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दक्षिण कोरिया को ओपीकॉन हस्तांतरण: यूएसएफके बोला — शर्तें पूरी होने पर ही होगा ट्रांसफर

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दक्षिण कोरिया को ओपीकॉन हस्तांतरण: यूएसएफके बोला — शर्तें पूरी होने पर ही होगा ट्रांसफर

सारांश

दक्षिण कोरिया को युद्धकालीन सैन्य कमान सौंपने का मामला फिर गरमाया — यूएसएफके ने दोहराया कि शर्तें पूरी होने पर ही ओपीकॉन ट्रांसफर होगा। सियोल 2030 की डेडलाइन चाहता है, वाशिंगटन 2029 की पहली तिमाही की बात कर रहा है। जल्दबाजी से संयुक्त कमांड सिस्टम टूटने की चेतावनी भी सामने आई है।

मुख्य बातें

यूएसएफके ने पुष्टि की कि दक्षिण कोरिया को ओपीकॉन हस्तांतरण कंडीशन्स-बेस्ड नीति के तहत ही होगा, नीति में कोई बदलाव नहीं।
राष्ट्रपति ली जे म्युंग की सरकार 2030 तक युद्धकालीन ओपीकॉन वापस हासिल करना चाहती है।
यूएसएफके कमांडर जनरल जेवियर ब्रूनसन ने कहा कि दोनों देशों का लक्ष्य 2029 की पहली तिमाही तक शर्तें पूरी करना है — सियोल की समयसीमा से भिन्न।
चोसुन इल्बो की रिपोर्ट के अनुसार जल्दबाजी में ट्रांसफर होने पर संयुक्त कमांड सिस्टम टूट सकता है।
दक्षिण कोरिया ने 1994 में शांतिकाल का ऑपरेशनल कंट्रोल वापस लिया था; युद्धकालीन ओपीकॉन अभी भी अमेरिका के पास है।
ओपीकॉन ट्रांसफर की शर्तें अक्टूबर 2014 में तय की गई थीं, जिनमें सैन्य क्षमता और क्षेत्रीय सुरक्षा माहौल शामिल हैं।

यूएस फोर्सेज कोरिया (यूएसएफके) ने स्पष्ट किया है कि दक्षिण कोरिया को युद्धकालीन ऑपरेशनल कंट्रोल (ओपीकॉन) का हस्तांतरण पूर्व-निर्धारित शर्तों के आधार पर ही होगा और इस नीति में कोई बदलाव नहीं किया गया है। यह बयान उस रिपोर्ट के बाद आया है जिसमें कहा गया था कि अमेरिकी सेना ने इस प्रक्रिया को जल्दबाजी में पूरा करने को लेकर गंभीर चिंताएँ जताई हैं।

यूएसएफके का आधिकारिक रुख

यूएसएफके के एक अधिकारी ने कहा, 'अमेरिका और दक्षिण कोरिया का गठबंधन युद्धकालीन ऑपरेशनल कंट्रोल के कंडीशन्स-बेस्ड ट्रांसफर के लिए प्रतिबद्ध है और इस नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है।' उन्होंने यह भी कहा कि दोनों देशों का ध्यान संयुक्त रक्षा क्षमता को मज़बूत करने और दक्षिण कोरिया तथा अमेरिकी मुख्य भूमि की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर केंद्रित है।

हालाँकि, अधिकारी ने उस रिपोर्ट पर सीधे तौर पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, जिसमें दावा किया गया था कि जल्दबाजी में ट्रांसफर होने पर मौजूदा संयुक्त कमांड सिस्टम के तहत अमेरिकी सैनिकों का दक्षिण कोरियाई कमांड में काम करना मुश्किल हो सकता है।

ओपीकॉन क्या है और यह क्यों अहम है

दक्षिण कोरिया के संदर्भ में ओपीकॉन का अर्थ है — युद्ध या युद्ध जैसी स्थिति में कौन सेना को आदेश देगा, कौन सैन्य अभियानों का नेतृत्व करेगा और कौन कोरिया-अमेरिका संयुक्त सेना को नियंत्रित करेगा। यह सैन्य संप्रभुता का एक बुनियादी प्रश्न है।

गौरतलब है कि 1950-53 के कोरियाई युद्ध के दौरान दक्षिण कोरिया ने अपनी सेना का ऑपरेशनल कंट्रोल अमेरिका के नेतृत्व वाले संयुक्त राष्ट्र कमांड को सौंप दिया था। 1978 में संयुक्त बल कमांड बनने के बाद यह नियंत्रण वहाँ स्थानांतरित हो गया। दक्षिण कोरिया ने 1994 में शांतिकाल का ऑपरेशनल कंट्रोल वापस ले लिया था, लेकिन युद्धकालीन ओपीकॉन अभी भी अमेरिका के पास है।

हस्तांतरण की शर्तें और समयसीमा पर मतभेद

दोनों देश अक्टूबर 2014 में इस बात पर सहमत हुए थे कि ओपीकॉन ट्रांसफर तय शर्तों के आधार पर होगा। इन शर्तों में शामिल हैं — दक्षिण कोरिया की संयुक्त सेना का नेतृत्व करने की क्षमता, उसकी स्ट्राइक और एयर डिफेंस क्षमता, और एक ऐसा क्षेत्रीय सुरक्षा माहौल जो इस ट्रांसफर के लिए उपयुक्त हो।

राष्ट्रपति ली जे म्युंग की सरकार चाहती है कि उनके पाँच साल के कार्यकाल यानी 2030 तक देश युद्धकालीन ओपीकॉन वापस हासिल कर ले। सोल के एक सूत्र के अनुसार, दक्षिण कोरियाई सरकार का मानना है कि ट्रांसफर के लिए जरूरी शर्तें अगले साल तक पूरी की जा सकती हैं।

यह ऐसे समय में आया है जब पिछले महीने अमेरिकी संसद की हाउस आर्म्ड सर्विसेज कमेटी की सुनवाई के दौरान यूएसएफके के कमांडर जनरल जेवियर ब्रूनसन ने कहा था कि दोनों देशों का लक्ष्य 2029 की पहली तिमाही तक शर्तें पूरी करना है — जो सियोल की इच्छित समयसीमा से भिन्न है।

जल्दबाजी को लेकर चेतावनी

चोसुन इल्बो की रिपोर्ट के अनुसार, यूएसएफके ने सोल को आगाह किया है कि यदि सैन्य जरूरतें पूरी किए बिना ओपीकॉन ट्रांसफर किया गया, तो अमेरिकी सैनिकों का दक्षिण कोरियाई जनरल के ऑपरेशनल कंट्रोल में काम करना कठिन हो जाएगा। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि ऐसी स्थिति में मौजूदा संयुक्त कमांड सिस्टम टूट सकता है।

आगे क्या होगा

दोनों देशों के बीच समयसीमा को लेकर मतभेद स्पष्ट हैं — सियोल 2030 तक ट्रांसफर चाहता है जबकि वाशिंगटन 2029 की पहली तिमाही को लक्ष्य मान रहा है। यूएसएफके के ताज़ा बयान से यह संकेत मिलता है कि अमेरिका शर्तों की पूर्ति से समझौता करने के मूड में नहीं है, और आने वाले महीनों में दोनों देशों के बीच इस मुद्दे पर कूटनीतिक बातचीत और तेज़ हो सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन जनरल ब्रूनसन की संसदीय गवाही से यह साफ है कि अमेरिकी सेना इसे चुनावी कैलेंडर से नहीं, सैन्य तैयारी से जोड़ना चाहती है। असली सवाल यह है कि क्या दक्षिण कोरिया की वायु रक्षा और स्वतंत्र कमांड क्षमता वास्तव में उस स्तर तक पहुँच चुकी है जो 2014 की शर्तों में तय था — या यह एक राजनीतिक समयसीमा है जिसे सैन्य तथ्यों पर थोपा जा रहा है।
RashtraPress
14 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ओपीकॉन (OPCON) क्या है और दक्षिण कोरिया इसे वापस क्यों चाहता है?
ओपीकॉन यानी युद्धकालीन ऑपरेशनल कंट्रोल वह अधिकार है जो तय करता है कि युद्ध की स्थिति में कोरिया-अमेरिका संयुक्त सेना का नेतृत्व कौन करेगा। फिलहाल यह अधिकार अमेरिका के पास है, और दक्षिण कोरिया इसे सैन्य संप्रभुता के प्रतीक के रूप में वापस लेना चाहता है।
ओपीकॉन ट्रांसफर के लिए क्या शर्तें तय की गई हैं?
अक्टूबर 2014 में तय शर्तों के अनुसार, दक्षिण कोरिया को संयुक्त सेना का नेतृत्व करने की क्षमता, पर्याप्त स्ट्राइक और एयर डिफेंस क्षमता, और एक अनुकूल क्षेत्रीय सुरक्षा माहौल सुनिश्चित करना होगा। इन तीनों शर्तों की पूर्ति के बाद ही ट्रांसफर संभव है।
दक्षिण कोरिया और अमेरिका के बीच ओपीकॉन की समयसीमा पर मतभेद क्यों है?
राष्ट्रपति ली जे म्युंग की सरकार 2030 तक ओपीकॉन वापस लेना चाहती है, जबकि यूएसएफके कमांडर जनरल जेवियर ब्रूनसन ने 2029 की पहली तिमाही का लक्ष्य बताया है। यह अंतर बताता है कि दोनों देश समयसीमा पर एकमत नहीं हैं।
जल्दबाजी में ओपीकॉन ट्रांसफर के क्या खतरे हैं?
चोसुन इल्बो की रिपोर्ट के अनुसार, यूएसएफके ने चेताया है कि यदि सैन्य जरूरतें पूरी किए बिना ट्रांसफर हुआ तो अमेरिकी सैनिकों का दक्षिण कोरियाई जनरल के अधीन काम करना कठिन हो जाएगा और मौजूदा संयुक्त कमांड सिस्टम टूट सकता है।
दक्षिण कोरिया के पास पहले कब से ऑपरेशनल कंट्रोल था?
1950-53 के कोरियाई युद्ध के दौरान दक्षिण कोरिया ने अपना ऑपरेशनल कंट्रोल संयुक्त राष्ट्र कमांड को सौंप दिया था। 1994 में शांतिकाल का कंट्रोल वापस लिया गया, लेकिन युद्धकालीन ओपीकॉन अभी भी अमेरिका के पास है।
राष्ट्र प्रेस
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