बांग्लादेश बार काउंसिल चुनाव: 300 से अधिक वकीलों पर रोक, 16 वैश्विक मानवाधिकार संगठनों ने उठाए सवाल
सारांश
मुख्य बातें
बांग्लादेश में बार एसोसिएशन चुनावों से 300 से अधिक वकीलों को कथित तौर पर बाहर किए जाने के मामले में दुनिया भर के 16 अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों, बार एसोसिएशनों और लॉ सोसाइटीज ने मंगलवार, 7 जुलाई 2026 को संयुक्त रूप से कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। इन संगठनों ने इसे कानूनी पेशे की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर सुनियोजित हमला करार दिया।
मुख्य घटनाक्रम
संगठनों के अनुसार, आवामी लीग समर्थक अथवा स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में पहचाने जाने वाले वकीलों को बांग्लादेश की 23 बार एसोसिएशनों के चुनावों में हिस्सा लेने से रोका जा रहा है। इनमें बांग्लादेश सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अलावा ढाका, चटगांव, राजशाही, मैमनसिंह, खुलना, गाजीपुर, बारीसाल, कुमिल्ला, मानिकगंज, मुंशीगंज, दिनाजपुर, नाओगांव, झालोकाठी, पंचगढ़, चांदपुर, शरीयतपुर, जामालपुर, शेरपुर, तंगाइल, मेहरपुर, पाटुआखाली और ठाकुरगांव की बार एसोसिएशनें शामिल हैं।
संगठनों ने कहा कि ये घटनाएँ तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) सरकार के गठन के बाद से निरंतर जारी हैं।
विवादास्पद अस्थायी समिति
संयुक्त बयान में संगठनों ने बांग्लादेश सरकार के उस निर्णय पर गहरी चिंता व्यक्त की, जिसके तहत 30 जून 2026 को बांग्लादेश बार काउंसिल के संचालन के लिए 15 सदस्यीय अस्थायी समिति (एड हॉक कमेटी) गठित की गई। आरोप है कि इस समिति में केवल बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी समर्थित वकीलों को स्थान दिया गया है।
यह समिति 1 जुलाई 2026 से 30 जून 2027 तक कानूनी पेशे को नियंत्रित करने वाली संस्था का संचालन करेगी। संगठनों ने इसे 'पेशेवर संस्थाओं के लोकतांत्रिक सिद्धांतों का खुला उल्लंघन' बताया।
संगठनों की माँगें
पेरिस स्थित मानवाधिकार संगठन 'जस्टिस मेकर्स बांग्लादेश इन फ्रांस' (जेएमबीएफ) की रिपोर्ट और मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए संगठनों ने बांग्लादेश सरकार, कानूनी समुदाय और अंतरराष्ट्रीय बिरादरी से तीन प्रमुख माँगें रखीं। पहली — बार काउंसिल की अस्थायी समिति गठित करने के आदेश को तुरंत वापस लिया जाए। दूसरी — कथित रूप से 'गंभीर रूप से त्रुटिपूर्ण, अनियमित और भेदभावपूर्ण चुनाव प्रक्रियाओं' से गठित समितियाँ रद्द की जाएँ। तीसरी — सभी 'गैरकानूनी रूप से रद्द की गई उम्मीदवारियाँ' बहाल की जाएँ।
कानून के शासन पर व्यापक खतरा
संगठनों ने स्पष्ट किया कि यह मामला महज 'प्रशासनिक अनियमितता या राजनीतिक विवाद' तक सीमित नहीं है। उनके अनुसार यह कानूनी पेशे की स्वतंत्रता, कानून के शासन, संगठन बनाने की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक व्यवस्था के संवैधानिक मूल्यों पर व्यवस्थित हमला है।
संगठनों ने कहा, 'वकीलों को चुप कराने, डराने, बाहर करने या राजनीतिक आधार पर भेदभाव करने के प्रयास न केवल व्यक्तिगत वकीलों के अधिकारों को प्रभावित करते हैं, बल्कि न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता और विश्वसनीयता को भी नुकसान पहुँचाते हैं।' यह ऐसे समय में आया है जब बांग्लादेश में राजनीतिक संक्रमण के बाद न्यायिक स्वतंत्रता पहले से ही अंतरराष्ट्रीय चर्चा में है।
आगे क्या होगा
अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद बांग्लादेश सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। संगठनों ने माँग की है कि हर योग्य वकील को राजनीतिक विचारधारा, संबद्धता या पहचान से परे समान रूप से नामांकन और चुनाव में भाग लेने का अधिकार सुनिश्चित किया जाए। यह देखना होगा कि बांग्लादेश सरकार इस बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दबाव पर क्या रुख अपनाती है।