यूएनजीए में समुद्री सुरक्षा पर भारत की आवाज़: जयशंकर ने होर्मुज संकट पर जताई गहरी चिंता
सारांश
मुख्य बातें
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने 27 सितंबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) की आम बहस में अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की सुरक्षा का मुद्दा पुरज़ोर तरीके से उठाया। उन्होंने खाड़ी क्षेत्र में जारी संघर्ष और वाणिज्यिक जहाजों व उनके चालक दलों को निशाना बनाए जाने पर गहरी चिंता व्यक्त की। भारत के साथ ओमान, सऊदी अरब, बहरीन, सिंगापुर, फिलीपींस और जिबूती समेत कई देशों ने एक सुर में कहा कि समुद्री सुरक्षा केवल किसी एक क्षेत्र का नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और मानवीय सुरक्षा का सवाल है।
जयशंकर का आह्वान: संयम और निर्बाध आवाजाही
जयशंकर ने सभी पक्षों से संयम बरतने और तनाव घटाने की अपील की। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऊर्जा व व्यापार से जुड़े सामान की आवाजाही बिना किसी अवरोध के जारी रहनी चाहिए। भारत ने क्षेत्रीय संघर्षों में फँसने वाले जहाज़ों और नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की भी माँग की।
गौरतलब है कि भारत अपनी ज़रूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है और उसका विदेश व्यापार समुद्री मार्गों पर बड़े पैमाने पर निर्भर है। इसलिए होर्मुज स्ट्रेट, बाब अल-मंदेब, लाल सागर तथा मलक्का स्ट्रेट पर किसी भी रुकावट का सीधा असर भारतीय ईंधन कीमतों, माल ढुलाई लागत और अंतरराष्ट्रीय जहाज़ों पर तैनात भारतीय नाविकों की जान पर पड़ता है।
ओमान और सऊदी अरब की चेतावनी
ओमान के विदेश मंत्री सैयद बद्र बिन हमद बिन हमूद अलबुसैदी ने कहा कि हालिया क्षेत्रीय युद्ध की वजह से होर्मुज स्ट्रेट से जहाज़ों की आवाजाही और व्यापार लगभग ठप हो गया है। उन्होंने चेतावनी दी कि इस रुकावट का असर ऊर्जा सुरक्षा, कीमतों की स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर भरोसे को नुकसान पहुँचा रहा है। ओमान ने समुद्री कानून पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (UNCLOS) के तहत इस मार्ग से सुरक्षित आवाजाही बनाए रखने की प्रतिबद्धता जताई।
सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान अल सऊद ने खाड़ी की स्थिरता को सीधे तौर पर वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा से जोड़ा। उन्होंने कहा, 'अंतरराष्ट्रीय समुद्री आवाजाही की सुरक्षा और वैश्विक सप्लाई चेन को मज़बूत बनाए रखना हम सभी की साझा ज़िम्मेदारी है।' सऊदी अरब ने होर्मुज स्ट्रेट से गुज़रने वाले जहाज़ों पर किसी भी प्रकार की फीस या पाबंदी और समुद्री मार्गों को दबाव के हथियार के रूप में इस्तेमाल किए जाने का कड़ा विरोध किया।
फिलीपींस की पीड़ा: नाविकों की जान का सवाल
फिलीपींस की विदेश मंत्री थेरेसा लाजारो ने नाविकों की सुरक्षा को चर्चा के केंद्र में रखा। उन्होंने बताया कि दुनिया का करीब 90 प्रतिशत व्यापार समुद्र के रास्ते होता है, जिसमें लगभग 20 लाख नाविकों की भूमिका है — इनमें एक चौथाई से अधिक फिलीपींस के नागरिक हैं। उन्होंने होर्मुज स्ट्रेट में हाल में हुई एक घटना का उल्लेख किया, जिसमें दो फिलीपींस नाविकों की मौत हुई और कुछ अन्य घायल हुए।
लाजारो ने कहा, 'यह घटना हमें याद दिलाती है कि समुद्री सुरक्षा का मतलब इंसानों की सुरक्षा भी है।' उन्होंने दोहराया कि बिना किसी दखल या दबाव के खुले और सुरक्षित समुद्र मार्ग हर देश की अर्थव्यवस्था और नागरिकों के लिए अनिवार्य हैं।
बहरीन, सिंगापुर और जिबूती का साझा संदेश
बहरीन के विदेश मंत्री अब्दुल्लतीफ बिन राशिद अल जायानी ने कहा कि किसी समुद्री मार्ग में रुकावट का असर केवल तटवर्ती देशों तक सीमित नहीं रहता — इन रास्तों से खाना, दवाएँ और ऊर्जा दूर-दराज़ के भूमि-आबद्ध देशों के परिवारों तक भी पहुँचती है। बहरीन ने भी प्रमुख स्ट्रेट से गुज़रने के लिए परमिट या फीस की किसी भी व्यवस्था का विरोध किया।
सिंगापुर के विदेश मंत्री विवियन बालाकृष्णन ने सिंगापुर स्ट्रेट का उदाहरण प्रस्तुत किया, जहाँ तीन तटवर्ती देशों ने मिलकर दुनिया के समुद्री व्यापार के लगभग एक चौथाई हिस्से का रास्ता सुरक्षित रखा है। उन्होंने UNCLOS को बहुपक्षीय अंतरराष्ट्रीय कानून-निर्माण की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक बताया।
जिबूती के विदेश मंत्री अब्दुलकादर हुसैन उमर ने लाल सागर की स्थिति पर चेतावनी देते हुए कहा कि जहाज़ों की स्वतंत्र आवाजाही में कोई भी रुकावट वैश्विक सप्लाई चेन को गंभीर रूप से बाधित कर सकती है।
भारत पर संभावित असर और आगे की राह
होर्मुज स्ट्रेट खाड़ी के तेल-गैस उत्पादक देशों को अरब सागर और हिंद महासागर से जोड़ता है; बाब अल-मंदेब और लाल सागर हिंद महासागर को स्वेज नहर से; और मलक्का-सिंगापुर स्ट्रेट हिंद एवं प्रशांत महासागरों को जोड़ते हैं। यह ऐसे समय में आया है जब खाड़ी में चल रहा संघर्ष इन मार्गों की सुरक्षा को लगातार चुनौती दे रहा है।
यदि इन अहम मार्गों पर अवरोध बना रहता है, तो भारत में ईंधन, माल ढुलाई और बीमा की लागत बढ़ सकती है, आपूर्ति में देरी हो सकती है और अंतरराष्ट्रीय जहाज़ों पर कार्यरत भारतीय नाविकों के लिए जोखिम बढ़ सकता है। यूएनजीए में उठी इस सामूहिक आवाज़ के बाद अब देखना होगा कि क्या संयुक्त राष्ट्र स्तर पर कोई ठोस बहुपक्षीय तंत्र आकार लेता है।