीक्षणों का हवाला देते हुए नए मानकों की ज़रूरत का संकेत दिया।
दक्षिण कोरिया के रक्षा मंत्रालय की प्रवक्ता चुंग बिन-ना ने चेताया कि बदलती शर्तें इस लक्ष्य को अप्राप्य बना देंगी।
दक्षिण कोरिया ने 1994 में शांतिकालीन नियंत्रण वापस पाया था; युद्धकालीन कमान कोरियाई युद्ध (1950–1953) से अमेरिकी नेतृत्व वाले ढाँचे के पास है।

अमेरिका ने दक्षिण कोरिया को युद्धकालीन सैन्य अभियान नियंत्रण (ओपकॉन) सौंपने की प्रक्रिया पर सतर्कता बरतते हुए स्पष्ट किया है कि दोनों देशों के बीच पहले से तय शर्तें यथावत हैं, लेकिन कोरियाई प्रायद्वीप में सुरक्षा खतरों का स्वरूप तेज़ी से बदल रहा है। 21 अक्टूबर 2026 को अमेरिका के एक वरिष्ठ अधिकारी ने यह स्थिति स्पष्ट की, जो दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति ली जे म्युंग की ओर से ओपकॉन जल्द वापस लेने की मांग दोहराए जाने के ठीक बाद आई है।

अमेरिकी अधिकारियों का रुख

अमेरिका के एक वरिष्ठ अधिकारी ने मंगलवार को कहा, 'युद्धकालीन सैन्य अभियान नियंत्रण के हस्तांतरण की बुनियादी शर्तें पहले जैसी ही हैं, लेकिन क्षेत्र में खतरे का माहौल तेज़ी से बदल रहा है।' उन्होंने यह भी जोड़ा कि अमेरिका और दक्षिण कोरिया को गठबंधन के सामने मौजूद सभी क्षेत्रीय खतरों से निपटने के लिए तैयार रहना होगा।

अमेरिकी रक्षा विभाग के एक अन्य अधिकारी ने भी रेखांकित किया कि ओपकॉन हस्तांतरण पूरी तरह से पूर्व-सहमत शर्तों पर आधारित है और तब तक नहीं होगा जब तक ये शर्तें पूरी नहीं होतीं। अमेरिका इस प्रक्रिया के किसी भी अंतिम फैसले को लेकर अभी से कोई निष्कर्ष नहीं निकालना चाहता।

दक्षिण कोरिया की मांग और ली सरकार की प्राथमिकता

दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति ली जे म्युंग ने सोमवार को कहा, 'युद्धकालीन सैन्य अभियान नियंत्रण जल्द दक्षिण कोरिया को वापस मिलना चाहिए। सोल इसके लिए क्षमतावान है और इस दिशा में अमेरिका के साथ बातचीत भी आगे बढ़ रही है।' ली प्रशासन की कोशिश है कि 2030 में राष्ट्रपति का कार्यकाल समाप्त होने से पहले यह प्रक्रिया पूरी हो जाए।

हालाँकि, हस्तांतरण की समयसीमा और ज़रूरी मानकों को लेकर दोनों सहयोगी देशों के बीच मतभेद उभरते दिखाई दे रहे हैं।

उत्तर कोरिया का बदलता खतरा और नए मानकों की ज़रूरत

अमेरिकी सेना की दक्षिण कोरिया में तैनात कमान के प्रमुख जनरल जेवियर ब्रनसन ने पिछले सप्ताह वाशिंगटन में कहा था कि परिस्थितियाँ बदल गई हैं। उन्होंने उत्तर कोरिया के हालिया मिसाइल परीक्षणों का उल्लेख करते हुए संकेत दिया कि सैन्य कमान हस्तांतरण के लिए नए मानकों की ज़रूरत पड़ सकती है।

यह टिप्पणी उत्तर कोरिया के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों में तेज़ी से हो रही प्रगति को लेकर अमेरिकी चिंताओं के बीच आई है। गौरतलब है कि उत्तर कोरिया की परमाणु क्षमता में इज़ाफा इस पूरी प्रक्रिया को जटिल बनाने वाला सबसे बड़ा कारक बन गया है।

दक्षिण कोरिया की प्रतिक्रिया

दक्षिण कोरिया के रक्षा मंत्रालय की प्रवक्ता चुंग बिन-ना ने कहा कि यदि हस्तांतरण की शर्तें लगातार बदलती रहेंगी, तो यह लक्ष्य कभी हासिल नहीं हो पाएगा। उन्होंने साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि दोनों देश पहले से तय शर्तों के आधार पर इस मुद्दे पर समन्वय बनाए हुए हैं।

ओपकॉन का ऐतिहासिक संदर्भ

कोरियाई युद्ध (1950–1953) के दौरान दक्षिण कोरिया ने युद्धकालीन अभियान नियंत्रण अमेरिका के नेतृत्व वाली संयुक्त राष्ट्र कमान को सौंप दिया था। 1978 में इसे अमेरिका-दक्षिण कोरिया संयुक्त सेनाओं की कमान के अधीन कर दिया गया। 1994 में दक्षिण कोरिया ने शांतिकालीन सैन्य नियंत्रण वापस पा लिया, लेकिन युद्धकालीन नियंत्रण अब भी जनरल ब्रनसन के नेतृत्व वाली संयुक्त सेनाओं के पास बना हुआ है।

यह ऐसे समय में आया है जब अमेरिका-दक्षिण कोरिया गठबंधन के भीतर रणनीतिक स्वायत्तता बनाम साझा सुरक्षा ढाँचे की बहस नई ऊँचाई पर है। दोनों देशों के बीच चर्चा जारी है कि ओपकॉन कब और किन शर्तों के तहत सौंपा जाए।

संपादकीय दृष्टिकोण

जब खतरे का मूल्यांकन वाशिंगटन करता है और हस्तांतरण की शर्तें भी वही तय करता है? जनरल ब्रनसन का 'बदली परिस्थितियों' वाला तर्क नया नहीं है — पहले भी इसी तरह की भाषा ने समयसीमाएँ खिसकाई हैं। ली सरकार का 2030 का लक्ष्य राजनीतिक रूप से महत्वाकांक्षी है, लेकिन उत्तर कोरिया की बढ़ती परमाणु क्षमता के बीच अमेरिकी सेना के लिए हस्तांतरण को हरी झंडी देना भी आसान नहीं होगा। यह खींचतान बताती है कि 'गठबंधन' की भाषा के पीछे नियंत्रण और विश्वास का जो असंतुलन है, वह अभी सुलझा नहीं है।
RashtraPress
21 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ओपकॉन (युद्धकालीन सैन्य अभियान नियंत्रण) क्या है और यह अभी किसके पास है?
ओपकॉन वह अधिकार है जिसके तहत युद्ध की स्थिति में किसी देश की सेना का संचालन किया जाता है। यह अभी अमेरिकी जनरल के नेतृत्व वाली अमेरिका-दक्षिण कोरिया संयुक्त सेनाओं के पास है, जो कोरियाई युद्ध (1950–1953) के बाद से इस व्यवस्था में है। दक्षिण कोरिया ने 1994 में शांतिकालीन नियंत्रण वापस ले लिया था, लेकिन युद्धकालीन कमान अब तक नहीं मिली।
दक्षिण कोरिया अभी ओपकॉन वापस क्यों चाहता है?
राष्ट्रपति ली जे म्युंग का तर्क है कि दक्षिण कोरिया अपनी सेना का नियंत्रण खुद संभालने में सक्षम है और इसे अपने 2030 में समाप्त होने वाले कार्यकाल से पहले हासिल करना उनकी प्राथमिकता है। यह मांग राष्ट्रीय संप्रभुता और रणनीतिक स्वायत्तता की व्यापक बहस से भी जुड़ी है।
अमेरिका ओपकॉन हस्तांतरण में देरी क्यों कर रहा है?
अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि हस्तांतरण के लिए पूर्व-सहमत शर्तें पूरी होनी ज़रूरी हैं और उत्तर कोरिया के परमाणु व मिसाइल कार्यक्रमों में तेज़ प्रगति ने खतरे का परिदृश्य बदल दिया है। जनरल जेवियर ब्रनसन ने संकेत दिया है कि नए खतरों के मद्देनज़र नए मानकों की ज़रूरत पड़ सकती है।
दक्षिण कोरिया के रक्षा मंत्रालय ने बदलती शर्तों पर क्या कहा?
रक्षा मंत्रालय की प्रवक्ता चुंग बिन-ना ने चेतावनी दी कि यदि हस्तांतरण की शर्तें बार-बार बदलती रहीं, तो यह लक्ष्य कभी हासिल नहीं होगा। साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि दोनों देश पहले से तय शर्तों के आधार पर ही समन्वय कर रहे हैं।
ओपकॉन विवाद का अमेरिका-दक्षिण कोरिया गठबंधन पर क्या असर पड़ सकता है?
यह मुद्दा गठबंधन के भीतर रणनीतिक स्वायत्तता और साझा सुरक्षा के बीच संतुलन की एक बड़ी परीक्षा है। यदि समयसीमा और शर्तों पर सहमति नहीं बनी, तो ली सरकार के लिए यह राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दा बन सकता है और गठबंधन में तनाव उभर सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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