नेपाल में जेन जी की बढ़ती ताकत से राजनीतिक परिदृश्य में आया बड़ा बदलाव: रिपोर्ट
सारांश
Key Takeaways
- नेपाल में जेन जी की ताकत ने ऐतिहासिक बदलाव किया है।
- बालेन शाह की पार्टी ने दो-तिहाई बहुमत हासिल किया है।
- पारंपरिक राजनीतिक दलों का वर्चस्व टूट रहा है।
- जातीय और धार्मिक विभाजन के बावजूद लोग एकजुट हो रहे हैं।
- दक्षिण एशिया में नेपाल के बदलाव का व्यापक प्रभाव हो सकता है।
नई दिल्ली/काठमांडू, 19 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। नेपाल में जेन जी की बढ़ती शक्तियों ने देश की राजनीति में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किया है। एक रिपोर्ट के अनुसार, हालिया चुनाव परिणामों ने सभी पूर्वानुमानों को गलत साबित करते हुए बालेन शाह की लोकप्रियता और उनकी पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) को लगभग दो-तिहाई बहुमत दिलाया है, जिससे राजनीतिक समीकरण बदल गए हैं।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 2008 में लोकतंत्र की स्थापना के बाद से नेपाल की राजनीति में पारंपरिक दलों जैसे नेपाली कांग्रेस, नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी केंद्र) और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (यूएमएल) का हावी होना देखा गया है। इन दलों के प्रमुख नेताओं में शेर बहादुर देउबा, पुष्प कमल दहल (प्रचंड) और के. पी. शर्मा ओली शामिल रहे हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, बलेन्द्र शाह (बालेन) एक इंजीनियर और रैपर के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने 2022 में काठमांडू के मेयर का चुनाव निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीतकर राजनीति में कदम रखा था। केवल तीन वर्षों के अनुभव और बिना किसी राजनीतिक परिवार या मजबूत पार्टी समर्थन के, उन्होंने हाल ही के चुनाव में प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार बनकर इतिहास रच दिया और सबसे युवा प्रधानमंत्री बनने की दिशा में अग्रसर हैं।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि जातीय, क्षेत्रीय और धार्मिक विभाजनों वाले इस देश में इस तरह का जनादेश यह दर्शाता है कि मुद्दों पर आधारित राजनीति लोगों को एकजुट कर सकती है।
अब तक, नेपाल में कोई भी पार्टी स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं कर पाई थी और गठबंधन सरकारों के चलते राजनीतिक अस्थिरता बनी रहती थी। लेकिन इस बार के जनादेश से यह परंपरा टूटती दिखाई दे रही है।
रिपोर्ट के अनुसार, इस परिणाम ने विपक्ष को मजबूर कर दिया है कि वह अब विपक्ष की भूमिका निभाए और सरकार बनाने के लिए मध्यस्थता समाप्त हो सकती है।
अंत में, रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि नेपाल का यह परिवर्तन पूरे दक्षिण एशिया में ध्यान आकर्षित कर रहा है। बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे देशों में पहले ही बदलाव देखा गया है, जबकि पाकिस्तान और मालदीव जैसे देशों में भी ऐसी राजनीतिक लहर देखने को मिल सकती है।