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मार्को रुबियो का खुलासा: ईरान के अंदरूनी मतभेद अमेरिका से परमाणु समझौते में सबसे बड़ी बाधा

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मार्को रुबियो का खुलासा: ईरान के अंदरूनी मतभेद अमेरिका से परमाणु समझौते में सबसे बड़ी बाधा

सारांश

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने खुलासा किया कि ईरान के अंदरूनी मतभेद — कट्टर विचारधारा वाले और व्यावहारिक राजनेताओं के बीच टकराव — अमेरिका के साथ किसी भी परमाणु समझौते की सबसे बड़ी बाधा हैं। तेहरान पर दबाव बढ़ रहा है, लेकिन अंतिम शक्ति अभी भी कट्टरपंथियों के हाथ में है।

मुख्य बातें

मार्को रुबियो ने 27 अप्रैल 2025 को फॉक्स न्यूज पर कहा कि ईरान के अंदरूनी मतभेद अमेरिका से समझौते की सबसे बड़ी बाधा हैं।
रुबियो के अनुसार ईरान में कोई वास्तविक नरमपंथी गुट नहीं है — सभी कट्टरपंथी हैं, बस कुछ व्यावहारिक और कुछ विचारधारात्मक हैं।
सर्वोच्च नेता और आईआरजीसी के पास अंतिम शक्ति है, जो किसी भी समझौते को वीटो कर सकते हैं।
ईरान ने प्रस्ताव दिया है कि अमेरिका बंदरगाह प्रतिबंध हटाए तो वह होर्मुज स्ट्रेट खोल सकता है, लेकिन इसमें परमाणु कार्यक्रम पर कोई रियायत शामिल नहीं है।
ईरानी वार्ताकारों को अपने ही सिस्टम के भीतर अलग-अलग गुटों से पहले मंजूरी लेनी पड़ती है, जिससे बातचीत और जटिल हो जाती है।

वॉशिंगटन, 27 अप्रैल। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने सोमवार को स्पष्ट रूप से कहा कि ईरान के अंदरूनी मतभेद ही वॉशिंगटन के साथ किसी भी ठोस समझौते की राह में सबसे बड़ी रुकावट हैं। साथ ही उन्होंने यह भी संकेत दिया कि तेहरान पर बातचीत के लिए दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। यह बयान ऐसे समय आया है जब दोनों देशों के बीच परमाणु कार्यक्रम को लेकर कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है।

रुबियो का फॉक्स न्यूज में बड़ा बयान

फॉक्स न्यूज के पत्रकार ट्रे यिंगस्ट को दिए एक विशेष इंटरव्यू में रुबियो ने कहा कि ईरान की सत्ता व्यवस्था बेहद बंटी हुई है, जिससे बातचीत करना न केवल कठिन हो जाता है, बल्कि ईरानी अधिकारियों द्वारा किए गए वादों पर अमल भी सीमित हो जाता है। उन्होंने कहा,

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि अमेरिका की ईरान नीति की असली सीमाओं का स्वीकारोक्ति है। दशकों से पश्चिमी विश्लेषक ईरान को 'नरमपंथी बनाम कट्टरपंथी' के सरल खांचे में देखते आए हैं — रुबियो ने इस भ्रम को तोड़ा, लेकिन साथ ही यह भी स्वीकार किया कि अमेरिका जिन लोगों से बात करता है, उनके पास असली फैसले की ताकत ही नहीं है। होर्मुज स्ट्रेट प्रस्ताव को परमाणु रियायत से अलग रखना दर्शाता है कि तेहरान दबाव में है, पर झुकने को तैयार नहीं — और यह गतिरोध वैश्विक तेल बाजार और भारत जैसे देशों के लिए भी गंभीर निहितार्थ रखता है।
RashtraPress
3 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मार्को रुबियो ने ईरान के बारे में क्या कहा?
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि ईरान के अंदरूनी मतभेद अमेरिका के साथ किसी भी समझौते की सबसे बड़ी बाधा हैं। उनके अनुसार ईरान में कोई वास्तविक नरमपंथी गुट नहीं है और अंतिम शक्ति कट्टर विचारधारा वाले नेताओं के हाथ में है।
ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत क्यों मुश्किल है?
रुबियो के अनुसार ईरानी वार्ताकारों को अपने ही सिस्टम के भीतर अलग-अलग गुटों — जैसे सर्वोच्च नेता, आईआरजीसी और राजनीतिक वर्ग — से पहले मंजूरी लेनी पड़ती है। इससे बातचीत बेहद जटिल और धीमी हो जाती है।
होर्मुज स्ट्रेट को लेकर ईरान का क्या प्रस्ताव है?
रिपोर्ट्स के अनुसार ईरान ने प्रस्ताव दिया है कि अगर अमेरिका ईरानी बंदरगाहों पर लगे प्रतिबंध हटाता है, तो वह होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोल सकता है। हालांकि इस प्रस्ताव में ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर कोई रियायत शामिल नहीं है।
ईरान में कट्टरपंथी और व्यावहारिक गुट में क्या फर्क है?
रुबियो के मुताबिक ईरान में एक गुट वह है जो देश और अर्थव्यवस्था चलाने की जिम्मेदारी समझता है, जबकि दूसरा गुट पूरी तरह धार्मिक विचारधारा से प्रेरित है। असली ताकत इसी दूसरे — अधिक कट्टर — गुट के पास है।
इस घटनाक्रम का भारत पर क्या असर हो सकता है?
ईरान-अमेरिका गतिरोध के बने रहने से होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते होने वाला तेल व्यापार प्रभावित हो सकता है, जिसका सीधा असर भारत के ऊर्जा आयात और कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ सकता है। भारत ईरान से ऐतिहासिक रूप से तेल आयात करता रहा है।
राष्ट्र प्रेस
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