खामेनेई के जनाजे पर पूर्व राजदूत दीपक वोहरा: 'ईरान ने मातम को राजनीतिक मंच बना दिया'
सारांश
मुख्य बातें
भारत के पूर्व राजदूत दीपक वोहरा ने 4 जुलाई 2025 को ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई के जनाजे पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि तेहरान ने शोक के माहौल को एक राजनीतिक कार्यक्रम में तब्दील कर दिया है। खामेनेई को अंतिम विदाई देने के लिए बड़ी भीड़ जुटी, जिसके बीच अमेरिका-विरोधी नारे भी लगाए गए — एक ऐसे दिन जब अमेरिका अपनी स्वतंत्रता की 250वीं वर्षगाँठ मना रहा था।
जनाजे की तारीख और अमेरिका को सीधी चुनौती
वोहरा ने कहा, 4 जुलाई को अमेरिका की आज़ादी के 250 साल पूरे हो रहे हैं और ईरान ने जानबूझकर इसी दिन जनाजे का आयोजन किया — यह वाशिंगटन को सीधी ललकार है। उन्होंने बताया कि इसी कारण डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से कहा कि ईरान को जनाजे के लिए एक सप्ताह का समय दिया जा रहा है, उसके बाद वे वही करेंगे जो उन्हें करना चाहिए।
भीड़ के दावों पर सवाल
वोहरा ने ईरानी मीडिया के उस दावे को भी चुनौती दी जिसमें जनाजे में 25 करोड़ लोगों के शामिल होने की बात कही गई। उन्होंने कहा, 'जिस देश की कुल आबादी ही नौ करोड़ है, वहाँ इतने लोग कहाँ से आ गए।' उन्होंने इसे ईरानी प्रचार तंत्र का हिस्सा बताया।
कूटनीतिक अनुपस्थिति: वैश्विक अलगाव का संकेत
एक अनुभवी कूटनीतिज्ञ की नज़र से वोहरा ने बताया कि जनाजे में उल्लेखनीय रूप से बड़े नेता अनुपस्थित रहे। उनके अनुसार अब तक केवल पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख असीम मुनीर ही वहाँ पहुँचे। चीन ने एक जूनियर प्रतिनिधि भेजा, खाड़ी देशों ने निचले पद के अधिकारियों को भेजा, और भारत ने एक राज्यपाल को भेजा। यूरोप से कोई भी प्रतिनिधि नहीं पहुँचा। वोहरा ने कहा कि कूटनीति में प्रतिनिधित्व का स्तर देशों के वास्तविक रुख को दर्शाता है — और यह तस्वीर ईरान के बढ़ते अलगाव को साफ़ उजागर करती है।
हिज्बुल्लाह और इज़रायल: पृष्ठभूमि
लेबनान-इज़रायल संघर्ष के संदर्भ में वोहरा ने बताया कि 1982 के आसपास हुए युद्ध में लगभग 2,000 ईरानी इस्लामिक गार्ड अधिकारी लेबनान पहुँचे थे और उन्होंने मिलकर हिज्बुल्लाह की स्थापना की। 1985 से दशकों तक इज़रायल को निशाना बनाने के बाद अब इज़रायल जवाबी कार्रवाई में है। वोहरा के अनुसार इज़रायल तब तक नहीं रुकेगा जब तक हिज्बुल्लाह पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाता। गौरतलब है कि जून माह में दोनों पक्षों के बीच चार बार संघर्षविराम समझौते हुए हैं।
खामेनेई और भारत का ऐतिहासिक संबंध
वोहरा ने याद दिलाया कि खामेनेई दो बार नई दिल्ली आए थे — पहली बार इंदिरा गांधी के निधन पर, जब वे ईरान के राष्ट्रपति थे, और दूसरी बार राजीव गांधी के निधन के बाद, जब वे सुप्रीम लीडर बन चुके थे। उस दूसरी यात्रा में वे दिल्ली से कश्मीर भी गए थे, जहाँ उन्होंने कई विवादास्पद बातें कहीं थीं। वोहरा ने कहा कि भारत इन बातों को भूला नहीं है, और भारत की सहानुभूति ईरान के साथ है — लेकिन जनाजे को राजनीतिक मंच बनाना उचित नहीं है।