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खामेनेई के जनाजे पर पूर्व राजदूत दीपक वोहरा: 'ईरान ने मातम को राजनीतिक मंच बना दिया'

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खामेनेई के जनाजे पर पूर्व राजदूत दीपक वोहरा: 'ईरान ने मातम को राजनीतिक मंच बना दिया'

सारांश

भारत के पूर्व राजदूत दीपक वोहरा ने कहा कि ईरान ने खामेनेई के जनाजे को जानबूझकर अमेरिका की 250वीं स्वतंत्रता वर्षगाँठ पर रखकर राजनीतिक संदेश दिया। बड़े वैश्विक नेताओं की अनुपस्थिति ईरान के बढ़ते अंतरराष्ट्रीय अलगाव को दर्शाती है।

मुख्य बातें

पूर्व राजदूत दीपक वोहरा ने कहा कि ईरान ने खामेनेई के जनाजे को राजनीतिक कार्यक्रम में बदल दिया।
जनाजा 4 जुलाई को रखा गया — अमेरिका की 250वीं स्वतंत्रता वर्षगाँठ के दिन — जिसे वोहरा ने जानबूझकर की गई ललकार बताया।
ईरानी मीडिया के 25 करोड़ भीड़ के दावे को वोहरा ने खारिज किया; देश की कुल आबादी केवल 9 करोड़ है।
जनाजे में केवल पाकिस्तान के PM और सेना प्रमुख पहुँचे; चीन, खाड़ी देशों ने जूनियर प्रतिनिधि भेजे; यूरोप से कोई नहीं।
हिज्बुल्लाह की स्थापना 1982 में लगभग 2,000 ईरानी इस्लामिक गार्ड अधिकारियों ने की थी; वोहरा के अनुसार इज़रायल तब तक नहीं रुकेगा जब तक हिज्बुल्लाह समाप्त न हो।

भारत के पूर्व राजदूत दीपक वोहरा ने 4 जुलाई 2025 को ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई के जनाजे पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि तेहरान ने शोक के माहौल को एक राजनीतिक कार्यक्रम में तब्दील कर दिया है। खामेनेई को अंतिम विदाई देने के लिए बड़ी भीड़ जुटी, जिसके बीच अमेरिका-विरोधी नारे भी लगाए गए — एक ऐसे दिन जब अमेरिका अपनी स्वतंत्रता की 250वीं वर्षगाँठ मना रहा था।

जनाजे की तारीख और अमेरिका को सीधी चुनौती

वोहरा ने कहा, 4 जुलाई को अमेरिका की आज़ादी के 250 साल पूरे हो रहे हैं और ईरान ने जानबूझकर इसी दिन जनाजे का आयोजन किया — यह वाशिंगटन को सीधी ललकार है। उन्होंने बताया कि इसी कारण डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से कहा कि ईरान को जनाजे के लिए एक सप्ताह का समय दिया जा रहा है, उसके बाद वे वही करेंगे जो उन्हें करना चाहिए।

भीड़ के दावों पर सवाल

वोहरा ने ईरानी मीडिया के उस दावे को भी चुनौती दी जिसमें जनाजे में 25 करोड़ लोगों के शामिल होने की बात कही गई। उन्होंने कहा, 'जिस देश की कुल आबादी ही नौ करोड़ है, वहाँ इतने लोग कहाँ से आ गए।' उन्होंने इसे ईरानी प्रचार तंत्र का हिस्सा बताया।

कूटनीतिक अनुपस्थिति: वैश्विक अलगाव का संकेत

एक अनुभवी कूटनीतिज्ञ की नज़र से वोहरा ने बताया कि जनाजे में उल्लेखनीय रूप से बड़े नेता अनुपस्थित रहे। उनके अनुसार अब तक केवल पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख असीम मुनीर ही वहाँ पहुँचे। चीन ने एक जूनियर प्रतिनिधि भेजा, खाड़ी देशों ने निचले पद के अधिकारियों को भेजा, और भारत ने एक राज्यपाल को भेजा। यूरोप से कोई भी प्रतिनिधि नहीं पहुँचा। वोहरा ने कहा कि कूटनीति में प्रतिनिधित्व का स्तर देशों के वास्तविक रुख को दर्शाता है — और यह तस्वीर ईरान के बढ़ते अलगाव को साफ़ उजागर करती है।

हिज्बुल्लाह और इज़रायल: पृष्ठभूमि

लेबनान-इज़रायल संघर्ष के संदर्भ में वोहरा ने बताया कि 1982 के आसपास हुए युद्ध में लगभग 2,000 ईरानी इस्लामिक गार्ड अधिकारी लेबनान पहुँचे थे और उन्होंने मिलकर हिज्बुल्लाह की स्थापना की। 1985 से दशकों तक इज़रायल को निशाना बनाने के बाद अब इज़रायल जवाबी कार्रवाई में है। वोहरा के अनुसार इज़रायल तब तक नहीं रुकेगा जब तक हिज्बुल्लाह पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाता। गौरतलब है कि जून माह में दोनों पक्षों के बीच चार बार संघर्षविराम समझौते हुए हैं।

खामेनेई और भारत का ऐतिहासिक संबंध

वोहरा ने याद दिलाया कि खामेनेई दो बार नई दिल्ली आए थे — पहली बार इंदिरा गांधी के निधन पर, जब वे ईरान के राष्ट्रपति थे, और दूसरी बार राजीव गांधी के निधन के बाद, जब वे सुप्रीम लीडर बन चुके थे। उस दूसरी यात्रा में वे दिल्ली से कश्मीर भी गए थे, जहाँ उन्होंने कई विवादास्पद बातें कहीं थीं। वोहरा ने कहा कि भारत इन बातों को भूला नहीं है, और भारत की सहानुभूति ईरान के साथ है — लेकिन जनाजे को राजनीतिक मंच बनाना उचित नहीं है।

संपादकीय दृष्टिकोण

क्योंकि ट्रंप प्रशासन के लिए यह सार्वजनिक औचित्य बन गया है। भारत के लिए असली सवाल यह है कि खामेनेई की कश्मीर यात्रा जैसी पुरानी असहजताओं को ध्यान में रखते हुए तेहरान के साथ संतुलित संबंध कैसे बनाए रखे जाएँ।
RashtraPress
4 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दीपक वोहरा ने ईरान के जनाजे को राजनीतिक कार्यक्रम क्यों कहा?
वोहरा ने कहा कि जनाजे में अमेरिका-विरोधी नारे लगाए गए और इसे जानबूझकर 4 जुलाई — अमेरिका की 250वीं स्वतंत्रता वर्षगाँठ — पर रखा गया, जो शोक के बजाय राजनीतिक संदेश देने का प्रयास था।
खामेनेई के जनाजे में कौन-कौन से देशों के नेता शामिल हुए?
वोहरा के अनुसार केवल पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख असीम मुनीर ही बड़े नेता के रूप में पहुँचे। चीन और खाड़ी देशों ने जूनियर प्रतिनिधि भेजे, भारत ने एक राज्यपाल को भेजा और यूरोप से कोई नहीं आया।
हिज्बुल्लाह और ईरान का क्या संबंध है?
वोहरा के अनुसार 1982 के आसपास लेबनान-इज़रायल युद्ध के दौरान लगभग 2,000 ईरानी इस्लामिक गार्ड अधिकारी वहाँ पहुँचे और उन्होंने हिज्बुल्लाह की स्थापना की। तब से हिज्बुल्लाह ईरान के निर्देश पर इज़रायल के खिलाफ सक्रिय रहा है।
ट्रंप ने ईरान के जनाजे पर क्या कहा?
वोहरा ने बताया कि डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से कहा कि ईरान को जनाजे के लिए एक सप्ताह का समय दिया जा रहा है और उसके बाद वे वही करेंगे जो उन्हें करना चाहिए — यह बयान ईरान की उकसावेबाज़ी की प्रतिक्रिया में आया।
खामेनेई का भारत से क्या ऐतिहासिक संबंध था?
वोहरा ने बताया कि खामेनेई दो बार नई दिल्ली आए — पहली बार इंदिरा गांधी के निधन पर जब वे ईरान के राष्ट्रपति थे, और दूसरी बार राजीव गांधी के निधन पर जब वे सुप्रीम लीडर थे। दूसरी यात्रा में वे कश्मीर भी गए थे जहाँ उन्होंने विवादास्पद बयान दिए थे।
राष्ट्र प्रेस
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