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पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग की माँग: हिरासत यातना रोकने के लिए 2022 के कानून में हो संशोधन

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पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग की माँग: हिरासत यातना रोकने के लिए 2022 के कानून में हो संशोधन

सारांश

पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग ने साफ कहा है — यातना सिर्फ कानून का उल्लंघन नहीं, यह पाकिस्तान की न्याय व्यवस्था में संस्थागत रूप ले चुकी है। 2022 का कानून बना, पर लागू नहीं हुआ। अब आयोग ने संशोधन, स्वतंत्र जाँच और निगरानी तंत्र की माँग रखी है।

मुख्य बातें

पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग (एचआरसीपी) ने 21 जुलाई 2025 को सरकार से टॉर्चर एंड कस्टोडियल डेथ एक्ट, 2022 में संशोधन की माँग की।
आयोग ने कहा कि पुलिस लॉकअप, जेलों और पूछताछ केंद्रों में यातना 'व्यापक और सामान्य' बनी हुई है।
माँग की गई कि मानसिक यातना को एक स्वतंत्र आपराधिक अपराध के रूप में परिभाषित किया जाए।
एचआरसीपी ने आरोप लगाया कि कई अदालतें यातना से प्राप्त साक्ष्यों को स्वीकार कर लेती हैं।
पाकिस्तान ने 2010 में UN यातना-विरोधी कन्वेंशन स्वीकार किया था, पर घरेलू अनुपालन अपर्याप्त बताया गया।
पिछले महीने भी एचआरसीपी ने प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को पत्र लिखकर हिरासत प्रताड़ना पर चिंता जताई थी।

पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग (एचआरसीपी) ने 22 जुलाई 2025 को सरकार से आग्रह किया कि टॉर्चर एंड कस्टोडियल डेथ (प्रिवेंशन एंड पनिशमेंट) एक्ट, 2022 में तत्काल संशोधन किया जाए और मानसिक यातना को एक स्वतंत्र आपराधिक श्रेणी के रूप में मान्यता दी जाए। आयोग ने चेतावनी दी कि पाकिस्तान की आपराधिक न्याय प्रणाली में हिरासत प्रताड़ना अब भी 'व्यापक और सामान्य' बनी हुई है — पुलिस लॉकअप, जेलों और पूछताछ केंद्रों में यह सिलसिला बिना रुके जारी है।

मुख्य माँगें और आरोप

एचआरसीपी ने स्पष्ट किया कि 2022 का कानून अपनी मूल भावना में कमज़ोर है और इसका प्रभावी अनुपालन नहीं हो रहा। आयोग ने तीन ठोस माँगें रखीं: पहली, मानसिक यातना को अलग अपराध के रूप में परिभाषित किया जाए; दूसरी, जाँच एजेंसियाँ उन कानून प्रवर्तन संस्थाओं से स्वतंत्र हों जिन पर खुद प्रताड़ना के आरोप हैं; तीसरी, हिरासत केंद्रों में निगरानी और रिपोर्टिंग की व्यवस्थित प्रणाली स्थापित की जाए।

आयोग के अनुसार, 'पीड़ितों के अनुभव और आधिकारिक आँकड़े दोनों ही बताते हैं कि यातना लॉकअप, जेलों और पूछताछ कक्षों में रोज़ाना होती है।'

पीड़ितों पर दीर्घकालिक असर

एचआरसीपी ने रेखांकित किया कि यातना से बचे लोगों के शारीरिक घाव समय के साथ भर सकते हैं, किंतु मानसिक आघात — जैसे पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस — अक्सर लंबे समय तक बना रहता है। जिन परिवारों के सदस्य हिरासत में लापता हुए या मारे गए, वे न्याय की प्रतीक्षा में वर्षों तक संघर्ष करते रहते हैं।

आयोग ने यह भी कहा कि यातना केवल पीड़ित तक सीमित नहीं रहती — यह उन संस्थाओं की विश्वसनीयता को भी खोखला करती है जिनका दायित्व नागरिकों के जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा करना है।

अदालतों की भूमिका पर सवाल

एचआरसीपी ने एक गंभीर आरोप लगाया कि 'कई मामलों में अदालतें यातना के ज़रिये हासिल साक्ष्यों को स्वीकार कर लेती हैं,' जिससे न्याय-तंत्र के भीतर ही इस दुरुपयोग को अप्रत्यक्ष वैधता मिलती है। आयोग के अनुसार, जब पूछताछकर्ताओं को यातना की आदत पड़ जाती है और संस्थान आँखें मूँद लेते हैं, तो यह राज्य-स्तरीय जवाबदेही की विफलता का संकेत है।

अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता और घरेलू खाई

पाकिस्तान ने 2010 में संयुक्त राष्ट्र के यातना-विरोधी कन्वेंशन (UNCAT) को स्वीकार किया था और उसी के तहत 2022 में घरेलू कानून बनाया। एचआरसीपी का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता और ज़मीनी हकीकत के बीच की यह खाई पाटे बिना पाकिस्तान की न्याय व्यवस्था में सुधार की कोई भी कोशिश अधूरी रहेगी।

गौरतलब है कि पिछले महीने भी एचआरसीपी ने प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को पत्र लिखकर हिरासत सुविधाओं में जारी कथित शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना पर गंभीर चिंता जताई थी। वह पत्र अंतरराष्ट्रीय यातना पीड़ित समर्थन दिवस के अवसर पर भेजा गया था।

आगे की राह

एचआरसीपी ने माँग की है कि हिरासत केंद्रों में स्वतंत्र निगरानी तंत्र स्थापित किया जाए ताकि प्रताड़ना की वास्तविक स्थिति नीति-निर्माताओं, नागरिक समाज और अंतरराष्ट्रीय निगरानी संस्थाओं तक पहुँच सके। आयोग की यह माँगें पाकिस्तान की संसद और सरकार के सामने एक बड़ी परीक्षा बनकर खड़ी हैं — यह देखना होगा कि क्या कानूनी सुधार केवल कागज़ों तक सीमित रहेंगे या ज़मीन पर भी उतरेंगे।

संपादकीय दृष्टिकोण

और हर बार सरकार ने आश्वासन देकर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया। असली समस्या यह है कि जाँच एजेंसियाँ उन्हीं संस्थाओं के अधीन हैं जिन पर आरोप लगते हैं — यह हितों का टकराव किसी भी सुधार को जड़ से कमज़ोर करता है। जब तक अदालतें यातना से प्राप्त साक्ष्यों को अस्वीकार करने की मिसाल नहीं बनातीं, कानूनी संशोधन महज़ कागज़ी खानापूर्ति बने रहेंगे।
RashtraPress
21 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग ने क्या माँग की है?
एचआरसीपी ने सरकार से टॉर्चर एंड कस्टोडियल डेथ (प्रिवेंशन एंड पनिशमेंट) एक्ट, 2022 में संशोधन करने और मानसिक यातना को एक अलग आपराधिक श्रेणी में शामिल करने की माँग की है। साथ ही स्वतंत्र जाँच एजेंसियों और हिरासत केंद्रों में निगरानी तंत्र की भी माँग रखी गई है।
पाकिस्तान में हिरासत यातना की स्थिति कितनी गंभीर है?
एचआरसीपी के अनुसार, पाकिस्तान की आपराधिक न्याय प्रणाली में यातना 'व्यापक और सामान्य' है — यह पुलिस लॉकअप, जेलों और पूछताछ कक्षों में रोज़ाना होती है। आयोग का कहना है कि आधिकारिक आँकड़े भी इस स्थिति की पुष्टि करते हैं।
टॉर्चर एंड कस्टोडियल डेथ एक्ट 2022 क्या है और यह कमज़ोर क्यों है?
यह कानून पाकिस्तान ने 2010 में UN यातना-विरोधी कन्वेंशन स्वीकार करने के बाद 2022 में बनाया था। एचआरसीपी का कहना है कि यह कानून प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो रहा, दोषियों को जवाबदेह नहीं ठहराया जाता और मानसिक यातना को इसमें परिभाषित नहीं किया गया।
क्या पाकिस्तान की अदालतें यातना से प्राप्त साक्ष्य स्वीकार करती हैं?
एचआरसीपी ने आरोप लगाया है कि कई मामलों में अदालतें यातना के ज़रिये हासिल साक्ष्यों को स्वीकार कर लेती हैं, जिससे न्याय-तंत्र के भीतर ही इस दुरुपयोग को बढ़ावा मिलता है। यह आरोप न्यायपालिका की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
एचआरसीपी ने प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को पत्र कब और क्यों लिखा था?
पिछले महीने अंतरराष्ट्रीय यातना पीड़ित समर्थन दिवस के अवसर पर एचआरसीपी ने प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को पत्र लिखकर हिरासत सुविधाओं में जारी कथित शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना पर गंभीर चिंता जताई थी। संगठन ने कहा था कि मौजूदा कानूनी ढाँचा ऐसी घटनाओं को रोकने में सक्षम नहीं है।
राष्ट्र प्रेस
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