सऊदी-पाकिस्तान-तुर्की रक्षा समझौते पर ईरान की चेतावनी, यमन में हस्तक्षेप के 'गंभीर परिणाम' भुगतने की बात कही
सारांश
मुख्य बातें
ईरान ने सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हुए त्रिपक्षीय रक्षा समझौते की कड़ी आलोचना करते हुए चेतावनी दी है कि यमन के मामले में किसी भी बाहरी हस्तक्षेप के 'गंभीर और अवांछित परिणाम' पूरे क्षेत्र को भुगतने पड़ सकते हैं। 5 अक्टूबर 2026 को औपचारिक रूप से लागू हुए इस समझौते के बाद तेहरान की प्रतिक्रिया तेज़ हो गई है।
त्रिपक्षीय समझौता कब और क्यों लागू हुआ
रिपोर्टों के अनुसार, हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब के ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमलों में बढ़ोतरी के बाद यह त्रिपक्षीय रक्षा समझौता 5 अक्टूबर 2026 को प्रभाव में आया। तुर्की और पाकिस्तान दोनों ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि उन्होंने सऊदी अरब की सहायता के लिए आवश्यक कदम उठाने शुरू कर दिए हैं।
इस समझौते के तहत हजारों पाकिस्तानी सैनिकों को सऊदी अरब भेजे जाने की खबरें सामने आई हैं, हालाँकि इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं हुई है।
ईरानी विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया
ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बाघेई ने पाकिस्तानी सैनिकों की तैनाती की संभावित खबरों पर कहा, 'हमने भी यह खबर सुनी है और हमें उम्मीद है कि यह सही नहीं होगी।' उन्होंने आगे कहा कि क्षेत्र के सभी देश भलीभाँति जानते हैं कि यमन के मुद्दे में हस्तक्षेप पूरे क्षेत्र के लिए अवांछित परिणाम उत्पन्न कर सकता है।
बाघेई ने यह भी अपील की कि मक्का समझौते जैसे मंचों का उपयोग 'मुस्लिम समुदाय के हितों और कल्याण के विरुद्ध' नहीं किया जाना चाहिए। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने बिना इस समझौते का नाम लिए पड़ोसी देशों से 'आत्मनिर्भरता' और 'सच्चे भाईचारे' की नीति अपनाने की अपील की, साथ ही यह भी कहा कि ऐसे समझौते ईरान को सीमित नहीं कर पाएंगे।
ईरानी संसद में आलोचना
ईरान के कई सांसदों ने इस रक्षा समझौते को सीमित महत्व का बताया है। संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति समिति के सदस्य अहमद बख्शायेश ने इसे 'कागजी और राजनीतिक समझौता' करार दिया।
इसी समिति के सदस्य इब्राहिम रेजाई ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा, 'सऊदी अरब को समझना चाहिए कि तुर्की और पाकिस्तान के साथ किया गया कागजी समझौता उसे सुरक्षा नहीं देगा, जैसे वर्षों तक अमेरिका पर निर्भर रहने से भी उसे सुरक्षा नहीं मिल सकी। अपनी नीतियां सुधारिए, ताकि आपको सुरक्षा के लिए दूसरों के सामने हाथ न फैलाने पड़ें।'
पाकिस्तान पर विशेष निशाना
आलोचकों का कहना है कि ईरान की नाराज़गी का सबसे बड़ा निशाना इस्लामाबाद है, क्योंकि पाकिस्तान हाल के महीनों में तेहरान और वॉशिंगटन के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाता रहा है। यह भूमिका अब इस समझौते के कारण संदिग्ध मानी जाने लगी है।
ईरानी सांसद अहमद नादेरी ने एक्स पर लिखा, 'यमन के लोगों के खिलाफ युद्ध में सऊदी अरब के साथ पाकिस्तान की एंट्री यह दिखाती है कि पाकिस्तान को अब मध्यस्थ नहीं बल्कि क्षेत्रीय हस्तक्षेप करने वाला देश माना जाना चाहिए।'
ईरानी मीडिया और हूती का रुख
ईरानी सरकारी मीडिया ने इस रक्षा समझौते के सक्रिय होने की कड़ी आलोचना की है और तुर्की व पाकिस्तान के खिलाफ हूती अधिकारियों की चेतावनियों को प्रमुखता से प्रसारित किया है। समाचार एजेंसी तसनीम ने इस घटनाक्रम को 'यमन के लोगों के विरुद्ध सऊदी युद्ध में तुर्की और पाकिस्तान की एंट्री' के रूप में रेखांकित किया है।
यह ऐसे समय में आया है जब मध्य-पूर्व में पहले से ही भू-राजनीतिक तनाव चरम पर है और इस समझौते को लेकर क्षेत्रीय शक्तियों के बीच ध्रुवीकरण और गहरा होने की आशंका जताई जा रही है।