किरिल दिमित्रिएव का दावा: रूसी गैस छोड़ने का फैसला है यूरोप के दंगों की जड़
सारांश
मुख्य बातें
रूस के राष्ट्रपति के विशेष दूत और रशियन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट फंड (RDIF) के सीईओ किरिल दिमित्रिएव ने दावा किया है कि यूरोप में जारी दंगों और अशांति की मूल वजह रूसी गैस को छोड़ने का यूरोप का 'गैर-जिम्मेदाराना' निर्णय है, जिसने ऊर्जा कीमतों में भारी उछाल ला दिया। 1 नवंबर 2026 को सामने आई उनकी इस टिप्पणी ने यूरोप-रूस ऊर्जा विवाद को फिर से केंद्र में ला दिया है।
दिमित्रिएव की एक्स पोस्ट
किरिल दिमित्रिएव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा, 'जैसा कि पहले अनुमान लगाया गया था, रूसी गैस से दूरी बनाने के कारण यूरोपीय संघ में ऊर्जा की बढ़ी हुई कीमतों का नतीजा उद्योगों के कमजोर होने, दंगों और लूटपाट के रूप में सामने आ रहा है। इस स्थिति को आत्मघाती प्रवासन नीतियों और अपनी गलती सुधारने से यूरोपीय संघ के अधिकारियों के लगातार इनकार ने और भी बढ़ावा दिया है।' उन्होंने इस पोस्ट के साथ BBC की एक रिपोर्ट भी साझा की, जिसमें जर्मनी में बढ़ती महंगाई और जीवन-यापन की लागत के विरुद्ध प्रदर्शनों के दंगों में बदलने का उल्लेख था।
फ्रांस में सड़कों पर उतरे हजारों लोग
लगातार तीसरे वीकेंड फ्रांस की सड़कों पर महंगाई, आर्थिक असमानता और सरकारी नीतियों के विरोध में हजारों लोग उतरे। अधिकांश स्थानों पर प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे, परंतु शनिवार को रैलियाँ समाप्त होने के बाद पेरिस सहित कई शहरों में नकाब पहने समूहों ने पुलिस के साथ संघर्ष किया। फ्रांसीसी भाषा में ऐसे उपद्रवियों को 'कैसर्स' (casseurs) कहा जाता है — अर्थात् 'तोड़फोड़ करने वाले'।
गौरतलब है कि 'कैसर्स' कोई पंजीकृत संगठन या औपचारिक राजनीतिक दल नहीं है, बल्कि ये अलग-अलग छोटे समूहों में सक्रिय ऐसे लोग हैं जो प्रदर्शनों के दौरान हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने और पुलिस से टकराव में शामिल होते हैं।
जर्मनी में युवाओं का आंदोलन
जर्मनी में भी यूरोप के अन्य हिस्सों से प्रेरित होकर युवाओं के नेतृत्व में एक आंदोलन उभरा है। यह आंदोलन बेहतर शिक्षा सुविधाओं और रहन-सहन की बढ़ती लागत को नियंत्रित करने की माँग को लेकर सड़कों पर सक्रिय है। यह ऐसे समय में आया है जब यूरोप की कई प्रमुख अर्थव्यवस्थाएँ ऊर्जा महंगाई के दीर्घकालिक प्रभावों से जूझ रही हैं।
व्यापक संदर्भ: ऊर्जा और राजनीति का टकराव
यह ऐसे समय में आया है जब यूरोपीय संघ ने रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद से रूसी ऊर्जा पर निर्भरता कम करने की नीति अपनाई है। आलोचकों का कहना है कि इस नीतिगत बदलाव ने यूरोपीय उद्योगों और आम नागरिकों पर ऊर्जा लागत का बोझ बढ़ाया है। दिमित्रिएव का यह बयान स्वाभाविक रूप से रूस की कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जो यूरोप में आंतरिक असंतोष को अपनी नीतियों की 'पुष्टि' के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है।
आगे क्या
फ्रांस और जर्मनी में जारी प्रदर्शनों और उनके दंगों में बदलने की प्रवृत्ति यूरोपीय सरकारों के लिए आंतरिक दबाव का बड़ा स्रोत बनती जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि ऊर्जा कीमतें आगामी सर्दियों में और ऊँची रहीं, तो सामाजिक अशांति के और गहराने की आशंका है। दिमित्रिएव जैसे रूसी अधिकारियों के बयान यूरोप-रूस के बीच सूचना-युद्ध के एक नए मोर्चे की ओर भी इशारा करते हैं।