क्या ईरान 2009 से पहले के समय में प्रवेश करने की कोशिश कर रहा है, नेदा की आ रही याद?
सारांश
Key Takeaways
- नेदा आगा-सोल्तान की याद आज भी ईरान में गूंजती है।
- विरोध अब केवल चुनावी धांधली तक सीमित नहीं है।
- महिलाएं अब आंदोलन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई हैं।
नई दिल्ली, 11 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। किसी भी आंदोलन की एक विशिष्ट तस्वीर उसकी पहचान बन जाती है। यह तस्वीर उस अविस्मरणीय पल को दर्शाती है जिसे लोग लंबे समय तक याद रखते हैं। इसी प्रकार की एक तस्वीर ईरान की एक महिला की भी है, जो होठों से सिगरेट दबाए अपने देश के सर्वोच्च नेता की तस्वीर को जला रही है। यह एक प्रतीक है उस विरोध का, जो सियासी असंतोष का परिणाम है। यह विरोध की आग है जो दिलों में जलती और बुझती रही है। जब आज के प्रदर्शन की तस्वीरें सामने आती हैं, तो अनायास ही उस युवती की याद ताजा हो जाती है—नेदा आगा-सोल्तान। उसका नाम आज भी ईरान में सत्ता के खिलाफ उठने वाली हर आवाज के साथ जुड़ा हुआ है।
2009 में नेदा आगा सोल्तान की मौत ने यह दिखाया कि ईरान में विरोध की कीमत कितनी भारी हो सकती है। एक साधारण नागरिक, जो किसी बड़े राजनीतिक मंच का हिस्सा नहीं थी, अचानक दमन और हिंसा का वैश्विक प्रतीक बन गई। 20 जून 2009 को फर्जी चुनावी नतीजों के खिलाफ प्रदर्शन को देखते हुए एक गोली आई और 2 मिनट में नेदा की जान चली गई।
इस दौरान किसी ने नेदा का वीडियो बनाया, जो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, और वह ईरान की आवाज बन गईं। 'नेदा' का अर्थ ही 'आवाज' और 'पुकार' है। नेदा की मां अपनी बेटी को एक आज़ाद ख्याल लड़की मानती थीं, जिसे महिला-पुरुष में समानता पसंद थी, और जो महिला अधिकारों के लिए आवाज उठाने को पसंद करती थीं।
वर्तमान में हो रहे प्रदर्शनों में युवा, महिलाएं और कामकाजी वर्ग उसी स्मृति को अपने भीतर संजोए हुए हैं। फर्क केवल इतना है कि अब विरोध केवल चुनाव या किसी एक घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन की प्रत्येक पाबंदी के खिलाफ है जो व्यक्ति की गरिमा को कुचलती है। ईरान आज एक बार फिर गुस्से, डर और उम्मीद के मिश्रित भाव के साथ सड़कों पर उतर आया है।
महंगाई, बेरोजगारी, सामाजिक पाबंदियां और राजनीतिक दमन के खिलाफ उठ रही आवाजें केवल तात्कालिक असंतोष नहीं हैं, बल्कि ये एक लंबे संघर्ष की निरंतरता हैं।
सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों ने विरोध को नई भाषा दी है, लेकिन सत्ता की प्रतिक्रिया में कठोरता का पैटर्न पुराना ही दिखाई देता है। इंटरनेट बंद है, गिरफ्तारी और डर का माहौल—ये सब पहले भी देखे जा चुके हैं। यही वह बिंदु है जहां नेदा की याद और आज का आंदोलन आपस में जुड़ते हैं। नेदा का वायरल वीडियो यह साबित कर चुका था कि सच को पूरी तरह दबाया नहीं जा सकता। आज भी प्रदर्शनकारी इसी विश्वास के साथ आगे बढ़ते हैं कि उनकी आवाज सीमाओं से बाहर तक जाएगी।
इन आंदोलनों में महिलाओं की भागीदारी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। नेदा केवल एक शिकार नहीं थीं; वे उस महिला चेतना का प्रतीक बन गईं जो सार्वजनिक जीवन में अपनी जगह मांगती है। आज जब महिलाएं आगे आकर नारे लगा रही हैं, गिरफ्तारियां झेल रही हैं और जोखिम उठा रही हैं, तो यह उसी अधूरी कहानी का विस्तार लगता है जो 2009 में अधर में छूट गई थी।